शनिवार, 20 मार्च 2010

नवरात्री मे माता का एक जसगीत-------ललित शर्मा

अभी नवरात्री मे माई के सेवा गीत गुंज रहे हैं तथा मेरी इच्छा है कि आपको सुनाए भी जाएं। इसके लिए मेरी कोशिश जारी है। सफ़लता मिलते ही सुनाने के व्यवस्था करुंगा। प्रस्तुत है माता का एक जसगीत (यश गीत)

आबे आबे ओ मोर दाई

आबे आबे ओ मोर दाई, हिरदे के गाँव मा
तोर मया के छांव मा रहितेंव तोर पांव मा
आबे आबे ओ मोर दाई, हिरदे के गाँव मा

मंदिर के घंटी घुमर, कान मा सुनाए
कान मा सुनाए ओ मोर दाई
जानो मानो अइसे लगथे
मोला तै बलाए-मोला तै बलाए ओ मोर दाई

तोर जोत मोर दाई, जग मा जगमगाए
जग मा जग मगाए ओ मोर दाई
तीन लोक चौदह भुवन, तोर जस ल गाए
तोर जस ला गाए ओ मोर दाई
कइसे मै मनाऊ माँ, लइका तोर आवंव माँ
आबे आबे ओ मोर दाई, हिरदे के गाँव मा

ब्रम्हा, बिस्णु, संकर तोला,माथ ये नवाये
माथे ये नवाये ओ मोर दाई
जग के जगदम्बा दाई, जग ल तैं जगाये
जग ल तैं जगाये ओ मोर दाई
करे तैं हियांव मा मया ला पियावं मा
आबे आबे ओ मोर दाई, हिरदे के गाँव मा

रुप तोर कतको दाई, कोन बता पाये
कोन बता पाये ओ मोर दाई
कण कण मा बसे ओ दाई सांस मा समाये
सांस मा समाए ओ मोर दाई
बिनती ला सुनाववं माँ, भाग ला सहरावं माँ
आबे आबे ओ मोर दाई, हिरदे के गाँव मा

आपका
शिल्पकार

कुछ शब्दार्थ

आबे=आईए
मोर=मेरी
दाई=माँ माता
रहितेवं=रहता
तोर=तेरे
पांव=चरण
हिरदे=हृदय
मोला=मुझे
बलाए=बुलाया
अइसे=ऐसे
लागथे=लगता है
मया=प्रेम-स्नेह
आववं=हुँ
सुनाववं=सुनाऊँ

7 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari ने कहा…

सुनवाओ भी पॉडकास्ट करके!!

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत ही सुंदर, शब्दार्थ देकर आनंद पंचगुणित कर दिया.

रामराम.

जी.के. अवधिया ने कहा…

होली में "फागगीत" तो नवरात्रि में "जसगीत" याने कि माता सेवा! वाह ललित जी! प्रत्येक पर्व में आपका उत्साह प्रसंशनीय है!

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। सादर अभीवादन।

padmsingh ने कहा…

आपके अध्ययन, मेहनत और अपनी बहुमूल्य धरोहरों के प्रति समर्पण की झलक दिखती है आपके लेखन में ....
महत्व पूर्ण ये नहीं कि हमें विरासत में क्या मिला है ..... महत्वपूर्ण तो ये है कि हम विरासत में क्या दे कर जा रहे हैं ...
ब्लॉग जगत के लिए आपका योगदान सराहनीय है

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर रचना.
धन्यवाद

आचार्य धनंजय शास्त्री ने कहा…

aapki rachana bahut hi shandar hai padhne me maja aa rahahai