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गुगल बाबा

इंडी ब्लागर

 

बढ रही मंहगाई हमको आजमाने के लिए

भाई योगेन्द्र मौदगिल के गजल संग्रह ‘अंधी आँखे-गीले सपने” से एक गजल प्रस्तुत कर रहा हूँ।

बढ रही मंहगाई हमको आजमाने के लिए।
आदमी जिंदा है केवल तिलमिलाने के लिए।

बेकसी बढती रही गर दाने-दाने के लिए।
तन पड़ेगा झोंकना चूल्हा जलाने के लिए।

प्याज ने आँसू निकाले, देख बेसन ने कहा।
चाहिए अब तो कलेजा, हमको खाने के लिए।

इतनी ऊँची कूद मारी इस उड़द की दाल ने।
लोन अब लेना पड़ेगा दाल खाने के लिए।

सोचता हूं वो जमाना खूब था,जब हम पढ लिए।
दिन में तारे दिख गए, बच्चे पढाने के लिए।

नौकरी जब ना मिली तो उसने किडनी बेच दी।
दो निवाले भूखे बच्चों को खिलाने के लिए।

इक चटाई, एक धोती, एक छ्प्पर, एक घड़ा।
उम्र सारी काट दी इनको बचाने के लिए।

भूख ने तड़फ़ा दिया तो बेईमानी सीख ली।
शुक्रिया रब्बा तेरा ये दिन दिखाने के लिए।

तन पे है बनियान चड्डी,दोनों के, पर फ़र्क है।
इक छिपाने के लिए और इक दिखाने के लिए।

भन गया मैं भी मिनिस्टर, भोली जनता शुक्रिया।
मिल गया लाईसेंस मुझको देख खाने के लिए।

माफ़िया का क्या गजब का शौक है भैइ देख लो।
वर्दियों को पाल रक्खा दुम हिलाने के लिए।

चंद वादे, चंद नारे, चंद चमचे “मौदगिल’
पर्याप्त हैं इस देश की संसद में जाने के लिए।

तुम्हारी गांधारी दृष्टि

मैं सोचता था
कविता में सिर्फ़ भाव होते हैं
जो अंतरमन से उतरते हुए
कागज पर अपना रुप लेते है
लेकिन जब कविता
तुम्हारे पास पहुंचती है तो
उसमें क्या-क्या नहीं ढूंढ लेते तुम
गांधारी आंखो से
विदुर दृष्टिकोण तुम्हारा
ढूंढ लेता है
शिल्प,बिंब, अलंकार, व्यथा
व्याकरण, छंद, समास
अतिश्योक्ति, रस और श्रंगार
वियोग,करुणा, रसखान
जो मुझे नहीं दिख पाते
वंदन है तुम्हारी गांधारी दृष्टि का

आपका 
शिल्पकार

तुलने लगे कुबेर भी अनुदान के लिए

हम लड़ रहे हैं मित्र दोना पान के लिए
भाड़े में भीड़ जुटती है सम्मान के लिए

क्या नहीं होता अब पूजा के नाम पर
बिक जाते हैं फ़रिश्ते अनुष्ठान के लिए

है खेल सियासत का कुर्सी के वास्ते
तुलने लगे कुबेर भी अनुदान के लिए

अपने उसुलों के लिए बागी हुए हैं हम
छोड़े हैं सिंहासन भी स्वाभिमान के लिए

माला गले में डालने की होड़ मची है
सब दौड़ रहे हैं झूठी पहचान के लिए

संदेह से घिरी हैं सारी उपाधियाँ
जीता है कौन धर्म और ईमान के लिए

इतने गरीब हो गए नवरंग इन दिनों
दो फ़ूल जुटा न पाए बलिदान के लिए

माणिक विश्वकर्मा 'नवरंग'
कोरबा (छ ग)

मैने नहीं सिलगाई बुखारी

वो लकड़ियाँ कहाँ हैं?
जिन्हे सकेला था बुखारी के लिए
अब के ठंड  में
देती गरमाहट तुम्हारे सानिध्य सी
बुखारी ठंडी पड़ी पर
कांगड़ी में सुलग रहे है
कुछ कोयले
पिछले कई सालों से
जिसकी गरमी का
अहसास है मुझे अब तक
जब से तुमने आने का वादा किया
मैने नहीं सिलगाई बुखारी
सिर्फ़ कांगड़ी को सीने से
लगाए रखा
दिल को गर्माहट देने
और बचाने के लिए
महुए के कोयले की तरह
धीरे धीरे सुलगना मंजुर है
बुखारी के लिए


आपका 
शिल्पकार

मालूम नहीं है क्या? आज नरक चौदस है --- ललित शर्मा

एक पुरानी कविता 

आज सुबह-सुबह श्रीमती ने  जगाया
हाथ में चाय का कप थमाया
तो मैंने  पूछा- क्या टाइम हुआ है?
मुझे लगता नहीं कि अभी सबेरा हुआ है
बोली ब्रम्ह मुहूर्त का समय है,चार बजे हैं
और आप अभी तक खाट पर पडे हैं
मालूम नहीं आज नरक चौदस है
आज जो ब्रम्ह मुहूर्त में स्नान करता है
वो सीधा स्वर्ग में जाता है
वहां परम पद को पता है
जो सूर्योदय के बाद स्नान करता है
वो सारे नरकों को भोगता है
चलो उठो और नहाओ
यूँ घर में आलस मत फैलाओ
मैंने कहा मेडम कृपा करके
तुम मुझे तो सोने दो
मुझे नहीं जाना स्वर्ग में
यही नर्क में ही रहने दो
मैं स्वर्ग में  नहीं रह  सकता हूँ
वहाँ जाकर मै उकता जाऊंगा
सारे दोस्त तो नरक में ही मिलेंगे
इसलिए स्वर्ग में क्या लेने जाऊंगा?
उनके पास कई जन्मों का पुण्य संचित है
इसलिए हमारा नरक में ही रहना उचित है
फिर वहां रम्भा,मेनका, उर्वशी
जैसी  अप्सराओं से तुम्हे डाह होगी
तुम्हारे होठों पर एक आह होगी
कोई लाभ नहीं होगा बाद पछताने में
इसलिए क्या बुरा है नरक आजमाने में
शूर्पनखा, ताड़का, मंथरा को देखकर
वहां मेरा मन वहां नहीं भटकेगा
आखिर आसमान का गिरा
खजूर पर ही अटकेगा ,
श्रीमती मान गई- और बोली
अगर ये बात है तो जाओ,सो जाओ
अगर नही नहाना है तो नरक में ही जाओ

जीवन में सुगंध भर लो-----फ़ूलों से हो लो तुम ।

 इस गीत को मैने लगभग 10 वर्षों पूर्व लिखा था-आज पुन: प्रकाशित कर रहा हूँ, आशा है कि आपको पसंद आएगा।
फूलों से हो लो तुम,जीवन में सुंगध भर लो
महकाओ तन-मन सारा भावों को विमल कर लो
फूलों से हो लो तुम ........................................

वो मालिक सबका हैं ,जिस माली का हैं ये चमन
वो रहता सबमे हैं तुम ,कर लो उसी का मनन
हो जाये सुवासित जीवन ऐसा तो जतन कर लो
फूलों से हो लो तुम.......................................


शुभ कर्मों की पौध लगाओ जीवन के उपवन में
देखो प्रभु को सबमे वो रहता हैं कण-कण में
बन जाओ प्रभु के प्यारे ऐसा तो करम कर लो
फूलों से हो लो तुम......................................


मै कोन?कहाँ से आया ? कर लो इसका चिंतन
जग में रह कर के ,उस दाता से लगा लो लगन
रह कर के कीचड़ में खुद को कमल कर लो
फूलों से हो लो तुम.......................................


वो दाता सबका हैं, दुरजन हो या सूजन
वो पिता सबका हैं, धनवान हो या निरधन
ललित उसमे लगा करके जीवन को सफल कर लो
फूलों से हो लो तुम ........................................


कितना है मुस्किल घरों से निकलना--जन्माष्टमी पर विशेष

युग पुरुष योगेश्वर श्री कृष्ण का आज जन्मदिवस है, इस अवसर पर मन में आया कि कुछ गीत सा रचा जाए। आपके लिए प्रस्तुत है-जन्माष्टमी पर आनंद लें।

पनघट जाऊँ कैसे,छेड़े मोहे कान्हा
पानी नहीं है,जरुरी है लाना
पनघट जाऊँ कैसे,छेड़े मोहे कान्हा

कितना है मुस्किल घरों से निकलना
पानी भरी गगरी को सिर पे रखके चलना
फ़ोड़े न गगरी,बचाना ओ बचाना
पनघट जाऊँ कैसे,छेड़े मोहे कान्हा

गगरी तो फ़ोड़ी,कलाई न छोड़ी
खूब जोर से खैंची और कसके  मरोड़ी
छोड़ो जी कलाई, न सताना ओ सताना
पनघट जाऊँ कैसे,छेड़े मोहे कान्हा

मुंह नहीं खोले,बोले उसके नयना
ऐसी मधुर छवि खोए मन का चैना
कान्हा तू मुरली बजाना ओ बजाना
पनघट जाऊँ कैसे,छेड़े मोहे कान्हा


शिल्पकार

दादी-----कहानी -------(ललित शर्मा)

प्रिय तेरी याद आई

जब
मौसम ने ली अंगड़ाई
बदरी ने झड़ी लगाई
सूरज ने आँखे चुराई
तब,प्रिय तेरी याद आई।

जब
अपनो ने की बेवफ़ाई
पवन ने अगन लगाई
घनघोर अमावश छाई
तब,प्रिय तेरी याद आई

जब,
निर्धनता बनी ठिठोली
कर्कश हुई मीठी बोली
सपनो ने सहेजा डेरा
तब,प्रिय तेरी याद आई

जब
दुश्मनों ने हाथ बढाए
ठग माथे चंदन लगाए
समय ने लगाया फ़ेरा
तब, प्रिय तेरी याद आई

जब
सीने में धड़का दिल
रोशनी हुई झिलमिल
जैसे आने लगा सवेरा
तब,प्रिय तेरी याद आई

जब
शिल्पकार भूल गया
ठक-ठक का मधुर गीत
पत्थरों से आता हुआ
तब,प्रिय तेरी याद आई


शिल्पकार

दो रोटियाँ कितना दौड़ाती हैं?

दो रोटियाँ कितना दौड़ाती हैं?


हाड़-तोड़ भाग-दौड़
फ़िर दिमागी दौड़ भाग
जीवन में विश्राम नहीं
दो रोटियाँ कितना दौड़ाती हैं?

झूठ-षड़यंत्र, जोड़-तोड़
फ़िर होती रही धोखा-धड़ी
जीवन में बस काम यही
दो रोटियाँ कितना दौड़ाती हैं?

मेरे आगे, कोई मेरे पीछे
बढता जाता, ऐसे कैसे चलता
क्यों होता मेरा नाम नहीं
दो रोटियाँ कितना दौड़ाती हैं?

शैतानी आँखे, उड़ती पाँखे
सरहद पार, हो आती हैं कैसे
क्या उसका कोई धाम नहीं
दो रोटियाँ कितना दौड़ाती हैं?

अविता-कविता,ढोला-मारु
प्रेम-पींगे,मदमस्त यौवन
बताओ क्या ये बदनाम नहीं
दो रोटियाँ कितना दौड़ाती हैं?


शिल्पकार

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

साहित्य की थारी

कवि रामेश्वर शर्मा जी का एक गीत

साहित्य की थारी

पुस्तक के पृष्ठों में सजी कविता की फ़ुलवारी है
प्यारे शब्द फ़ूलों जैसे पंक्ति क्यारी-क्यारी है।

गीत-गीतिका, कवित्त, सवैया,मुक्तक,छंद कविता
दोहा,सोरठा,चौपाई,कुंडलियाँ,  काव्य सरिता
अतुकांत छणिकाओं की ये साध्य रचना प्यारी है।

पुस्तक के पृष्ठों में सजी कविता की फ़ुलवारी है
प्यारे शब्द फ़ूलों जैसे पंक्ति क्यारी-क्यारी है।

व्यथा,क्रांति,उल्लास,संवेदन,अनुसरज व अनुकरण
परिवर्तन,इतिहास,विकास,लिंग,वचन और व्याकरण
बंधी साधना की डोरी, भाषा भावना न्यारी है।

पुस्तक के पृष्ठों में सजी कविता की फ़ुलवारी है
प्यारे शब्द फ़ूलों जैसे पंक्ति क्यारी-क्यारी है।

श्लेष,यमक,पुनरुक्ति प्रकाश शब्द,अर्थ, उभयालंकार
छेका,लाटा,वृत्यानुप्राश,प्रतिकात्मक उपमालंकार
अतिश्योक्ति से अलंकृत करना लेख कविता जारी है।

पुस्तक के पृष्ठों में सजी कविता की फ़ुलवारी है
प्यारे शब्द फ़ूलों जैसे पंक्ति क्यारी-क्यारी है।

हास्य,वीर,अद्भुत,भय,क्रोध,शांत,विभत्स, करुण में
और मिलता श्रंगार बाल्यपन,वाचक व्यंजक लक्षण में
मुख्य पृष्ठ अंतिम तक पुस्तक साहित्य की थारी है।

पुस्तक के पृष्ठों में सजी कविता की फ़ुलवारी है
प्यारे शब्द फ़ूलों जैसे पंक्ति क्यारी-क्यारी है।

मचो सियासी बवाल है--संसद में सवालों की बरसात है--ललित शर्मा

संसद में सवालों की बरसात है

 
सखी री,
मचो सियासी बवाल है
जनता पूछत सवाल है
मंहगाई डायन खाय जात है
हमार बाबु तो बहुतै कमात है

कांग्रेस का देखो हाल
उल्टी पड़ गयी सगरी चाल
लोकसभा में हुई बेहाल
संसद में सवालों की बरसात है
मंहगाई डायन खाय जात है

दीप कमल ने खोली पोल
बज गया देखो डमडम ढोल
मंहगाई में है किसका रोल
जिया बहुतै तड़फ़ात है
मंहगाई डायन खाय जात है

सिलेंडर के बढ गए दाम
डीजल पेट्रोल हुए बे लगाम
सब्जी का मत लो नाम
गरीब चटनी से काम चलात है
मंहगाई डायन खाए जात है।

मंहगी हो गयी है शिक्षा
बेरोजगार मांग रहे भिक्षा
कैसे हो जीने की इच्छा
किसान सल्फ़ास खाए जात है

मंहगाई डायन खाए जात है
हमार बाबु तो बहुतै कमात है
मचो सियासी बवाल है
जनता पूछत सवाल है

शिल्पकार

अतृप्ति को स्वीकार करो--एक कविता---ललित शर्मा

वह मुक्त होकर
मांग रही थी तृप्ति
खुले आम मंच से
एक अतृप्त भटक रहा था
आनंद की तलाश में
तृप्त होना क्यों चाहती हो तुम
अतृप्ति ही तो जीवन है
तृप्त होकर ठहर जाना
रुक जाना
क्यों, जीवन का अंत नहीं है?
अगर पड़ाव को मंजिल नहीं बनाना है
तो अतृप्ति को स्वीकार करो।

कवि रामेश्वर शर्मा की एक कविता---अंधा

कवि रामेश्वर शर्मा की एक कविता

अंधा

एक अंधा
एक हाथ कटोरा
एक हाथ डंडा
भूख से धंसा पेट
कहता दे दाता
करता गुहार
वहां से गुजरता
हर व्यक्ति
अनदेखा बन
चल पड़ता है
अंधों की तरह
वाह रे!
अंधे की दुनिया
अंधे की सरकार
रोज गरीबी भूखमरी
अखबारों भाषणों से
दे रहे दुहाई
बैठा सिंहासन पर
लाज द्रौपदी की
लुटवा रहा है
कृष्ण को उलझा रहा है
कि यह कथन
कितना सच होगा
उस अंधे से
यह अंधा अच्छा होगा।

कवि रामेश्वर शर्मा
शिवनगर मार्ग
बढई पारा रायपुर (छ ग)
09302179153

देख क्रुरता फ़ूलों की हम दंग हो गये--एक गीत

कवि रामेश्वर शर्मा का एक गीत

देख क्रुरता फ़ूलों की हम दंग हो गये

जीवन है या जटिल समस्या तंग हो गये।
आदर्शों के रंग गिरगिट के रंग हो गये।

कपटी भावों में डूबे जग मुंह बोले संबंध हुये
विश्वासों के रुपक पछतावे भर के अनुबंध हुये
सच धोखे के व्यापारी के संग हो गये।

आशाओं का राग रंग तो भ्रम का खेल खिलौना है
संध्या की आशंकाओं में घिरा हुआ दोपहर बौना है
संयम नियम विवशताओं के अंग हो गये।

अपनी-अपनी लोलुपता में मधुमक्खी है लोग बने
परिभाषाओं के प्रपंच में अर्थ व्यर्थ का रोग बने
देख क्रुरता फ़ूलों की हम दंग हो गये।

रामेश्वर शर्मा
शिवनगर मार्ग बढई पारा
रायपुर (छ.ग.)
09302179153

आया यौवन का ज्वार--एक गीत

रामेश्वर शर्मा जी छत्तीसगढ एक जाने माने कवि एवं साहित्यकार हैं। इन्होने कई छत्तीसगढी फ़िल्मों के लिए गीत लिखे हैं। हिन्दी और छत्तीसगढी में निरंतर लेखन कार्य करते हैं। साथ ही साथ भोजपुरी में भी लिखते हैं। इनकी साहित्य यात्रा एवं जीवन वृत्त बाद में लिखुंगा। पहले इनका एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ। प्रथम बार नेट पर रामेश्वर जी का काव्य शिल्पकार के माध्यम से प्रस्तूत हो रहा है। आशा है कि आपको मधुर गीत पसंद आएगा।



आया यौवन का ज्वार ।

पूर्वा के आंचल से झर-झर झर-झर झर-झर झरे फ़ूहार
नदी,नहर तालाब तलैया में, आया यौवन का ज्वार ।

जंगल-जंगल मुरझाया था, दहक रही थी माटी सारी,
वर्षा रानी आकर तुमने, सरसाई आत्मा की क्यारी,
जगह-जगह लहराता पानी,नाच उठा व्याकुल संसार

लगी फ़ड़कने भुजा कृषक की,बैलों का मन डोल उठा,
भूख मिटाने मानव की मेहनत का देखो जादु बोल उठा
लगे किसान मनाने में उल्लास, उमंगों के दिन चार

हीरा-मोती बो खेतों में, जीवन जोत जगाएंगें
अपनी पर परिवार सभी की,पीड़ा दूर भगाएंगे,
ऐसे उच्च विचारों में खो,बहा रहा श्रम-श्रम की धार।

बीजें बोकर फ़ल को पाना,है कितना विस्वास भरा,
मिट्टी में सन कुंदन बनने का, क्रम ही आदर्श खरा,
जहां उठा संकल्प वहां पर,फ़िर कैसा साथी अंधियार

पूर्वा के आंचल से झर-झर झर-झर झर-झर झरे फ़ूहार
नदी,नहर तालाब तलैया में, आया यौवन का ज्वार ।

विमोचन समारोह में काव्य पाठ

मैं बादल की सहेली

हवा है मेरा नाम मैं बादल की सहेली
आकाश पे छा जाती हूँ मैं बनके पहेली

आँधियों ने आ के मेरा घर बसाया
आकाश के तारों ने उसे खूब सजाया
चली जब गंगा की ठंडी पुरवैया
धुप के आंगन में खिली बनके चमेली

चुपके आ के कान में बादल ने ये कहा
भर के लाया हूँ पानी तू धरती पे बरसा
प्यास मिटेगी सबकी फैलेगी हरियाली
धरती भी झूमेगी बनके दुल्हन नवेली

जादे के मौसम की मैं सर्द हवा हूँ
पहाडों में भी बहती रही मैं मर्द हवा हूँ
फागुनी रुत में सिंदूरी हुआ पलाश
पतझड़ आया तो फिरि मैं बनके अकेली

सदियों से मैं तो यूँ ही चलती रही हूँ
चलते-चलते मैं कभी थकती नही हूँ
बहना ही मेरा जीवन चलना ही नियति है
बंजारन की बेटी हूँ मैं तो ये चली

हवा है मेरा नाम मैं बादल की सहेली
आकाश पे छा जाती हूँ मैं बनके पहेली।

आपका

शिल्पकार

एक मुलाकात प्रसि्द्ध कवि ताऊ शेखावाटी जी के साथ...........!

आज ताऊ शेखावाटी जी का सवाई माधोपुर से फ़ोन आया कि वे 7 जुन को मेरे पास पहुंच रहे हैं, तो याद आया कि उन पर एक पोस्ट पेंडिंग है, ताऊ जी के साथ मैने 1998 में नासिक में कविता पढी थी, तब मेरा ताऊ जी से प्रथम परिचय हुआ था। ताऊ जी राजस्थानी के माणीता कवि हैं। मायड़ भाषा में लिखते हैं उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं सैकड़ों सम्मान एवं पुरस्कार मिल चु्के हैं। जब ताऊ जी से मिलने श्याम मंदिर में पहुंचा तो ताऊ जी भी उसी निराले अंदाज में मिले हंसते हुए खिलखिलाते हुए। मेरे साथ-साथ अहफ़ाज रसीद भी पहुंच चुके थे। ताऊ जी से चर्चा हुयी, उन्होने समय मिलने पर अभनपुर आने को कहा। फ़िर रात को उनका फ़ोन आया कि उनकी माता जी तबियत खराब है, वे तुरंत ही वापस जाना चाहते हैं, दुबारा आएंगे तो जरुर रुकेंगे एक सप्ताह्। अहो भाग्य जो उनका सानि्ध्य मुझे प्राप्त होगा। इसी बीच समाचार मिला कि उनकी माता जी का स्वर्गवास हो गया। 94वर्ष की थी।
ताऊ शेखावाटी के नाम से प्रसिद्ध सीताराम जी जांगिड़ का जन्म मन्नालाल जी के घर 17सितम्बर 1942को राम गढ शेखावाटी जिला सीकर राजस्थान में हुआ था। इन्होने मेकेनिकल इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की लेकिन स्वतंत्र लेखन राजस्थानी छंद बद्ध काव्य लेखन में इन्हे महारत हासिल है। माध्यमिक शिक्षा बोर्ड अजमेर राजस्थान की कक्षा 10वीं 11वीं के अनि्वार्य हिन्दी सहित 12वीं  के पाठ्यक्रम में इनकी रचनाएं पढाई जाती हैं। हास्य के अग्रिम पंक्ति के कवि ताऊ शेखावाटी ने देश-विदेश में कविता पाठ कर मंचों की शोभा बढाई है। दूरदर्शन में इनकी बहुत सारी रचनाएं प्रकाशित प्रसारित हुयी। हाय, तुम्हारी यही कहानी, उपन्यास सहित, बावळा रा सोरठा, मीराँ-राणाजी संवाद, एव हम्मीर महाकाव्य जैसी कालजयी कृतियों का सृजन कि्या । इनके  हेली सतक सवाई से एक रचना प्रस्तुत हैं।

हेली! हेलो पड़याँ

खिलती कळियाँ गळियाँ सौरम, फ़ूट्याँ सरसी ए।
हेली! हेलो पड़याँ
हवेली छूट्याँ सरसी ए॥

मत आँचल री आग अँवेरे
ढलसी जोबन देर-सबेरै
झूठी उलट सुमरणी फ़ेरै
पकतो आम डाळ एक दिन, टूटयाँ सरसी ए।

हेली! हेलो पड़याँ
हवेली छूट्याँ सरसी ए॥

 कंचन काया का कुचमादण!
क्युँ हो री है यूँ उनमादन
हठ मत पकड़ हठीली बादण
लख जतन कर एक दिन लंका लुट्याँ सरसी ए।

हेली! हेलो पड़याँ
हवेली छूट्याँ सरसी ए॥

ढाळ जठीणै ढळसी पांणी
आकळ बाकळ मत हो स्याणी!
डाट्यो भँवर डटै कद ताणी
फ़ूल्योड़ा फ़ूलड़ा जग 'ताऊ' चूंटयाँ सरसी ए।

हेली! हेलो पड़याँ
हवेली छूट्याँ सरसी ए॥

शब्दार्थ
हेली=हवेली=काया आत्मा का घर
हेलो=आवाज देना, जब बुलावा आएगा
छूट्याँ सरसी ए=छोड़ना ही पड़ेगा, बिना छोड़े नही बनेगा


दिल्ली यात्रा 3... मैट्रो की सैर एवं एक सुहानी शाम ब्लागर्स के साथ.......!

कितना वह मजबूर था--श्रमिक दिवस पर विशेष

आज एक मई श्रमिक दिवस है, श्रम शील हाथों को समर्पित एक पुरानी रचना पेश कर रहा हुँ। आशा है कि आपको पसंद आएगी। 


दुनिया बनाई देखो उसने कितना वह मजबूर था
एक जून की रोटी को तरसा मेरे देश का मजदूर था

चंहु ओर हरियाली की  देखो एक चादर सी फैली है 
यही देखने खातिर उसने भूख धूप भी झेली है 
अपने लहू से सींचा धरा को वह भी बड़ा मगरूर था
एक जून की रोटी को तरसा मेरे देश का मजदूर था

महल किले गढ़े हैं उसने, बहुत ही बात निराली है
पसीने का मोल मिला ना पर खाई उसने गाली है 
सर छुपाने को छत नहीं है ये कैसा दस्तूर था
एक जून की रोटी को तरसा मेरे देश का मजदूर था

पैदा किया अनाज उसने, पूरी जवानी गंवाई थी
मरकर कफ़न नसीब न हुआ ये कैसी कमाई थी
अपना सब कुछ दे डाला था  दानी बड़ा जरूर था 
एक जून की रोटी को तरसा मेरे देश का मजदूर था

आपका
शिल्पकार

देगें ईंट का जवाब उनको गोलों से-------ललित शर्मा

काल के कपाल पर नित प्रहार करेंगे,
हम  सिपाही है दुश्मन से नही डरेंगे ।

देगें ईंट का जवाब उनको गोलों से,
हम बर्फ़ के नहीं है जो आग से डरेंगे।

जिनकी पीढियाँ करते आई युद्ध यहां,
हमेशा कफ़न बांध कर वो ही लड़ेगें ।

युद्ध का मैदान सजा छोड़ रहा अर्जुन,
सोचता था मेरे अपने ही यहाँ मरेंगे।

समझाया कृष्ण ने सुन ले मेरी पार्थ,
तुम नही लड़ोगे तो अपने आप मरेंगे।

"शिल्पकार"रण छोड़ जाएगा न कभी,
दुश्मन की छाती पर हम मुंग दलेगें।


आपका
शिल्पकार


माँ, पत्नी और बेटी------एक कविता-------->>>>>ललित शर्मा 0:-

पुरुष का जीवन मातृशक्ति के ईर्द-गिर्द ही घुमता है, उसे सबकी सुननी पड़ती है, माँ का हक होता है पुत्र पर तो पत्नी भी उतना ही हक जताती है फ़िर पुत्री भी पिता पर अपना हक प्रदर्शित करती है, इन सब के बीच उसे एक कुशल नट की तरह संतुलन बनाना पड़ता है, जरा सी भी चुक हुई और गृहस्थी धराशाई हो जाती है। फ़िर गृहस्थी बचाना हो तो तीनों में से किसी एक को गंवाना पड़ता है और ज्यादातर गाज माँ बेटे के संबधों पर गिरती है, पत्नी कहती है मेरा पति सिर्फ़ मेरा है, अगर तीनों को साथ लेकर चलना है तो कुशल प्रबंधन की आवश्यक्ता है क्योंकि यह एक महाभारत के युद्ध का मैदान जैसा है, जो हमेशा सजा रहता है पता नहीं रणभेरी कब बज जाए, प्रस्तुत है एक कविता, माँ-पत्नी और बेटी.......................


 माँ-पत्नी और बेटी


पृथ्वी गोल घुमती है
ठीक मेरे जीवन की तरह
पृथ्वी की दो धुरियाँ हैं
उत्तर और दक्षिण
मेरी भी दो धुरियाँ हैं
माँ और पत्नी
मै इनके बीच में ही
घूमता रहता हूँ
माँ कहती है,
आँगन में आकर बैठ 
खुली हवा में
पत्नी कहती है 
अन्दर बैठो 
बाहर धुल मच्छर हैं
माँ कहती है
तू कमाने बाहर मत जा
मेरी आँखों के सामने रह
थोड़े में ही गुजारा कर लेंगे
पत्नी कहती है 
घर पर मत रहो
बाहर जाओ
घर में रह के 
सठियाते जा रहे हो
बच्चों के लिए कुछ 
कमा कर जमा करना है
माँ कहती है धीरे चले कर
चोट लग जायेगी
पत्नी कहती है
जल्दी चलो 
अभी मंजिल दूर है
धीरे चलोगे तो 
कब पहुंचोगे वहां पर 
माँ कहती है 
बुजुर्गों में बैठे कर 
कुछ ज्ञान मिलेगा
पत्नी कहती है
बूढों में बैठोगे तो 
तुम्हारा दिमाग सड़ जायेगा 
इन बातों के बीच
एक तीसरी आ जाती है
बेटी भी कूद कर धम्म से 
मेरी पीठ पर चढ़ जाती है
तब कहीं जाकर
मेरा संतुलन बनता है
वह भी कहती है/पापा
क्या मेरा वजन उठा सकते हो
मैं कहता हूँ 
हाँ! बेटी क्यों नहीं?
इन दो धुरियों के बीच 
फ़ुट बाल बनने के बाद
आज तेरे आने से मेरे जीवन में
कुछ स्थिरता बनी है
इन दो धुरियों के बीच 
एक पूल का निर्माण हुआ है
मैं तो तुम तीनो की 
आज्ञा की अवज्ञा नहीं कर सकता
क्योकि  तुम तीनो हो मेरी
जनक-नियंता और विधायिका 

आपका
शिल्पकार

अवधपुरी मा चल जाबो रे----रामनवमी विशेष---------ललित शर्मा

अयोध्या नगरी मे भगवान रामचंद्र जी ने जन्म लिया-छत्तीसगढ प्रदेश (दक्षिन कोसल) उनका ननिहाल है। यहां पर भगवान का जन्मदिवस धुम धाम से मनाया जाता है, लोक गीतों में भगवान की स्तुति की जाती है। प्रस्तुत है परम्परागत लोक गीत-----


चलो जाबो रे अवधपुरी मा चल जाबो
जनम लिए जिंहा राम रमैइया,
सुग्घर दर्शन पाबो,चलो जाबो रे अवधपुरी मा चल जाबो

दुख के हरइया सुख के देवइया, सुनो सब नर नारी।
बड भागमानी जान जनइया, कौश्ल्या महतारी।
देवता मन हे फ़ुल गिरइया,अगास ले देख गिराबो रे

दाई माई मन हे अवइया, थारी मा कलसा धर के
गीत गो्विंद गाथे बधइया, राम के पांव ला पर के
कर आरती निछावर करही, सोहर छोहर गाबो रे
चलो जाबो रे अवधपुरी मा चल जाबो

रंग जाबो जी आज रंगइया, राम के रंग मा रंगाबो
झुमर-झुमर के ना्च नचैइया, कनिहा ला मटकाबो
उड़े गुलाल केसर मोर भैया, तारा चिखला मताबो
चलो जाबो रे अवधपुरी मा चल जाबो

सुनिए एक अद्भुत गीत --सिंदुर ला खोजे वो-----------------ललित शर्मा

आज नवरात्र पर फ़िर एक गीत लेकर आया हुँ भाई दुकालु राम यादव जी का। आप सुने अद्भुत गीत है आनंद अवश्य आएगा।





सिंदुर ला खोजे वो.......




गीत-भाई दुकालु राम यादव जी से साभार

प्रस्तुतकर्ता

शिल्पकार

सुनिए--जस गीत "महामाया के दर्शन कर लो"--ललित शर्मा

नवरात्र पर्व पर आज सुनिए दुकालु राम यादव जी के द्वारा गाया गया जस गीत "महामाया के दर्शन कर लो"






महामाया के दर्शन कर लो




दुकालु राम यादव जी से साभार


प्रस्तुतकर्ता
शिल्पकार

आपने कल पढा था---आज सुनिए--"कोयलिया कुहु कुहु बोले ना"

ल आपसे वादा किया था कि माता का जसगीत आपको सुनाने का प्रयास करुंगा। मेरा प्रयास पुरा हुआ और मै उसे आपके लिए लाने में सफ़ल हुआ। छत्तीसगढ के भजन सम्राट दुकालु राम यादव के "राम लखन तोर जंवारा" से यह गाना लिया गया हैं। हम उन्हे धन्यवाद देते हैं कि छत्तीसगढ की संस्कृति का प्रचार कर रहे हैं। "कुहु कुहु बो्ले ना कोयलिया" को सीमा कौशिक जी ने गाया है प्रस्तुत है माता का जंवारा गीत--आप आनंद लिजिए-आपको पसंद आयेंगे तो मेरा प्रयास सार्थक हो जाएगा।



1.कुहु कुहु बोले ना कोयलिया--गायक सीमा कौशिक



दुकालु राम यादव जी से साभार
आपका
शिल्पकार

नवरात्री मे माता का एक जसगीत-------ललित शर्मा

अभी नवरात्री मे माई के सेवा गीत गुंज रहे हैं तथा मेरी इच्छा है कि आपको सुनाए भी जाएं। इसके लिए मेरी कोशिश जारी है। सफ़लता मिलते ही सुनाने के व्यवस्था करुंगा। प्रस्तुत है माता का एक जसगीत (यश गीत)

आबे आबे ओ मोर दाई

आबे आबे ओ मोर दाई, हिरदे के गाँव मा
तोर मया के छांव मा रहितेंव तोर पांव मा
आबे आबे ओ मोर दाई, हिरदे के गाँव मा

मंदिर के घंटी घुमर, कान मा सुनाए
कान मा सुनाए ओ मोर दाई
जानो मानो अइसे लगथे
मोला तै बलाए-मोला तै बलाए ओ मोर दाई

तोर जोत मोर दाई, जग मा जगमगाए
जग मा जग मगाए ओ मोर दाई
तीन लोक चौदह भुवन, तोर जस ल गाए
तोर जस ला गाए ओ मोर दाई
कइसे मै मनाऊ माँ, लइका तोर आवंव माँ
आबे आबे ओ मोर दाई, हिरदे के गाँव मा

ब्रम्हा, बिस्णु, संकर तोला,माथ ये नवाये
माथे ये नवाये ओ मोर दाई
जग के जगदम्बा दाई, जग ल तैं जगाये
जग ल तैं जगाये ओ मोर दाई
करे तैं हियांव मा मया ला पियावं मा
आबे आबे ओ मोर दाई, हिरदे के गाँव मा

रुप तोर कतको दाई, कोन बता पाये
कोन बता पाये ओ मोर दाई
कण कण मा बसे ओ दाई सांस मा समाये
सांस मा समाए ओ मोर दाई
बिनती ला सुनाववं माँ, भाग ला सहरावं माँ
आबे आबे ओ मोर दाई, हिरदे के गाँव मा

आपका
शिल्पकार

कुछ शब्दार्थ

आबे=आईए
मोर=मेरी
दाई=माँ माता
रहितेवं=रहता
तोर=तेरे
पांव=चरण
हिरदे=हृदय
मोला=मुझे
बलाए=बुलाया
अइसे=ऐसे
लागथे=लगता है
मया=प्रेम-स्नेह
आववं=हुँ
सुनाववं=सुनाऊँ

रन बन रन बन हो SSS-----ललित शर्मा

वरात्रों की धुम जोरों पर है। छत्तीसगढ़ मे जसगीत गाने वाली सेवा टोलियां जंवारा स्थल पर जाकर देवी माता की सेवा कर रही हैं, जगह-जगह जंवारा गीत गाए जा रहे है- जवाँरा से तात्पर्य ठंड मे बोए जाने वाला धान्य जौ से है। जंवारा छत्तीसगढ़ मे शक्ति की देवी दुर्गा माता का प्रतीक है  शब्द शीतकाल में रोपे जाने एक अनाज जौ से बना है । छत्तीसगढ़ में जवाँरा जो कि शक्ति और देवी का प्रतीक है । वर्ष में दो बार बोया जाता है । चैत शुक्ल से नवमी तक तथा द्वितीय कुंआर शुक्ल से नवमी तक जवाँरा में गेहूँ, उड़द, चना पांच या सात प्रकार के बीज घर के भीतर भूमि पर अथवा टोकनी में देवी स्थापना के पश्चात् बोये जाते है । अंकुरित, पौधो की सुबह शाम पूजा की जाती है, जवाँरा के सेवक इस अवसर पर जवाँरा गीत गाये जाते है । जवाँरा गीतों में दुर्गा माँ की आरती विभिन्न देवताओं की स्तुति उनके निवास वाहन तथा भोजन आदि का वर्णन मिलता है । ढोलक, झांझ, चांग, मंजीरा, मांदर, खलहर आदि पौधों का प्रमुख जवाँरा गीत में प्रयोग किया जाता है । जंवारा सेवा दल के श्री नंद कुमार निषाद राज के सौजन्य से कुछ माता सेवा गीत प्राप्त हुए हैं जिन्हे प्रस्तुत कर रहा हुँ।

जसगीत-माता सेवा गीत

रन बन रन बन हो SSS
तुम खेलव दुलरवा रन बन रन बन होSSS
रन बन रन बन हो SSS
काकर पुत हे बाल बरमदेव काकर पुत गौरेइया
काकर पुत हे बन के रक्सा
रन बन रन बन हो SSS
ब्राहमन पू्त हे बाल बरमदेव अहिरा पूत गौरेइया
धोबिया पूत हे बन के रक्सा
रन बन रन बन हो SSS
कहंवा रहिथे बाल बरमदेव कहंवा रहिथे गौरेइया
कहंवा रहिथे बन के रक्सा
रन बन रन बन हो SSS 
बर मा रहि्थे बाल बरमदेव कोठा मा रहिथे गौरेइया
बन मा रहिथे बन के रक्सा
रन बन रन बन हो SSS
का पूजा लेथे बाल बरमदेव, का पूजा लेथे गौरेइया
का पूजा लेथे बन के रक्सा
रन बन रन बन हो SSS
नरियल लेथे बाल बरमदेव, कुकरी लेथे गौरेइया
यहां भैंसा लेथे बन के रक्सा
रन बन रन बन हो SSS  
तुम खेलव दुलरवा रन बन रन बन होSSS
रन बन रन बन हो SSS

आपका 
शिल्पकार
 

सज्जनाष्टक नामक सुदीर्घ काव्य------ललित शर्मा

गतांक से आगे--  शिवरीनारायण में भारतेंदु मंडल के तर्ज पर ठा. जगमोहन सिंग मंडल का अभ्युदय हुआ. जिसमे इस मंडल के आठ कवि  प्रमुख थे इन कवियों को लेकर ठा.जगमोहन सिंग ने सज्जनाष्टक नामक सुदीर्घ काव्य की रचना की. प्रस्तुत है सज्जनाष्टक................
श्रीमद्विजयराघवगढाधिपात्मज तथा जिला बिलासपुर मे तहसील शिवरीनारायण के तहसीलदार और मजिस्ट्रेट श्री ठाकुर जगमोहन सिंह कृत्।

सज्जनाष्टक

सत संगत मुद मुंगल मूला। सुई फ़ल सिधि सब साधन फ़ूला।

श्री गणेश नारायण शिव कंह अज श्रीरामहिं ध्याऊं।
नवो सिद्धि अरु सिद्धि बुद्धि सब जिन प्रसाद बर पाऊं॥(१)

बंदौ आदि अनन्त शयन करि शबर नारायण रामा।
बैठे अधिक मनोहर मंदिर कोटि काम छवि धामा ॥ (२)

जिनको राग भोग करि निभु दिन सुख पावत दिन रैनु। 
भोगहा श्री यदुनाथ जू सेवक राम राम रत चैनु॥(३)

है यदुनाथ नाथ यह सांचो यदुपति कला पसारी।
चतुर सुजन सज्जन सत संगत सेवत जनक दु्लारी॥ (४)

दिन-दिन दीन लीन मुइ रहतो कृषी कर्म परवीना।
रहत परोस जोस तजि मेरे है द्विज निपट कुलीना॥(५)

पै इक सन्त महन्त जेहि जगत प्रभाव बिराजै्।
राका सो चहुं सुजस सुनिर्मल छुसरत देसन साजै॥ (६)

शांत रुप बपु मनौ सुइ आजु सजीव लखाई।
गल तुलसी सोहत सुन्दर वर दरस पुनीत पन्हाई॥ (७)

करहिं कमंडलु लटकत जाके दिए एक को पीना।
मनु इंद्रिह कहं जीत ज्ञान को ग़ठरी लटका लीना॥(८)

रुप केस भेस अति सुन्दर गुन मन्दिर अभिरामा।
जटा पुंज सीसहिं के मनु सोभित छवि धामा ॥(9)

बाबा जिन तीरथ के कावा कर अनेकन बारी।
अर्जुन दास दास हनुमत के तनचरनन ब्रत धारी॥ (10)

बितवत दिवस रैन भजनन में चैन न अन्तहि पावै।
हरि को ध्यान किए बिनु ताकहं खान-पान नहि भावै॥ (11)

प्रतिदिन भोर नहात शीत नहिं गिनत करत तप भारी।
सग शरीर सुख छाड़ि प्रान कहं देत कलेशहिं भारी॥(12)

जाके दरस पुनीत किए सब कटत पाप के पुंजा।
गंगा अरु काशी प्रयाग बट गिने जात जिमि गुंजा॥(13)

तीरथ बरथ व्यर्थ सब करहीं कठिन मुक्ति के काजा।
क्यौं न जाय छिन दरस करत इन विपुल पुन्य सिर ताजा॥(14)

संगम सन्त समाज सुभग सब हरतु पाप की राशी।
नहिंन होत बिनु ज्ञान मुक्ति कोउ करै कोटि दिन काशी॥(15)

वेद पुरान न्याय सब कहहीं ज्ञान बिना नहीं होई।
मुक्ति जदपि कोटिन तीरथ करि रहे भरम सब कोई॥(16)

तीरथ ध्यान जोग जप तपहु इक तुलना करि राखै।
पै बिनु ज्ञान मिलत नहिं कबहुं सुख अनन्त श्रुति भाखै॥(17)

सो न होत बिनु सन्त संग के सत संगत फ़ल भारी।
वाल्मीकि नारद मुनीशहू भे मुनीश व्रत धारी ॥ (18)

तेहु रहे नीच जन्महिं के पै सत संग अनूपा।
पाय भए मुनि ब्रह्म तेज मय लखहु प्रभाव सरुपा॥ (19)

सत सहस्त्र साधु समाज नित रहत आय मदमाहीं।
तिन कंह नित्त दिवस षट् रस के भोजन स्वादु सराहीं॥(20)

सदावर्त जहं बटत नेम सों कटत चैन दिन राती।
घटत न कहुँ भंडार राम को बस्तु न कछु सिराती॥(21)

चेला भए तासु गुन मेला रहत सुमठ सिर ताजा।
गौतम मनु दूजो यह सोहत गौतम दास बिराजा॥ (23)

ताको सकल कर्म कर निसि दिन ॠषिराम अनुगामी।
मानौ स्वामि धर्म को अंकुर ता मन आयौ जामी॥(24)
 

माखन साहु राहु दारिद कहं अहै महाजन भारी।
दीन्हो धर माखन अरु रोटी बहु बिधि तिनहिं मुरारी॥(25)

लच्छ पती सुद शरन जनन को टारत सकल कलेशा।
द्र्व्य हीन कहं है कुबेर सम रहत न दुख को लेशा॥ (26)

दुओ धाम प्रथमहिं करि निज पग कांवर आप चढाई।
सेतु बन्ध रामेसुर को लहि गंगा जल अन्हवाई ॥(27)

चार बीस शरदहुं के बीते रीते गोलक नैना।
लखि असार संसार पार कहं मुंदे दृग तजि चैना॥(28)

अपर एक पंडित गुन खानी मानी हीरारामा
हीरा सो अति विमल जासु जस छहरत चहुँ छवि धामा॥(29)

यह पुरान मनु भयो वाचि के दस अरु आठ पुराना।
जीरि सकल इन्द्रिन अग बैठयौ शिव सरुप अभिरामा॥ (30)

तिमि जग मोहन के परोस में मोहन रहत पुजारी।
राग भोग पुजारु पाठ करि प्रभु चरनन मन धारी॥ (31)

रमानाथ लक्ष्मी नारायण के भरोस सुख सोवै।
देत जीविका जो निसि बासर सुई ताकौ दुख खोवै॥(32)

दोहा

रहत ग्राम एहि बिधि सबै सज्जन सब गुन खान्।
महानदी सेवहिं सकल जननी सब पय पान॥ (33)

श्री जगमोहन सिंह रचि तीरथ चरित पवित्र।
सावन सुदि आठैं बहुरि मंगलवार बिचित्र्॥ (34)

संवत् बिक्रम जानिए इन्दु बेद ग्रह एक।
शबरीनारायण सुभग जहं जन बहुत विवेक्॥(35)


प्रस्तुत कर्ता
शिल्पकार

ठाकुर जगमोहन सिंह-एक अद्भुत रचनाकार------ललित शर्मा

ठाकुर जगमोहन सिंह एक जाना पहचाना नाम है खड़ी बोली के  गद्य को संवारने और गढ़ने वाले साहित्य करों में. बनारस के क्वींस कालेज में अध्ययन के दौरान वे भारतेंदु हरिश्चंद्र के सम्पर्क में आए तथा यह सम्पर्क प्रगाढ़ मैत्री में बदल गया जो की जीवन पर्यंत बनी रही.
ठाकुर जगमोहन सिंह का जन्म विजयराघवगढ़ रियासत में ठा.सरयू सिंह के राज परिवार में ४ अगस्त सन १८५७ में हुआ था. ठा. सरयू सिंह के पूर्वजों का संभंध इछ्वाकू वंश के जयपुर के जोगवत कछवाहे घराने से था. १८५७ के विप्लव में ठा. सरयू सिंह ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था. फलस्वरूप अंग्रेजो ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. उन्हें काले पानी की सजा सुनाई गई. लेकिन अंग्रेजी हुकूमत में सजा भोगने की बजाय ठा. सरयू सिंह ने मौत को गले लगना उचित समझा.ठा.जगमोहन सिंह ऐसे ही क्रांतिकारी, मेधावी एवं स्वप्न दृष्टा सुपुत्र थे.
१८७८ में शिक्षा समाप्ति के बाद वे राघवगढ़ आ गए. दो साल पश्चात् १८८० में धमतरी (छत्तीसगढ़) में तहसील दार के रूप में नियुक्त किये गए. बाद में तबादले पर शिवरीनारायण आये. कहा जाता है कि शिवरीनारायण में शादी शुदा होते हुए भी इन्हें श्यामा नाम की स्त्री से प्रेम हो गया. शिवरीनारायण में रहते हुए इन्होने श्यामा को केंद्र में रख कर अनेक रचनाओं का सृजन किया. जिनमे हिंदी का अत्यंत भौतिक एवं दुर्लभ उपन्यास श्याम-स्वप्न प्रमुख है. इसके अतिरिक्त इह्नोने  श्यामलता, श्याम सरोजिनी जैसे उत्कृष्ट रचनाओं का भी सृजन किया. इनके द्वारा लिखित अन्य रचनाओं की चर्चा अगली किश्त में करेंगे. इनके द्वारा रचित कुछ कुंडलियाँ,जिनमें शिवरीनारायण क्षेत्र की दशा का वर्णन हैं--- प्रस्तुत है.

कुंडलियाँ

इक थाना तहसील के मध्य धर एक फुटि
उत बजार सों प्रबल जल निकस्यो अट्टा टूटि
निकस्यों अट्टा टूटि फ़ुटि गिजि परीं अटारी
गिरि गेह तजि देह देहरी और दिवारी
(क)जोगी डिफ़ा सुदीप मनौ तंह जल जाना
उत पुरब सब पंथ रोकि घेरवौ त थाना ॥

पूरब केरा के निकट पश्चिम निकट खरौद
लगभग फ़ेर लुहारसी उत्तर ग्रामहिं कोद
उत्तर ग्रामहि कोद जहां टिकरी पारा है
दच्छिन हसुवा खार पार लौ जल धारा है
जंह लौ देखो नजर पसारत जल जल घेरा
कैय्यक कोसन फ़ैलि घेरि फ़िरि पूरब केरा ॥

बह्यो माड़वारीन को व्योपारी सो आज
नोन हजारन को सही चिनी असीम अनाज
चिनी असीम अनाज बसन अरु असन मिठाई
चढि छप्पर जिहि छैल सुघर लूटत बहुखाई
बची कमाइ माल पसीनागारो जुरह्यो
बइमानी को पोत आजु मनु सोतहिं रह्यो॥

धाई चलत बजार मे नाव पोत जल सोत
तनक छिनक को ह्वे रह्यो काशमीर छवि होत
आरत करत पुकार कंपत तन धन गत सोगा
काशमीर छवि होत द्वार द्वारन पै डोंगा
मठ दरवाजे पैठ लहर मंदिर बिच आई
जंह छाती लौ नीर धार सुई तीरहिं धाई॥

पुरवासी व्याकुल भए तजी प्राण की आस
त्राहि-त्राहि चहुँ मचि रह्यो छिन-छिन जल की त्रास
छिन-छिन जल की त्रास आस नहिं प्रानन केरी
काल कवल जल हाल देखि विसरी सुधि हेरी
तजि तजि निज निज गेह देहलै मठहिं निरासी
धाए भोगहा ओर कोऊ आरत पुरवासी॥

कोऊ मंदिर तकि रहे कोऊ मेरे गेह
कोऊ भोगहा यदुनाथ के शरन गए लै देह
शरन गए लै देह मरन तिन छिन मे टारयौ
भंडारो सो खोलि अन्न दैदीन उबारयों
रोवत कोउ चिल्लात आह हनि छाती सोऊ
कोऊ निज धन घर वार नास लखि बिलपति कोऊ॥


सोरठा
कियो जौन जल हाल दिन द्वै मे को लेखई।
मानहु प्रलय सुकाल आयो निज मरजाद तजि॥

प्रस्तुतकर्ता
आपका
शिल्पकार

उल्लासोपरांत पतझड़ का मौसम आपके लिए---------स्वागत कीजिए इसका भी........ललित शर्मा

होली बीत गई अब पतझड़ आ गया है........वातवरण में गर्माहट है.........पेड़ों के पत्ते पीले पड़ रहे हैं........ वृक्ष अपना क्या कल्प कर रहे हैं इस मौसम में पूरण पत्ते छोड़ कर नए धारण कर रहे हैं जैसे कोई अपनी क्या चमकाने कपडे बदल रहा हों....... पलाश के पेड़ों पर तो लाली गजब की छाई है......... एक दिन उसे भी दिखाऊंगा......... चित्रों के माध्यम से........ होली के उल्लास के बाद अब कहीं जाकर खुमार उतरा है........ लेकिन मन कुछ अनमना सा है मौसम का असर है.......... पतझड़ का मौसम होता ऐसा ही है.......... जब रौनके देखी तो पतझड़ भी देखना है दुनिया का कटु सत्य है......... प्रकृति के साथ मनुष्य जुड़ा हुआ है........... लेकिन प्रकृति से यह भी सीख लेनी चाहिए की किसी भी तरह का उल्लास दो घडी का है और आप यदि विवेकी है तो इसका रचनात्मक उपयोग कर सकते हैं............ नहीं तो फिर पतझड़ सामने ही है........... टूट कर पत्तों की तरह बिखर जाना है..........आइये पतझड़ पर एक कविता प्रस्तुत है....... आपका आशीर्वाद चाहूँगा......................

पतझड़ आया

पतझड़ का मौसम
वृक्ष पर एक भी पत्ता नहीं
यह मौसम पहले भी आता था
अब फिर लौटा
कोयल की कूक 
बुलबुल के नगमे खो गए हैं
दूर गहराईयों में 
उदास डाल पे बैठी है कोयल
तेज पवन के झोंकों से 
पत्तों के खड़कने की सदा आती है.
वृक्ष केंचुली बदल रहा है
यौवन की आस में
सूखे पत्ते तड़फ रहे हैं प्यास में
यही नियति हैं 
कल आंधी तुफानो में 
पत्तों ने दिया था भरपूर साथ
लेकिन आज सर हिला दिया
सारे सर चढ़े पत्ते गिर पड़े भरभरा कर
पत्ते कहते हैं
पहले भी हमने संकट काल में
विपदाओं से डट कर मुकाबला किया
लेकिन वृक्ष ने ही साथ छोड़ दिया
अबकी बार हमारे पांव उखड़ गए
आँधियों से मुकाबले में 
हम छलके हुए पारे की तरह बिखर गए
यह तो नियति का खेल है
कुछ देर यौवन का उन्माद देखना है
फिर टूट कर समाहित हो जाना है
इसी दुनिया की धुल में
गुम हो जाना है बिना किसी नाम के
बेनाम हो कर/ मनुष्य की तरह 


आपका 
शिल्पकार,

लाल -गुलाल -अबीर के छाये हए हैं रंग-----चित्र होली के----------ललित शर्मा

ल होली का हुआ धमाल-हम तो सुबह से ही तैयार हो कर अपने दालान में बैठ चुके थे.........हमारे यहाँ परंपरा है कि लोग अपने से बड़े (पद, प्रतिष्ठा, उम्र और अजीज मित्र ) को पताशों के बने हुए मीठे हार पहनाते हैं........ बहुत ही अच्छी परंपरा है कि होली में कडुवाहट भूल कर मिठास जीवन में बनी रहे.........सुबह से ही मित्रगण और गांव के सहयोगी आने प्राम्भ हो चुके थे. ............ . गुलाल रंग और मालाएं लेकर ........फिर होली का कार्यक्रम शुरू हो चूका था...........जो दिन भर चलता रहा...........इस अवधि में तो फोन भी उठाना मुस्किल हो जाता है.......पुरे भारत से होली की शुभकामनाओं के सन्देश आ रहे थे.............हमारे नए पुराने मित्रों के ..........हमने उन्हें शाम को जवाब दिया...........और हमारी फौजी होली आखिर शाम को ही मनी..........कुछ पटियाला और कुछ जालन्धर पेग बने और फिर चलती रही महफ़िल.........होलीयारे मित्रों के साथ.......... .होली में यह कुछ दस्तूर भी हो गया है.........बिना दवा- दारू के स्वागत होता ही नहीं है..........
हमारे यहाँ होली पंचमी तक मनाई जाती है जिसे रंग पंचमी भी कहा जाता है.......लेकिन आज ऐसी स्थिति है कि जैसे फागुन के बाद सचमुच पतझड़ आ ही गया हो........धुप चमकीली हो चुकी है.........वातावरण में गरम हवाएं चल रही हैं...........होली के जाते ही पेड़ों के पत्ते पीले पड़ गए हैं............ अब इस पर फिर कभी लिखेंगे हमारी होली में आप भी शामिल होईये  कुछ चित्रों के साथ..................

  कुछ चित्र होली के मित्रों के साथ

 चंद्रिका और युवराज कुमार

 
तुलेन्द्र तिवारी जी और अनुज साहु जी

 
फ़ौजी जैन साहब और अजय शर्मा

 
होली चलेगी रंग पंचमी तक

 
नरेश कुमार बचपन का मित्र 

 
अब हमने खेली होली श्रीमती जी के संग
लाल -गुलाल -अबीर के छाये हए हैं रंग  




आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनायें 


तभी समझना यार आ गयी है मस्तानी होली ---होली पर विशेष धमाका------ललित शर्मा

आज होली का त्यौहार है..........होलिका की दहन की तैयारी हो रही है..........बस आज रात नगाड़े कुछ जोर पर रहेंगे फाग अपनी चरम सीमा पर .................और कल होली के रंग गुलाल की बौछार होने वाली है आज ट्रैफिक भी जाम रहेगा.....लोग जल्द से जल्द अपने घर पहुँचने की कोशिश में रहेंगे किसी हादसे से बचने के लिए आप भी सुरक्षित होली मनाएं....सभी भाइयों और बहनों को होली की हार्दिक शुभ कामनाएं,  मैंने होली पर एक कविता लिखी थी और सौभाग्य से आज मेरे साथ कवि योगेन्द्र मौदगिल जी भी हैं उन्होंने इसे संवारा है............अब विशेषतौर पर आपके लिए प्रस्तुत है... ...... आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनायें.....

जब टेसू जब पलास के रंगों की सजे रंगोली
जब चौपाल में बजे नगाड़े और हँसे हमजोली
जब कोयलिया ने भी अपनी तान सुरीली खोली
तभी समझना यार आ गयी है मस्तानी होली

आँख आँख जब सजे इशारे और बुलावा आये
आँगन आंगन बिखर चांदनी अपना रंग दिखाए
झर झर झर झर मधु रस टपके और अमृत घोली
तभी समझना यार आ गयी है मस्तानी होली 

जब खिड़की से वह लटकाए ऊपर चढ़ने डोरी
तुलसीदास की रत्ना जैसी लगती है तब गोरी 
देख खुला दरवाजा चोरों की भी नियत डोली
तभी समझना यार आ गयी है मस्तानी होली

जब ऋतुराज ने रंगों वाली बड़ी पिटारी खोली
भांग चढ़ा कर जब वो बोले मीठी मीठी बोली 
सारा दिन मदमस्त रहे जब सूझे नई ठिठोली
तभी समझना यार आ गयी है मस्तानी होली

आपका 
शिल्पकार     

रंग रंगीले रसिया के छल से भीगी नव-चोली -------------हो्ली है------ललित शर्मा

होली के अवसर प्रकाशन के लिए एक गीत लिखा था, जब ब्लाग जगत पे फगुनाहट की आहट हुयी तो उसे भेज दिया सम्मानित कराने के लिए, ...........चलो लगे हाथ बहती गंगा में स्नान कर लिया जाए....सम्मान भी हुआ और फगुनाहट पर हमारा गीत दुसरे नंबर पर था.......उपविजेता घोषित किया गया कल धूमधाम से.... लेकिन मिठाई से वंचित रह गये.....शायद मतदाताओं को पता था गीतकार मधुमेह से ग्रसित है और मिठाई खाना इनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है........ इसलिए इतने ही मत मिले की ना मरे ना मोटाय............किसी तरह मधुमेह से बचाय.........जिन्होंने इसे सराहा और मुझे अपना आशीर्वाद दिया.......मैं उनका हार्दिक आभारी हूँ.......मंचीय कवि नहीं हूँ इस लिए मंच के स्तर की नहीं लिख पाता.....लेकिन २७ वर्षों से शब्दों का समीकरण बैठा रहा हूँ........जोड़ तोड़ करके कुछ गढ़ देता हूँ और उसे अब ब्लाग पर लगा कर स्वांत: सुखाय की भावना से आत्म संतुष्टि पा लेता हूं......इदं नमम् के भाव से अर्पित कर देता हुँ..........आज कल छंद बद्ध गीत नहीं लिखे जा रहे अवधिया जी का कहना था.....तो एक प्रयास किया था हमने.......छंद का ज्ञान तो अब भूल चुके हैं........लेकिन अब पुन: याद करके मात्राएँ.....लिखना चाहेंगे....... प्रतियोगिता में शामिल गीत को प्रस्तुत कर रहा हूं...........आशीर्वाद चाहूँगा..........बुरा ना मानो होली है.

सजना सम्मुख सजकर सजनी
खेल रही है होली..
खेल रही है होली गोरी खेल रही है होली..
 

कंचनकाया कनक-कामिनी, वह गाँव की छोरी
चन्द्रमुखी चंदा चकोर चंचल अल्हड-सी गोरी.
ठुमक ठुमक कर ठिठक-ठिठक कर करती मस्त  ठिठोली.
 

सजना सम्मुख सजकर सजनी
खेल रही है होली..
खेल रही है होली गोरी खेल रही है होली..
 
छन-छन, छनक-छनन छन पायल मृदुल बजाती
सन-सन सनक सनन सन यौवन-घट को भी छलकाती
रंग रंगीले रसिया के छल से भीगी नव-चोली
 
सजना सम्मुख सजकर सजनी
खेल रही है होली..
खेल रही है होली गोरी खेल रही है होली..

पीताम्बर ने प्रीत-पय की भर करके  पिचकारी
मद-मदन मतंग मीत के तन पर ऐसी मारी
उर उमंग उतंग क्षितिज पर लग गई जैसे गोली
 

सजना सम्मुख सजकर सजनी
खेल रही है होली..
खेल रही है होली गोरी खेल रही है होली.. 

गज गामिनी संग गजरा के गुंजित सारा गाँव
डगर-डगर पर डग-मग डग-मग करते उसके पांव
सहज- सरस सुर के संग सजना खाये भंग की गोली
 

सजना सम्मुख सजकर सजनी
खेल रही है होली..
खेल रही है होली गोरी खेल रही है होली..

आपका
शिल्पकार
(चित्र गुगल से साभार

चंदू घर के अन्दर ही नगाड़े पीटने लग गया है.! होली है-भाई होली है "ललित शर्मा "

रसों होली है, नंगाड़ों की मधुर ताल वातावरण कों होली मय कर रही है. कल शाम कों हमारे घर में नगाड़ों की आवाज सुनाई दी. तबियत नासाज होने के कारण मैं सोया हुआ था. देखा तो चंदू घर के अन्दर ही नगाड़े पीटने लग गया है. भाई होली है......बच्चों बूढों सभी के मन में होली की उमंग रहती है. चंदू की बस एक ही जिद रहती है उसे नगाड़े चाहिए. दो चार दिन बजाकर फिर उसका विसर्जन कर डालता है. मतलब बजा-बजा कर फोड़ डालता है और होली पर नए नगाड़ों कों खरीदने का इंतजार करता है. आज सुबह ही उठ कर बिना नहाये धोये नगाड़े बजाने  में लगा हुआ है. देखिये आप भी.......मूड में होता है तो गाता भी है. लेकिन आज नहीं गा रहा था सिर्फ नगाड़े बजाने की ही धुन में लगा हुया है...........इसके साथ एक फाग भी प्रस्तुत है.......जो परम्पराओं के  खजाने से निकाला गया है.......लीजिये आनंद और मनाईये होली..


धीरे बहो नदिया धीरे बहो, धीरे बहो
धीरे बहो नदिया धीरे बहो
राधा जी उतरैं पार
नदिया धीरे बहो


काहेन के तोरे नाव-नउलिया काहेन के पतवार
कौन है तोरे नाव खिवैया कौने उतरै पार
नदिया धीरे बहो


अगर-चंदन के नाव-नउलिया सोनेन के पतवार
कृष्णचन्द्र हैं नाव खिवैया राधा उतरै पार
नदिया धीरे बहो

आपका 
शिल्पकार

मोहन खेलै होरी------होली का रंग-चढ़ गई भंग..........ललित शर्मा ........

फागुन का मौसम है और होली अब कदम बढाते हुए दरवाजे तक पहुँच गई है. हमारे ग्रामांचल में कृष्ण और राधा के होली के फाग गए जाते हैं. गोपियों संग खेली कृष्ण की होली मशहूर है. होली के इर्द-गिर्द बैठ कर जब नगाड़ों की धुन के साथ ये फाग गाये जाते हैं वातावरण होलीमय हो जाता है. ऐसा ही एक गीत परंपरा से हमारे यहाँ गाया जाता है. आप भी आनंद लीजिये..........

मोहन खेलै होरी, मोहन खेलै होरी,
चलो वृषभान के दुलारी

काखर भिंज गै लहँगा,
काखर सारी, काखर सारी
काखर भिंज गै चुनरिया
कौन रंग मारी, कौन रंग मारी
चलो वृषभान के दुलारी

राधा के भिंज गै लहँगा,
ललिता के सारी, ललिता के सारी
चन्द्रावली के चुनरिया
मोहन रंग मारी, मोहन रंग मारी
चलो वृषभान के दुलारी

प्रस्तुतकर्ता 
शिल्पकार, 

फागुन में जरा सा तुम महक जाओ !! (ललित शर्मा)

फागुनी मौसम हो गया है....प्रकृति ने अपनी मनोरम छटा बिखेर दी है....... कल शाम को खेतों की तरफ गया था तो देखा कि वातावरण में भीनी-भीनी खुशबु है जो मद मस्त कर दे रही है....... डूबते हुए सूरज की छटा निराली है. ऐसे उनका याद आ जाना गजब ढा गया........कभी इन खेतों में बेर.....अरहर.......तिवरा-लाखड़ी के लालच में आया करते थे......अब सिर्फ यादें ही शेष है........सूरज डूबता जा रहा है.....लालिमा बढ़ते जा रही है.......और उनकी याद गहराते जा रही है........अनायास ही कह उठता हूँ..............नया  मौसम  आया  है  जरा  सा तुम संवर जाओ(इसके साथ ही डूबते हुए सूरज के कुछ चित्र मैंने खींचे थे उनका भी आनंद लीजिये) 

फागुन में जरा सा  तुम  महक  जाओ
नया  मौसम  आया  है  जरा  सा तुम संवर जाओ
जरा सा हम बदल जाएँ, जरा सा तुम बदल जाओ

जमी  ने भी ओढ़  ली  है  एक  नयी  चुनर  वासंती 
गुजारिश है के फागुन में जरा सा  तुम  महक  जाओ

नए  चंदा- सितारों से सजाओ मांग तुम अपनी
परिंदों  के तरन्नुम में जरा सा तुम चहक जाओ

तुम्हारे  पैर  की  पायल  नया  एक  राग  गाती  है
जरा सा हम मचल जाएँ जरा सा तुम थिरक जाओ

"ललित" के मय के प्याले में तुम भी डूब लो साकी
जरा सा हम बहक जाएँ जरा सा तुम बहक जाओ 
 
पलाश के पेड़ों के पीछे छुपने की कोशिश करता सुरज

 
आखिर क्षितिज से मिलन होना ही था


आपका 
शिल्पकार,

काहे को सताय,बाली उमर लरकैया--होली की तरंग (ललित शर्मा)

स अब फ़ाग-राग और होली का धमाल-व्यंग्य के तीर और स्नेह का गुलाल, ब्लाग जगत मे भी उड़ना शुरु हो गया है। होली का रंग दिखने लगा हैं भंग के साथ---यही होली की रीत है--यही मानुस की प्रीत है----होली के फ़ाग गीतों मे अपुर्व श्रृंगार भरा है। प्रेम उमड़ने लगता है----भावनाओं का सागर हिलोरें लेने लगता हैं। क्या कहने इस त्यौहार के ! बात आनंद लेने की है तो एक मस्ती भरा परम्परागत रुप से गाया जाने वाला फ़ाग प्रस्तुत कर रहा हुँ आप अवश्य आनंद ले और होली के रंग गुलाल का कोष अभी से भरपुर रखें क्योंकि यही आनंद वर्ष भर के लिए उर्जा देता है---किसी भी तरह--हर परिस्थिति मे खुश रहे----बस यही कामना है 

काहे को सताय, काहे को सताय, बाली उमर लरकैया

बारा बरस के उमरिया
राधा-ललिता आय, राधा-ललिता आय
चन्द्रावली और विशाखा
जल भरने को जाय, जल भरने को जाय
बाली उमर लरकैया

काखर फोरे गगरिया
काखर चूमे गाल, काखर चूमे गाल
काखर फाड़े चुनरिया
यशोदा जी के लाल, यशोदा जी के लाल
बाली उमर लरकैया

राधा के फोरे गगरिया
ललिता के चूमे गाल, ललिता के चूमे गाल
चन्द्रावली के चुनरिया
यशोदा जी के लाल, यशोदा जी के लाल
बाली उमर लरकैया

प्रस्तुतकर्ता
शिल्पकार

हो्ली आई रे! होली आई रे! आईए होली का स्वागत करें!!!

मारे ३६ गढ़ में होली का माहौल परम्परागत रूप से बसंत पंचमी से ही प्रारंभ हो जाता है. होलीका दहन स्थल पर पूजा करके अंडा(एरंड) का पेड गड़ाया जाता है प्रति दिन उसके बाद शाम होते ही नवजवानों की टोली नंगाड़ों के साथ फाग गीत गाते है जिसकी लय और तन इतनी उत्तेजक होती है कि कदम अपने ही आप नाचने को मजबूर हो जाते हैं. अगर इसके साथ भंग का रंग हो तो क्या कहने. फिर तो सोने में सुहागा हो जाता है. हम भी अपने नंगाड़ों के साथ होली का मजा लेने में कभी नहीं चूकते थे. छोटे गांवों में तो यह मनोंरजन अभी तक जारी है. लेकिन बड़े गांवों में अब रस्म अदायगी मात्र रह गई है. 
एक से बढ़ कर एक फाग अन्दर मन के तक हिलोर मारते हैं. लेकिन एक परम्परा है जिसका निर्वहन आज तक होता है. वह है फाग गायन से पूर्व गणपति वंदना. इस मंगल कार्य के लिए गणपति को अवश्य मनाया जाता है उसे भूलते नहीं हैं. अब ब्लाग जगत  में होली कि बयार बह रही है. हम भी लेकर आये हैं परम्परा से गाए जाने वाली गणपति वंदना को. इसे किसने लिखा है? इसका तो मुझे पता नहीं है. क्योंकि यह वंदना श्रुति परंपरा से चली आई है मुझ तक। आप भी इसका आनंद ले और होली पर्व का आरम्भ समझें.........................

गणपति को मनाय प्रथम चरण गणपति को मनाय
गणपति को मनाय, गणपति को मनाय प्रथम चरण गणपति को मनाय
गणपति को मनाय प्रथम चरण गणपति को मनाय

एक दंत गज मुख लम्बोदर
सेन्दुर तिलक बरनि ना जाय
गणपति को मनाय प्रथम चरण गणपति को मनाय

माँगत हौं बर दुइ कर जोरे
देहु सिद्धि कछु बुधि अधिकाय
गणपति को मनाय प्रथम चरण गणपति को मनाय

एक अन्य गणपति वंदना है...........................

गणपति को मनाव प्रथम चरण गणपति को मनाव
गणपति को मनाय, गणपति को मनाव प्रथम चरण गणपति को मनाव
गणपति को मनाव प्रथम चरण गणपति को मनाव

काखर पूत भये गणपति
काखर हनुमान, काखर हनुमान
काखर पूत भये भैरो
काखर भये राम, काखर भये राम
गणपति को मनाव प्रथम चरण गणपति को मनाव

गौरी के पूत भये गणपति
अंजनि के हनुमान, अंजनि के हनुमान
काली के पूत भये भैरो
कौशल्या के राम, कौशल्या के भये राम
गणपति को मनाव प्रथम चरण गणपति को मनाव

काखर=किसके
मनाव= मनाना 

आपका 
शिल्पकार

गज़ब कहर बरपा है महुए के मद का भाई........ जोगीरा सर र र र र र र हो..... जोगी जी (ललित शर्मा)

फ़ागुन का मौसम है बस अब मन के रंग-अबीर-गुलाल उड़ रहे हैं, दिलों पर भी मस्ती छाई और हम भी मस्ती मे हैं,  होली आने को जो है, अब उड़े रे रंग गुलाल। अभी से माहौल बन रहा हैं। प्रकृति ने भी अपने समस्त रंगो को धरा पर बिखेर दिया है। सभी झूमे जा रहे हैं, हम भी क्यों पीछे रहें? प्रकृति के संग-संग चलते हैं जैसे पतंग के साथ डोर अपने आप उड़ी जाती है, गिरिजेश भाई ने तो होली का वातावरण गरम करने के बाद ठंडा कर दिया है लेकिन चलिए अब फ़ि्र फ़ागुन की तरफ़ चलते है और आनंद लेते हैं अपनी माटी के जुड़ कर एक गीत का, आपके समक्ष प्रस्तुत है-आशीर्वाद चाहुँगा...........


सरसों  ने  ली अंगडाई गेंहूँ की बाली डोली
सरजू ने ऑंखें खोली महुए ने खुशबु घोली

अमिया पर यौवन छाया जुवार भी गदराया
सदा सुहागन के संग गेंदा भी इतराया
जब रजनी ने फैलाई झोली 
गेंहूँ की बाली डोली

रात-रानी के संग गुलमोहर भी ललियाया
देख महुए की तरुणाई पलास भी हरषाया
जब कोयल ने तान खोली
गेंहूँ की बाली डोली

बूढे पीपल को भी अपना आया याद जमाना
ले सारंगी उसने भी छेडा मधुर तराना
जब खूब जमी थी टोली
गेंहूँ की बाली डोली

गज़ब कहर बरपा है महुए के मद का भाई
आज चांदनी बलखाई बौराई थी तरुणाई
खुशियों की भर गई झोली
गेंहूँ की बाली डोली

आपका 
शिल्पकार,

भंग का रंग........जोगी जी.... जरा....बच के.....!!!

होली का माहौल बन रहा है. रंग-अबीर-गुलाल और गारी-ठिठोली भी चलेगी जम कर भंग भी घुटेगी और ठंडाई के साथ छनेगी-चढ़ेगी. ऐसे हालत में कभी कभी लोग अपने घर का ही रास्ता भूल जाते हैं या बुरा ना मानो होली है कह के थोड़ी "मौज लेने" के चक्कर में रहते हैं. अगर कहीं फँस गए तो "बुरा ना मानो" के अमोघ मन्त्र का प्रयोग करके बच जायेंगे. अगर कोई बुरा मान गया तो फिर...............जोगी.....रा.......फँस गया...............

जब भंग सर चढ़ जाये, होते उल्टे काम
श्याम लाल के घर में, घुसे होलिया राम
घुसे होलिया राम, जमके लाठियां खाई
सर भी फुट गया, और टांगे भी तुडवाई
कहे "ललित" सुनो, तब नानी याद आये 
कंधों पे पंहुचे घर,जब भंग सर चढ़ जाये

आपका
शिल्पकार

ब्लाग जगत है तैयार-बह रही फ़ागुनी बयार (बिरहा फ़ाग)

बसंत ऋतू आ गई है, वातावरण में रौनक छा गई है-आभासी ब्लाग जगत भी इससे अछूता नहीं है. कहीं ढोल-नंगाड़े बज रहे हैं. कही आचारज जी काला मोबिल आईल लेकर तैयार हैं पोतने को. गिरिजेश भाई ब्लागर की अम्मा से गोइठा-गोइठी सकेल रहे हैं. बस यूँ मानिये की फागुन का स्वागत जोर शोर से हो रहा है. हम भी तैयार हैं रंग-गुलाल और अबीर के साथ. खूब खेलेंगे होली. बनारसी भंग का रंग भी चढ़ेगा और सर चढ़ कर बोलेगा. मौसम मतवाला है ऐसे में विरह से व्याकुल एक नायिका क्या कह रही है सुने और पसंद आये तो आशीर्वाद अवश्य दे.........

कैसी कीनी प्रीत बलमवा
कैसी कीनी प्रीत
नैनन की निंदिया, मन को चैना
सगरो ही हर लीना सजनवा 
कैसी कीनी प्रीत बलमवा 

जूही खिली चम्पा खिली
रात रानी भी अलबेली 
कासौं कहूँ मैं मन की बतिया
अगन लगाये देह पवनवा
कैसी कीनी प्रीत बलमवा

मैना बोले सुवा बोले
कोयल मन को भेद ही खोले
बिरहा कटे ना मोरी रतिया 
आयो है रे मस्त फगुनवा
कैसी कीनी प्रीत बलमवा

फागुन आयो रंग भी लायो
कामदेव ने काम जगायो 
देखत ही बौराई अमिया
गाऊँ रे मैं राग कहरवा 
कैसी कीनी प्रीत बलमवा

आनो है तो आ ही जाओ 
प्रीत भरी गगरी छलकाओ 
भीजेगी जब मोरी अंगिया
और भी होगी प्रीत जवनवा 
कैसी कीनी प्रीत बलमवा 

आपका 
शिल्पकार

एक प्रार्थना है !!!!!(ललित शर्मा)

हम मानते हैं कि ईश्वर नाम की कोई अदृश्य शक्ति है जो इस संसार,चराचर जगत को चला रही है नियंत्रित कर रही है. पूरा ब्रह्माण्ड उसी के अधीन है. हम मानते हैं कि संसार की सत्ता के चलाने वाले वही हैं. हम सुखों और दुखों दोनों में उनको ही याद करते हैं. यह प्रार्थना मैंने बहुत पहले लिखी थी, आज आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ. कभी कभी मैं भी गुनगुना लेता हूँ. आप भी गुनगुनाइए तथा पसंद आये तो आशीष दीजिये. अगर कोई गा दे तो सोने में सुहागा समझुंगा।

प्रभु जी मन में अमन कर दो 
मेरे जीवन  में  लगन  भर  दो

राह   ऐसी   दिखाओ  प्रभु,  दुखियों  की  सेवा  हो
निर्बल को बल मिल जाये तेरे  प्रेम  की  मेवा  हो 
हम रहें समीप तुम्हारे,तुम  पास  गगन  कर  दो 


प्रभु जी मन में अमन कर दो 
मेरे जीवन  में  लगन  भर  दो

निर्धन  को  धन मिल जाये, योगी को बन मिल जाये
इस धरती का कर्ज उतारें,हमें ऐसा जनम मिल जाये
जल   जाएँ   सभी   दुर्गुण,  सांसों  में  अगन  भर  दो 


प्रभु जी मन में अमन कर दो 
मेरे जीवन  में  लगन  भर  दो

प्रेम हिरदय में भर जाये,तुम सबका जीवन हरसाओ
बाधाएं दूर हो  सबकी, तुम  ऐसी   करुणा   बरसाओ
जीवन  हो  सरल  सबका, काँटों   को  सुमन   कर  दो

प्रभु जी मन में अमन कर दो 
मेरे जीवन  में  लगन  भर  दो

आपका 
शिल्पकार


हमने लगाना चाहा मुहब्बत का शजर!!

हमने लगाना चाहा मुहब्बत का शजर
मौसम मे किसने घोला है  बहुत जहर
मामला संगीन हुआ वो लाए हैं खंजर
पता नही कब दिखाए लहुलुहान मंजर


बहुत ख़ामोशी होती है तूफान के पहले
लावा पिघलता ही है फौलाद के पहले 
छल करने वालों ने क्या सोचा है कभी 
अंगारे सुलगते हैं कहीं, आग के पहले 


देखो कोई वार पर तुरंत प्रहार करता है
कोई उचित समय का इंतजार करता है
जो खड़ा है साक्षी बनकर रणक्षेत्र  में
इतिहास उसका भी सत्कार करता है

आपका 
शिल्पकार    

एक कविता -अपनी-अपनी गति की ओर "ललित शर्मा"

एक सूखी टहनी पर
कुछ बुँदे स्वाति मेह की
अनायास ही टपक गई
उसने उठ कर अंगडाई ली
 बंधन चरमरा उठे 
जोड़ के टांके चटक गए
जनम रहा था नया वृक्ष
मै आनंदित था कि
अपनी ही शाख को
धरती के सीने में जड़ें रोपकर
पुष्पित पल्लवित होते देखूंगा
एक सिरहन सी रगों में दौड़कर
रोंगटे खड़े कर देती
जरा को यौवन की अनुभूति
कसक जाती
खीसें निपोरता हुआ यौवन
जर्जर बुढापे को देखता है
बुढापा यौवन का भविष्य है
यौवन बुढापे का इतिहास है
दोनों एक दुसरे के विपरीत
फ़िर भी सामंजस्य है
दोनों गुजर जाते हैं
अपनी-अपनी गति की ओर
काल को रौंदते हुए

आपका 
शिल्पकार

कविता का स्वंयवर!!

नव वधु सी
लजाती 
सकुचाती आई
वह कविता
बिना टिप्पणी
बैरंग लिफ़ाफ़े सी
लौट आई
वह कविता
कुछ दिन बाद
कविता का स्वंयवर
रचा गया
कर माल लिए
रावण को वर आई
वह कविता
क्योंकि
भरी सभा मे
रावण ने धनुष
खंडित किया 
अप्रीतम को
वर आई 
वह कविता


आपका
शिल्पकार

इसे अवश्य पढिए-अच्छे लोग किनारे हो गए!!!

कल रात की बात है, हम कुछ लिख रहे थे तभी चैट पर हमारे बड़े भाई गिरीश पंकज जी का आगमन हुआ और उन्होंने पूछ "फौजी भाई क्या हाल चाल है"  हमने कहा नमस्ते भैया सब ठीक है. आनंद है. आज आप हिंदी में लिख रहे हैं. तो गिरीश भाई बोले" कट पेस्ट का जमाना है इस लिए कट पेस्ट कर रहा हूँ" हमने कहा चलिए अच्छी बात है....
कट गया फट गया खिस्को हो गया. अब इसका मोल भी डिस्को हो गया. 
तो गिरीश भाई बोले ये तो कविता हो रही है तुकबंदी" अब मित्रों इस तुक बंदी का सिलसिला चल पड़ा आगे चल कर क्या बना? ज्यों का त्यों आपके सामने प्रस्तु कर रहा हूँ. इस गजल लेखन को गिरीश भाई ने मजमुआ गजल कहा. अब ये मजमुआ गजल आपके समक्ष पेश है. कृपया आपका आशीर्वाद चाहूँगा.

Girish: अच्छे लोग किनारे हो गए/ मंचो पर हत्यारे हो गए
ललित: काले पीले सारे हो गए/सच्चे सब बेचारे हो गए
Girish: लुच्चो का है राज यहाँ पर/ श्वेत सभी कजरारे हो गए.
ललित: मेहनत कश को रोटी नही, चमचों के चटखारे हो गए
Girish: काम यहाँ कुछ कैसे होगा/ खाली-पीली नारे हो गए
ललित: डंडा लेकर घुमने वाले/उनकी आंखो के तारे हो गए
Girish: जो कमजोर बहुत थे वे ही. सत्ता के सहारे हो गए.
          शातिर खुल्ले घूम रहे है. हम अल्ला को प्यारे हो गए....
ललित:सच की राह पे चलने वाले / देखो अब बेसहारे हो गए

Girish: सत्ता पाकर दो कौड़ी भी/ आसमान के तारे हो गए
ललित: छाती पीट पीट के लगाते थे/ झुठे वे सब नारे हो गए
          खुन बह रहा है गलियों मे/ नेता सब हत्यारे हो गए


अब इस तरह यह मजमुआ गजल तैयार हो गई, जैसे थी वैसी ही प्रस्तुत कर रहा हूँ. आखरी की दो पंक्तियाँ 


Girish: जैसे जिन्दगी एक जुआ हो गयी.
ललित: वैसे ही ग़ज़ल मजमुआ हो गयी 
 
आपका
शिल्पकार


 

 

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