बृहस्पतिवार, 5 अगस्त 2010

अतृप्ति को स्वीकार करो--एक कविता---ललित शर्मा

वह मुक्त होकर
मांग रही थी तृप्ति
खुले आम मंच से
एक अतृप्त भटक रहा था
आनंद की तलाश में
तृप्त होना क्यों चाहती हो तुम
अतृप्ति ही तो जीवन है
तृप्त होकर ठहर जाना
रुक जाना
क्यों, जीवन का अंत नहीं है?
अगर पड़ाव को मंजिल नहीं बनाना है
तो अतृप्ति को स्वीकार करो।

6 टिप्पणियाँ:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

अतृप्ति ही तो जीवन है
तृप्त होकर ठहर जाना

गहन चिंतन ...सटीक और सार्थक....

राज भाटिय़ा ने कहा…

क्यों, जीवन का अंत नहीं है?
अगर पड़ाव को मंजिल नहीं बनाना है
तो अतृप्ति को स्वीकार करो।
बहुत खुब ललित जी, धन्यवाद

संगीता पुरी ने कहा…

अगर पड़ाव को मंजिल नहीं बनाना है
तो अतृप्ति को स्वीकार करो।

बहुत सही !!

वन्दना ने कहा…

बडी ही सटीक बात कह दी.....अतृप्तता मे ही तृप्तता छुपी है.

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत गहरी अभिव्यक्ति.

रामराम.

Rahul Singh ने कहा…

कहीं पढ़ी पंक्तियां याद आ रही हैं-
''फिर एक बार और जाल फेंक रे मछेरे,
जाने किस मछली में फंसने की चाह हो,
चंद्रमा के इर्द-गिर्द बादलों के घेरे,
ऐसे में क्‍यों न कोई मौसमी गुनाह हो.''