रविवार, 11 जुलाई 2010

कवि रामेश्वर शर्मा की एक कविता---अंधा

कवि रामेश्वर शर्मा की एक कविता

अंधा

एक अंधा
एक हाथ कटोरा
एक हाथ डंडा
भूख से धंसा पेट
कहता दे दाता
करता गुहार
वहां से गुजरता
हर व्यक्ति
अनदेखा बन
चल पड़ता है
अंधों की तरह
वाह रे!
अंधे की दुनिया
अंधे की सरकार
रोज गरीबी भूखमरी
अखबारों भाषणों से
दे रहे दुहाई
बैठा सिंहासन पर
लाज द्रौपदी की
लुटवा रहा है
कृष्ण को उलझा रहा है
कि यह कथन
कितना सच होगा
उस अंधे से
यह अंधा अच्छा होगा।

कवि रामेश्वर शर्मा
शिवनगर मार्ग
बढई पारा रायपुर (छ ग)
09302179153

12 टिप्पणियाँ:

PRATUL ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
PRATUL ने कहा…

अंधे भिखारी को अनदेखा कर आगे बढ़ने वाले क्या वाकई अंधे होते हैं?
— [1] हाँ, वे अंधे ही तो हैं जो उनके हाथ का कटोरा नहीं देखते.
— [2] नहीं, वे अधिक सजग होते हैं, इसलिए अनदेखा कर आगे बढ़ते हैं.
— [3] हाँ, वे आँख से बेशक अंधे न हों, लेकिन संवेदना से पूरी तरह अंधे होते हैं.
— [4] वे थोड़े अंधे थोड़े बहरे होते हैं.
— [5] उन्हें सुन्दर आँखें नहीं दिखती सो अनदेखा कर आगे बढ़ जाते हैं.

गिरिजेश राव ने कहा…

मुझे 'आप की कलम के अक्षर' पढ़ने में अधिक तृप्ति देते हैं आर्य !

ललित शर्मा ने कहा…

@गिरिजेश राव

पता नहीं क्यों गिरिजेश भाई विगत मार्च के बाद कुछ लिखने का दिल ही नहीं किया है।

शायद कुछ काला जादु किसी ने कर दिया है:)
अगर कोई जानकार बैगा हो तो बताना।
झाड़ फ़ूंक करवानी है।

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर लगी आप की यह कविता,

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

रामेश्वर जी की रचना अच्छी लगी...

झाड फूंक खुद ही करिये ..कविता अपने आप बहेगी..

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत अच्छी लगी रामेशव्र जी की रचना। बधाई।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

अंधेपन के बहाने जीवन की विद्रूपताओं का सुंदर चित्रण किया है।
………….
संसार की सबसे सुंदर आँखें।
बड़े-बड़े ब्लॉगर छक गये इस बार।

singhsdm ने कहा…

रामेश्वर शर्मा की कविता बहुत ही शानदार है....
हर व्यक्ति
अनदेखा बन
चल पड़ता है
अंधों की तरह
वाह रे!
******
बैठा सिंहासन पर
लाज द्रौपदी की
लुटवा रहा है
कृष्ण को उलझा रहा है
कि यह कथन
कितना सच होगा
उस अंधे से
यह अंधा अच्छा होगा।
वाह वाह......!

सुमन कुमार ने कहा…

एक अंधा
एक हाथ कटोरा
एक हाथ डंडा
भूख से धंसा पेट
कहता दे दाता
करता गुहार
वहां से गुजरता
हर व्यक्ति
अनदेखा बन
चल पड़ता है
अंधों की तरह
वाह रे!
अंधे की दुनिया


क्या शानदार लिखा कविता है.
धन्यवाद ........
मेरी कविता भी खो गई है

खो गई है, मेरी कविता
पिछले दो दशको से.
वह देखने में, जनपक्षीय है
कंटीला चेहरा है उसका
जो चुभता है, शोषको को.
गठीला बदन, हैसियत रखता है
प्रतिरोध की.
उसका रंग लाल है
वह गई थी मांगने हक़,
गरीबों का.
फिर वापस नहीं लौटी,
आज तक.

राम त्यागी ने कहा…

बहुत अच्छी लगी ये रचना !!

सुनीता शानू ने कहा…

कवि रामेश्वर शर्मा जी की कविता बहुत अच्छी लगी। यहाँ पढ़वाने के लिये आभार।