शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

देख क्रुरता फ़ूलों की हम दंग हो गये--एक गीत

कवि रामेश्वर शर्मा का एक गीत

देख क्रुरता फ़ूलों की हम दंग हो गये

जीवन है या जटिल समस्या तंग हो गये।
आदर्शों के रंग गिरगिट के रंग हो गये।

कपटी भावों में डूबे जग मुंह बोले संबंध हुये
विश्वासों के रुपक पछतावे भर के अनुबंध हुये
सच धोखे के व्यापारी के संग हो गये।

आशाओं का राग रंग तो भ्रम का खेल खिलौना है
संध्या की आशंकाओं में घिरा हुआ दोपहर बौना है
संयम नियम विवशताओं के अंग हो गये।

अपनी-अपनी लोलुपता में मधुमक्खी है लोग बने
परिभाषाओं के प्रपंच में अर्थ व्यर्थ का रोग बने
देख क्रुरता फ़ूलों की हम दंग हो गये।

रामेश्वर शर्मा
शिवनगर मार्ग बढई पारा
रायपुर (छ.ग.)
09302179153

12 टिप्पणियाँ:

इटिप्स ब्लाग टीम ने कहा…

ललित जी छा गये जी आप

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

अपनी-अपनी लोलुपता में मधुमक्खी है लोग बने
परिभाषाओं के प्रपंच में अर्थ व्यर्थ का रोग बने
देख क्रुरता फ़ूलों की हम दंग हो गये।

बहुत बढ़िया ..

DR. PAWAN K MISHRA ने कहा…

chupee krurta kafee khatarnaak hotee hai
bahut badiya

नीरज जाट जी ने कहा…

बहुत बढिया रामेश्वर जी बहुत बढिया।

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

सुन्दर रचना है ..
समय के सच को कहती !
आभार !

शारदा अरोरा ने कहा…

aaj ke samay ka sach , behtar byaan kiya hai ..

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत खुब जी, धन्यवाद

girish pankaj ने कहा…

sundar geet..sachmuch, kabhi-kabhi fool bhi kroor ho jate hai....

पवन धीमान ने कहा…

अपनी-अपनी लोलुपता में मधुमक्खी है लोग बने ..परिभाषाओं के प्रपंच में अर्थ व्यर्थ का रोग बने
....बहुत अच्छी रचना

पवन धीमान ने कहा…

अपनी-अपनी लोलुपता में मधुमक्खी है लोग बने ..परिभाषाओं के प्रपंच में अर्थ व्यर्थ का रोग बने
....बहुत अच्छी रचना

वाणी गीत ने कहा…

कपटी भावों में डूबे जग मुंह बोले संबंध हुये
विश्वासों के रुपक पछतावे भर के अनुबंध हुये
सच धोखे के व्यापारी के संग हो गये।

क्रूर सत्य ...मगर फिर भी अपने आत्मसंतोष के लिए सत्य की राह ना छूटे , कोई आस ना टूटे ...!

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

बेहतर गीत...