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इंडी ब्लागर

 

कितना है मुस्किल घरों से निकलना--जन्माष्टमी पर विशेष

युग पुरुष योगेश्वर श्री कृष्ण का आज जन्मदिवस है, इस अवसर पर मन में आया कि कुछ गीत सा रचा जाए। आपके लिए प्रस्तुत है-जन्माष्टमी पर आनंद लें।

पनघट जाऊँ कैसे,छेड़े मोहे कान्हा
पानी नहीं है,जरुरी है लाना
पनघट जाऊँ कैसे,छेड़े मोहे कान्हा

कितना है मुस्किल घरों से निकलना
पानी भरी गगरी को सिर पे रखके चलना
फ़ोड़े न गगरी,बचाना ओ बचाना
पनघट जाऊँ कैसे,छेड़े मोहे कान्हा

गगरी तो फ़ोड़ी,कलाई न छोड़ी
खूब जोर से खैंची और कसके  मरोड़ी
छोड़ो जी कलाई, न सताना ओ सताना
पनघट जाऊँ कैसे,छेड़े मोहे कान्हा

मुंह नहीं खोले,बोले उसके नयना
ऐसी मधुर छवि खोए मन का चैना
कान्हा तू मुरली बजाना ओ बजाना
पनघट जाऊँ कैसे,छेड़े मोहे कान्हा


शिल्पकार

दादी-----कहानी -------(ललित शर्मा)

Comments :

15 टिप्पणियाँ to “कितना है मुस्किल घरों से निकलना--जन्माष्टमी पर विशेष”
पी.सी.गोदियाल ने कहा…
on 

आपको जन्माष्टमी की शुभ-कामनाये !

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…
on 

नटखट नंदलाल पर बढ़िया गीत ....

जन्माष्टमी की शुभकामनायें

arvind ने कहा…
on 

पनघट जाऊँ कैसे,छेड़े मोहे कान्हा.....जन्माष्टमी की शुभ-कामनाये !

राज भाटिय़ा ने कहा…
on 

कल तो ताऊ की पोस्ट से गलती हो गई थी, क्योकि हमे तो किसी भी त्योहार का पता नही चलता, बस आप लोगो की टिपण्णियो से पता चल जाता है...
तो आज..... जन्माष्टमी की बहुत बहुत शुभकामनायें।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…
on 

जन्माष्टमी की रामराम.

रामराम.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (ਦਰ. ਰੂਪ ਚੰਦ੍ਰ ਸ਼ਾਸਤਰੀ “ਮਯੰਕ” - "در. روپ چندر شاسترے "مینک) ने कहा…
on 

मुस्टण्डों को दूध-मखाने,
बालक भूखों मरते,
जोशी, मुल्ला, पीर, नजूमी,
दौलत से घर भरते,
भोग रहे सुख आजादी का, बेईमान मक्कार।
उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार।।
--
"कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्!"
--
योगीराज श्री कृष्ण जी के जन्म दिवस की बहुत-बहुत बधाई!

अविनाश वाचस्पति ने कहा…
on 

दूसरी पंक्ति में जरूरी है लाना की जगह
जरूरी है नहाना करें
फिर देखिए
कितनी टीआरपी बढ़ती है
बाजार की आंधी ऐसे ही तो चलती है।

शरद कोकास ने कहा…
on 

मतलब पानी की तकलीफ उन दिनो भी थी ?

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…
on 

इस बार के ( 7 सितम्बर , मंगलवार ) साप्ताहिक चर्चा मंच पर आप विशेष रूप से आमंत्रित हैं ...आपके लिए कुछ विशेष है ....आपकी उपस्थिति नयी उर्जा प्रदान करती है .....मुझे आपका इंतज़ार रहेगा....
शुक्रिया

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…
on 

प्रिय शिल्पकार बंधुवर ललित शर्मा जी

नमस्कार !
बहुत प्यारा गीत लिखा है …
और कितनी सहजता से , जन मन में रची बसी सुपरिचित शब्दावली में !
संप्रेषणीयता देखते ही बनती है …


फोड़े न गगरी,बचाना ओ बचाना …
छोड़ो जी कलाई, न सताना ओ सताना …
कान्हा ! तू मुरली बजाना ओ बजाना …


आप जब ऐसी रचनाएं प्रस्तुत करते होंगे , जनमानस झूम उठता होगा …

काश ! कभी हमें भी आपके श्रीमुख से कुछ सुनने का सौभाग्य मिल पाता ।

थां'रो कोई सन्देशो पढ्यां नैं भी घणो बखत हुयग्यो अबकाळै तो …
ब्होत उडीक है , बेगा पधारज्यो सा !


शुभकामनाओं सहित …
- राजेन्द्र स्वर्णकार

रानीविशाल ने कहा…
on 

Bahut sundar geet ...shubhkaamnaae!

डॉ. नूतन गैरोला " अमृता " ने कहा…
on 

पनघट जाऊँ कैसे,छेड़े मोहे कान्हा- kanha ki shaitaniyo kaa accha chitran - shikayat gopi kee.achha geet ban padaa hai..

मनोज कुमार ने कहा…
on 

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

और समय ठहर गया!, ज्ञान चंद्र ‘मर्मज्ञ’, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

Vivek VK Jain ने कहा…
on 

geet se 19th century k hindi geet yaad a gye!

Asha ने कहा…
on 

बहुत अच्छी रचना |२०० वी पोस्ट के लिए शुभकामना
के साथ,
आशा

 

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