मै जान जाता था
कि अब सर्दी आने वाली है
जब देखता था
तुम्हारे हाथों में
सलाई और ऊन की गेंद
दिन भर के
घर के काम से
अवकाश पाते ही
तुम बुनने लगती थी
मेरे लिए स्वेटर
अपने नेह पूरित
फंदे डाल कर
बुनती थी
हर फंदे के साथ
अपनी दुवाएं
जो सिर्फ मेरे लिए और
सिर्फ मेरे लिए ही होती थी
तुम्हारे स्नेह मंत्र से
अभिमंत्रित स्वेटर को
मै स्कुल जाता था पहनकर
तो पंख उग आते थे मेरे
ऐसा लगता था
मैं घर से उड़ कर
स्कुल पहुँच गया हूँ
यूँ लगता था जैसे
तुम्हारे आंचल में
सिमटा हुआ हूँ मै
कछुए जैसे
हाथ-पैर सिकोड़ कर
सर पर है मेरे तुम्हारा आँचल
उसकी की गर्मी से
जाड़ा कोसों दूर भागता था
किसी विजयी योद्धा की तरह
मै सीना तान कर चलता था
जैसे यह स्वेटर नहीं
"बुलेट प्रूफ जैकेट" है
दुनिया की बुरी नजर
और सारी अनहोनियों
से बचाता था मुझे
माँ तुम ही हो
दुनिया की प्रथम
"आल फ्रूफ जैकेट"
की अविष्कार कर्ता
सर्दियाँ फिर आ गई हैं
मुझे जरुरत है
तुम्हारे स्नेह मंत्र से
अभिमंत्रित स्वेटर की
तुम कहाँ हो माँ ?
माँsssssssssssss!!!
आपका
शिल्पकार
17 टिप्पणियाँ:
माँ के स्नेह की कोई सीमा ही नहीं है , बहुत अछि अभिव्यक्ति . आभार !
ओह्ह!! भावुक कर गये आप आज!!
जाने कहाँ है..मैं भी पुकारता हूँ..ठंड आ गई है!!
अत्यन्त भावपूर्ण अभिव्यक्ति!
ऐ माँ तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी ...
मुझे बरसों पुराना वो दृश्य याद आ गया मै जब कंचे खेल रहा था और माँ सलाई में फँसा आधा बुना स्वेटर मेरी पीठ पर रख कर कह रही थी " अरे तनिक सीधे तो बैठ ..नाप लेना है ..।"
फिर धीरे धीरे .. इन अनुभूतियों के पात्र बदलते गये .. वो एक अलग कहानी है ।
मार्मिक और भावपूर्ण रचना ललित जी !
बहुत भावमय और मार्मिक अभिव्यक्ति शुभकामनायें
माँ के हाथो की दुआ उतर जाती है इन बुने हुए फंदों में .बेहद खूबसूरत रचना लगी यह शुक्रिया
दिल से लिखी गयी रचना !!
माँ की स्नेहमय स्मृतियों को सजीव कर दी है इस कविता ने ...!!
मुझे जरुरत है
तुम्हारे स्नेह मंत्र से
अभिमंत्रित स्वेटर की
तुम कहाँ हो माँ ?
वाकई माँ के स्नेहिल हाथो से बुने स्वेटर की बात ही कुछ और है. भावुक कर देने वाली रचना
मै सीना तान कर चलता था
जैसे यह स्वेटर नहीं
"बुलेट प्रूफ जैकेट" है
दुनिया की बुरी नजर
और सारी अनहोनियों
से बचाता था मुझे
माँ तुम ही हो
दुनिया की प्रथम
"आल फ्रूफ जैकेट"
की अविष्कार कर्ता
बहुत भावुक कर देने वाली रचना। कई बीते पल याद आ गए।
भावुक कर दिया जी
भावुक , यथार्थपरक, माँ के स्नेह से ओत प्रोत रचना , बधाई
wah sharma ji gajab abhi to maatra swetor wali maa hi padh paaya hoon sach me is thand me maa ki buni swetor ki garmahat mahsoos karne laga .
पुराने दिनों की याद दिला भावुक कर दिया आपने
बेहतरीन भावाभिव्यक्ति ललित जी, शुभकामनाएं... अर घणी राम-राम..
बहुत सुन्दर महराज जी
गुरु की महिमा तो अपार है
यही कारण है कि "गुरु गोविन्द दोनों खड़े काके लागूं पाय"
कि अगली पंक्ति तो याद नहीं कर पा रहा हूँ पर इसमें
गुरु को ही बड़ा माना गया है क्योंकि वही गोविन्द तक
पहुचने का मार्ग प्रशस्त करते हैं.
और एक बात " गुरु बिन ज्ञान भेद बिन चोरी"
जहाँ नहीं तहं थोड़ी थोड़ी
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