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दो रोटियाँ कितना दौड़ाती हैं?

दो रोटियाँ कितना दौड़ाती हैं?


हाड़-तोड़ भाग-दौड़
फ़िर दिमागी दौड़ भाग
जीवन में विश्राम नहीं
दो रोटियाँ कितना दौड़ाती हैं?

झूठ-षड़यंत्र, जोड़-तोड़
फ़िर होती रही धोखा-धड़ी
जीवन में बस काम यही
दो रोटियाँ कितना दौड़ाती हैं?

मेरे आगे, कोई मेरे पीछे
बढता जाता, ऐसे कैसे चलता
क्यों होता मेरा नाम नहीं
दो रोटियाँ कितना दौड़ाती हैं?

शैतानी आँखे, उड़ती पाँखे
सरहद पार, हो आती हैं कैसे
क्या उसका कोई धाम नहीं
दो रोटियाँ कितना दौड़ाती हैं?

अविता-कविता,ढोला-मारु
प्रेम-पींगे,मदमस्त यौवन
बताओ क्या ये बदनाम नहीं
दो रोटियाँ कितना दौड़ाती हैं?


शिल्पकार

Comments :

16 टिप्पणियाँ to “दो रोटियाँ कितना दौड़ाती हैं?”
Sunil Kumar ने कहा…
on 

झूठ-षड़यंत्र, जोड़-तोड़
फ़िर होती रही धोखा-धड़ी
जीवन में बस काम यही
दिल को छू गयी बहुत बहुत बधाई

संगीता पुरी ने कहा…
on 

जिंदगी की सच दिखाती रचना .. दौडने की शुरूआत तो जरूर दो रोटियों से हुई है .. पर आज किसी के भी लालच का अंत नहीं !!

Padm Singh ने कहा…
on 

झूठ-षड़यंत्र, जोड़-तोड़
फ़िर होती रही धोखा-धड़ी
जीवन में बस काम यही
दो रोटियाँ कितना दौड़ाती हैं?

... शर्मा जी बहुत दिनों बात आपकी इतनी खूबसूरत और सशक्त रचना पढ़ने को मिली,,, सचमुच मेरी नज़र मे तो कालजयी रचना है ... मेरा राम राम स्वीकार करें

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…
on 

जीवन भर दो रोटी के पीछे ही तो भागता रहता है इंसान ...यथार्थ को कहती रचना

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…
on 

जिधर देखो उधर पापी पेट का सवाल है

चलो हो जाती है येन केन प्रकारेण उदर पूर्ति

फिर भी शानो शौकत की ज़िन्दगी बिताने को बेताब

"तेरी कमीज़ मेरी कमीज़ से इतनी सफ़ेद क्यूं'

की उधेड़-बुन में लगा मानव, भिड़ा है करने में २+२=५,

तो कहीं मचा रहा बवाल है.

रचना बेहद मार्मिक .... बहुत बहुत बधाई

ब्लॉग जगत के शिखर पर पहुँचने को

केवल नौ सीढ़ी बची है भाई

इसकी भी देते हैं तहे दिल से

आपको बहुत बहुत बधाई

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…
on 

You are right , Lalit ji Sab roti ke bahaane hee hota hai !

ताऊ रामपुरिया ने कहा…
on 

पर पाई पेट इतना भी नही दौडाता, तॄष्णा बैरन पागल बना देती है.

रामराम

अजय कुमार झा ने कहा…
on 

सच बात .....दो रोटियां कितना दौडाती ..

सुज्ञ ने कहा…
on 

जन्म से मृत्यु तक दौडता है आदमी,
दो रोटी एक लंगोटी दो गज कच्ची ज़मीन,
के खातिर जिंदगी में धन जोडता है आदमी,
और जोडते जोडते ही दम तोडता है आदमी ॥

कहीं सुना था।
आपकी रचना ने याद दिला दी। आभार।

यहां भी पधारिये:
http://shrut-sugya.blogspot.com/2010/08/blog-post_26.html

राजकुमार सोनी ने कहा…
on 

सचमुच दोस्त
दो रोटियां काफी दौड़ाती है
कई तरह के करतब दिखाती है रोटियां

अविनाश वाचस्पति ने कहा…
on 

जब तक आप महंगाई से गले न - मिल लें, तब तक दौड़ाती ही रहेंगी और जिनके पास हैं दो सौ करोड़ रोटियां, वे भी तो दौड़ रहे हैं - वे रोटियों के नहीं, रोटी बनाने वाले की तलाश में दौड़ रहे हैं।

ASHOK BAJAJ ने कहा…
on 

वाह !!! क्या कविता है

Asha Joglekar ने कहा…
on 

दो रोटियाँ.............वाकई बहुत दौडाती हैं । पर क्या सिर्प रोटियाँ ?

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…
on 

दो रोटियां...कितना दौड़ाती हैं...?

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…
on 

मंगलवार 31 अगस्त को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है .कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ....आपका इंतज़ार रहेगा ..आपकी अभिव्यक्ति ही हमारी प्रेरणा है ... आभार

http://charchamanch.blogspot.com/

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…
on 

दो रोटियाँ कितना दौड़ाती हैं?

bahut badiya lalitji

 

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