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कविता कहाँ से आएगी?


कविता
बहुत कठिन है
समोसे खाने से नहीं आती
पहले यूँ ही आ जाती थी
टहलते टहलते कभी भी
कागज न हो चादर पर
लिख लेता चंद लाईने,
कभी तकिए के खोल पर
वो अब मुझसे रुठ गयी
देखकर भी नहीं बोलती
बोलकर भी नहीं देखती
राजा नल के आने पर
बाल्टी लेकर दौड़ता हूँ
बिजलीरानी जाने पर
पैरों से पंखा झलता हूँ
हाथों से मच्छर मारता हूँ
नींद नहीं आती मुई
इस भीषण गर्मी में
कविता कहाँ से आएगी?

शिल्पकार

साक्षरता


मै अनपढ
मिला तुमसे तो
सीख गया पढना
चेहरे के भाव
जो सपाट लगते थे
स्वयं कह देते हैं
बिना कहे ही
और मैं पढ लेता हूँ
तुम्हारे अंतरमन  की
साक्षर हो गया हूँ
तुम्हारी एक मुस्कान
छा जाती है नभ बनकर
खामोशी तुम्हारी
मेघों में भरा हुआ वर्षा जल
गर्भ धारण कर रखा हो उसने
हिरण्यमयी गर्भ
वर्षा उपरांत
उजास फ़ैलाने के लिए
मै पढना सीख गया हूँ

अबके वसंत में ------------ ललित शर्मा

महुआ बीनती
वह अनमनी सी लड़की
हँसती है जब
झरते हैं फूल, महुआ के
मन करता है उसके जूड़े में
खोंस दूं कुछ फूल टेसू के
इस वसंत में
उसे पहना दूं हार
सुर्ख सेमल के फूलों का
महुए के फूल बीनती वह
अभिसारिका
जब नदी किनारे बैठ कर
पैरों से छपछपाती है जल
तो उससे बनता है तीरथगढ़
धुंआधार जैसा जल प्रपात
उसके पायल की झंकार
देती झरनों को स्वर
उड़ती है बहुरंगी तितलियाँ
सुनने पायल की झंकार
सामने बैठा पंडुक जोड़ा
चुगता है मनियारी गोटी
कनखियों से देखता मेरी ओर
उड़ रहे हैं धरसा में
शाख से जुदा पीले पात
मन करता है खोंस दूँ
टेसू के फ़ूल और दोना पान
जूड़े में इस वसंत में

 

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