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गज़ब कहर बरपा है महुए के मद का भाई........ जोगीरा सर र र र र र र हो..... जोगी जी (ललित शर्मा)

फ़ागुन का मौसम है बस अब मन के रंग-अबीर-गुलाल उड़ रहे हैं, दिलों पर भी मस्ती छाई और हम भी मस्ती मे हैं,  होली आने को जो है, अब उड़े रे रंग गुलाल। अभी से माहौल बन रहा हैं। प्रकृति ने भी अपने समस्त रंगो को धरा पर बिखेर दिया है। सभी झूमे जा रहे हैं, हम भी क्यों पीछे रहें? प्रकृति के संग-संग चलते हैं जैसे पतंग के साथ डोर अपने आप उड़ी जाती है, गिरिजेश भाई ने तो होली का वातावरण गरम करने के बाद ठंडा कर दिया है लेकिन चलिए अब फ़ि्र फ़ागुन की तरफ़ चलते है और आनंद लेते हैं अपनी माटी के जुड़ कर एक गीत का, आपके समक्ष प्रस्तुत है-आशीर्वाद चाहुँगा...........


सरसों  ने  ली अंगडाई गेंहूँ की बाली डोली
सरजू ने ऑंखें खोली महुए ने खुशबु घोली

अमिया पर यौवन छाया जुवार भी गदराया
सदा सुहागन के संग गेंदा भी इतराया
जब रजनी ने फैलाई झोली 
गेंहूँ की बाली डोली

रात-रानी के संग गुलमोहर भी ललियाया
देख महुए की तरुणाई पलास भी हरषाया
जब कोयल ने तान खोली
गेंहूँ की बाली डोली

बूढे पीपल को भी अपना आया याद जमाना
ले सारंगी उसने भी छेडा मधुर तराना
जब खूब जमी थी टोली
गेंहूँ की बाली डोली

गज़ब कहर बरपा है महुए के मद का भाई
आज चांदनी बलखाई बौराई थी तरुणाई
खुशियों की भर गई झोली
गेंहूँ की बाली डोली

आपका 
शिल्पकार,

Comments :

26 टिप्पणियाँ to “गज़ब कहर बरपा है महुए के मद का भाई........ जोगीरा सर र र र र र र हो..... जोगी जी (ललित शर्मा)”
निर्मला कपिला ने कहा…
on 

बूढे पीपल को भी अपना आया याद जमाना
ले सारंगी उसने भी छेडा मधुर तराना
जब खूब जमी थी टोली
गेंहूँ की बाली डोली
ललित जी बहुत सुन्दर कविता है। फाल्गुन के पूरे रंग छा रहे हैं। बहुत बहुत बधाई।

राजीव तनेजा ने कहा…
on 

समयानुकूल सुन्दर कविता

RaniVishal ने कहा…
on 

Prakarati ke sundar varnan ke sath sundar Faaguni rachana..Aabhar!
http://kavyamanjusha.blogspot.com/

जी.के. अवधिया ने कहा…
on 

"बूढे पीपल को भी अपना आया याद जमाना"

वाह ललित जी! हम भी तो बूढ़े पीपल के मानिन्द हैं। आपने तो हमें भी अपना जमाना याद दिला दिया जब फागुन के इस मदमस्त मौसम में झाँझ, मंजीरों, ढोलक और नगाड़ों के ताल धमाल के साथ गा उठते थेः

काहे को सताय, काहे को सताय, बाली उमर लरकैया

बारा बरस के उमरिया
राधा-ललिता आय, राधा-ललिता आय
चन्द्रावली और विशाखा
जल भरने को जाय, जल भरने को जाय
बाली उमर लरकैया

काखर फोरे गगरिया
काखर चूमे गाल, काखर चूमे गाल
काखर फाड़े चुनरिया
यशोदा जी के लाल, यशोदा जी के लाल
बाली उमर लरकैया

राधा के फोरे गगरिया
ललिता के चूमे गाल, ललिता के चूमे गाल
चन्द्रावली के चुनरिया
यशोदा जी के लाल, यशोदा जी के लाल
बाली उमर लरकैया


वैसे हम बूढ़े हैं तो क्या हुआ, आज भी सींग कटा कर बछड़ों में शामिल है! हा हा

Kusum Thakur ने कहा…
on 

"बूढे पीपल को भी अपना आया याद जमाना
ले सारंगी उसने भी छेडा मधुर तराना
जब खूब जमी थी टोली
गेंहूँ की बाली डोली"

वाह बहुत खूब !!

गिरिजेश राव ने कहा…
on 

ग़जब । इसे कहते हैं शिल्पकारी !!
अवधियाँ जी ने तो इसमें चार चाँद लगा दिए।..
..रिले रेस है, मैंने शुरुआत की, अब आप अंत तक पहुँचाइए।.. :)
ठंडा नहीं हुआ, कुछ अधिक संवेदनशील हूँ .. ऐसी घटनाएँ हुई हैं जिनसे उत्साह ठिठक सा गया है, देखते हैं फिर कब ...?

neeshoo ने कहा…
on 

भाई वाह क्या बात है , लगता है कि इस बार होली को खूब रंग गुलाल उड़ने वाले है ।

Mithilesh dubey ने कहा…
on 

ललित भईया क्या खूब रचना लगी आज , लाजवाब लिखा है आपने , लगता है कि इस बार होली को खूब धमाल होने वाला है ।

ललित शर्मा ने कहा…
on 

@ गिरिजेश राव,
गिरिजेश भाई-आपके बिना रंग कुछ चढ नही रहा है,
बहुत ही फ़ीका हो गया है। कुछ करिये, होली है और दिल पे मत लिजिए।

मेरा यही निवेदन है।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…
on 

बूढे पीपल को भी अपना आया याद जमाना
ले सारंगी उसने भी छेडा मधुर तराना
जब खूब जमी थी टोली
गेंहूँ की बाली डोली

वाह बहुत गजब का फ़ाग गीत.

रामराम.

गिरिजेश राव ने कहा…
on 

'अवधियाँ जी' नहीं 'अवधिया जी'।
भूल के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ।

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…
on 

...अदभुत !!!!

पी.सी.गोदियाल ने कहा…
on 

अमिया पर यौवन छाया जुवार भी गदराया
सदा सुहागन के संग गेंदा भी इतराया
जब रजनी ने फैलाई झोली
गेंहूँ की बाली डोली

बहुत खूब गुरु देव ! अति सुन्दर !!

Dr Satyajit Sahu ने कहा…
on 

मज़ा आ गया

HARI SHARMA ने कहा…
on 

बहुत खूभ बडे भैया
नेचर का वसन्त और उसकी मस्ती
कुछ बात हमारी कुछ नेचर की
मज़ा आया

महफूज़ अली ने कहा…
on 

बूढे पीपल को भी अपना आया याद जमाना
ले सारंगी उसने भी छेडा मधुर तराना
जब खूब जमी थी टोली
गेंहूँ की बाली डोली


इन पंक्तियों ने मन मोह लिया.....


बहुत ही सुंदर प्रस्तुति....


जोगीरा सा रा रा रा रा रा रा रा ......

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
on 

उपयोगी पोस्ट!

राज भाटिय़ा ने कहा…
on 

बहुत सुंदर ललित भाई अब तो होली खेलने को दिल मचलने लगा है. ध्न्यवाद

देवेश प्रताप ने कहा…
on 

बहुत शानदार रचना ......अबतो मन मचल उठा है होली खेलने के लिए

M VERMA ने कहा…
on 

गज़ब कहर बरपा है महुए के मद का भाई
आज चांदनी बलखाई बौराई थी तरुणाई
खुशियों की भर गई झोली
गेंहूँ की बाली डोली
मनभावन रचना, ऋतु प्रासंगिक और सुखद
बहुत सुन्दर

Udan Tashtari ने कहा…
on 

गज़ब कहर बरपा है महुए के मद का भाई
आज चांदनी बलखाई बौराई थी तरुणाई
खुशियों की भर गई झोली
गेंहूँ की बाली डोली


-वाह वाह!! अब आई फागुनी बहार...


आनन्द आ गया!

Anil Pusadkar ने कहा…
on 

nice

अजय कुमार झा ने कहा…
on 

पता नहीं कौन कौन मगजमारी करते रहे ...इतना दिन ..अब कल से हमहुं फ़गुनिया जाते हैं ...कल से देखिए ..अपना भी सारारारा ...जोगीरा सारारारा ....
अजय कुमार झा

मनोज कुमार ने कहा…
on 

बेहतरीन। लाजवाब।

'अदा' ने कहा…
on 

pata nahi aapko kaa hua hai lalit ji...sabka demorlize karne par tule hue hain aap :)
etna badhiyaan koi likhta hai kaa ??
subah se jetna aapka tareef kiye hain otna bhgwaan ka karte to vaitarni paar ho jaate ....haan nahi to..!!

दीपक 'मशाल' ने कहा…
on 

सच में लगा के होरी आ गयी... बहुत ही सुन्दर...

 

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