सोमवार, 15 नवम्बर 2010

तुम्हारी गांधारी दृष्टि

मैं सोचता था
कविता में सिर्फ़ भाव होते हैं
जो अंतरमन से उतरते हुए
कागज पर अपना रुप लेते है
लेकिन जब कविता
तुम्हारे पास पहुंचती है तो
उसमें क्या-क्या नहीं ढूंढ लेते तुम
गांधारी आंखो से
विदुर दृष्टिकोण तुम्हारा
ढूंढ लेता है
शिल्प,बिंब, अलंकार, व्यथा
व्याकरण, छंद, समास
अतिश्योक्ति, रस और श्रंगार
वियोग,करुणा, रसखान
जो मुझे नहीं दिख पाते
वंदन है तुम्हारी गांधारी दृष्टि का

आपका 
शिल्पकार

7 टिप्पणियाँ:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

गांधारी दृष्टि का यह रूप बहुत अच्छा लगा ...

sumit das ने कहा…

bilkul thik bole aap har kavit ko log aap aap anubav se dekhte hai

वन्दना ने कहा…

वाह! इस गांधारी दृष्टि को सच मे नमन्…………क्या खूब लिखा है।

शरद कोकास ने कहा…

गांधारी दृष्टि बिलकुल नया प्रयोग है ।

निर्मला कपिला ने कहा…

गांधारी दृष्टि बहुत सुन्दर बिम्ब । अच्छी लगी रचना
बधाई।

JHAROKHA ने कहा…

bahut hi sarthak avmprashasniy prastuti.ban aakhon se sab kuchh dekhna ek shilpkar ki drishti se hi sambhav hai.
bahut badhiya
poonam

संध्या शर्मा ने कहा…

अद्भुत रचना... बहुत सुन्दर बिम्ब... लाजवाब