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माँ, पत्नी और बेटी------एक कविता-------->>>>>ललित शर्मा 0:-

पुरुष का जीवन मातृशक्ति के ईर्द-गिर्द ही घुमता है, उसे सबकी सुननी पड़ती है, माँ का हक होता है पुत्र पर तो पत्नी भी उतना ही हक जताती है फ़िर पुत्री भी पिता पर अपना हक प्रदर्शित करती है, इन सब के बीच उसे एक कुशल नट की तरह संतुलन बनाना पड़ता है, जरा सी भी चुक हुई और गृहस्थी धराशाई हो जाती है। फ़िर गृहस्थी बचाना हो तो तीनों में से किसी एक को गंवाना पड़ता है और ज्यादातर गाज माँ बेटे के संबधों पर गिरती है, पत्नी कहती है मेरा पति सिर्फ़ मेरा है, अगर तीनों को साथ लेकर चलना है तो कुशल प्रबंधन की आवश्यक्ता है क्योंकि यह एक महाभारत के युद्ध का मैदान जैसा है, जो हमेशा सजा रहता है पता नहीं रणभेरी कब बज जाए, प्रस्तुत है एक कविता, माँ-पत्नी और बेटी.......................


 माँ-पत्नी और बेटी


पृथ्वी गोल घुमती है
ठीक मेरे जीवन की तरह
पृथ्वी की दो धुरियाँ हैं
उत्तर और दक्षिण
मेरी भी दो धुरियाँ हैं
माँ और पत्नी
मै इनके बीच में ही
घूमता रहता हूँ
माँ कहती है,
आँगन में आकर बैठ 
खुली हवा में
पत्नी कहती है 
अन्दर बैठो 
बाहर धुल मच्छर हैं
माँ कहती है
तू कमाने बाहर मत जा
मेरी आँखों के सामने रह
थोड़े में ही गुजारा कर लेंगे
पत्नी कहती है 
घर पर मत रहो
बाहर जाओ
घर में रह के 
सठियाते जा रहे हो
बच्चों के लिए कुछ 
कमा कर जमा करना है
माँ कहती है धीरे चले कर
चोट लग जायेगी
पत्नी कहती है
जल्दी चलो 
अभी मंजिल दूर है
धीरे चलोगे तो 
कब पहुंचोगे वहां पर 
माँ कहती है 
बुजुर्गों में बैठे कर 
कुछ ज्ञान मिलेगा
पत्नी कहती है
बूढों में बैठोगे तो 
तुम्हारा दिमाग सड़ जायेगा 
इन बातों के बीच
एक तीसरी आ जाती है
बेटी भी कूद कर धम्म से 
मेरी पीठ पर चढ़ जाती है
तब कहीं जाकर
मेरा संतुलन बनता है
वह भी कहती है/पापा
क्या मेरा वजन उठा सकते हो
मैं कहता हूँ 
हाँ! बेटी क्यों नहीं?
इन दो धुरियों के बीच 
फ़ुट बाल बनने के बाद
आज तेरे आने से मेरे जीवन में
कुछ स्थिरता बनी है
इन दो धुरियों के बीच 
एक पूल का निर्माण हुआ है
मैं तो तुम तीनो की 
आज्ञा की अवज्ञा नहीं कर सकता
क्योकि  तुम तीनो हो मेरी
जनक-नियंता और विधायिका 

आपका
शिल्पकार

Comments :

35 टिप्पणियाँ to “माँ, पत्नी और बेटी------एक कविता-------->>>>>ललित शर्मा 0:-”
Sadhana Vaid ने कहा…
on 

बड़े ही गूढ और शाश्वत सवाल का हल निकालना चाह रहे हैं आप ! मेरी शुभकामनायें आपके साथ हैं ! माँ और पत्नी के बीच में बेटी निश्चित रूप से एंकर का काम करती है जो जीवन में स्थिरता, ठहराव और संतुलन तो लाती ही है उसे एक दिशा भी देती है ! सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार !

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…
on 

आपकी ये रचना यथार्थ सत्य को कह रही है...बेटी के माध्यम से जो संतुलन बनाया है..काबले तारीफ़ है...

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…
on 

मेरी भी दो धुरियाँ हैं
माँ और पत्नी
मै इनके बीच में ही
घूमता रहता हूँ
माँ कहती है,
आँगन में आकर बैठ
खुली हवा में
पत्नी कहती है
अन्दर बैठो
बाहर धुल मच्छर हैं
Bahut khoob lalit ji bahut khoob, I like this poem very much ! Aapko bhee dil kaa dard bataane kee buri aadat hai :)

arvind ने कहा…
on 

माँ का हक होता है पुत्र पर तो पत्नी भी उतना ही हक जताती है फ़िर पुत्री भी पिता पर अपना हक प्रदर्शित करती है, इन सब के बीच उसे एक कुशल नट की तरह संतुलन बनाना पड़ता है....यथार्थ सत्य .

वाणी गीत ने कहा…
on 

तुम तीनो हो मेरी जनक-नियंता और विधायिका
बहुत अच्छी लगी ये पंक्तियाँ
अपनी जिंदगी से जुडी नारी शक्ति के हर रूप के प्रति इतना आदर ...मन श्रद्धा से भर गया ...

Anil Pusadkar ने कहा…
on 

बडी गहरी बात कह दी ललित,अपना अनुभव तो नही है लेकिन ज़माने को देख कर कह रहा हूं इससे अच्छा संतुलन मैंने कंही देखा नही।

vandan gupta ने कहा…
on 

बहुत ही गहरी बात बहुत ही सरल शब्दों में बयान कर दी।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…
on 

आपने बहुत सुन्दर चित्रगीत प्रस्तुत किया है!

संगीता पुरी ने कहा…
on 

गंभीर चिंतन को सरल शब्‍दों में प्रस्‍तुत करते हुए बहुत अच्‍छी रचना!!

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…
on 

@ मंजु शर्मा जी
ई मेल द्वारा प्राप्त टिप्पणी
आपकी कविता पढ कर मै भाव विभोर हो गयी,
इतनी गहराई से संबंधो को समझना हर किसी के
बस की बात नही है। इसको एक कवि का हृदय ही
समझ सकता है।
आपका आभार

drsatyajitsahu.blogspot.in ने कहा…
on 

sunder kavita bani hai

Kusum Thakur ने कहा…
on 

बहुत ही सरल भाषा में बहुत ही गंभीर बातें कही है आपने . धन्यवाद !!

ताऊ रामपुरिया ने कहा…
on 

बहुत सुथरी बात कही भाई. आज तो पगडी उतार सलाम

रामराम.

Udan Tashtari ने कहा…
on 

गज़ब!! हर दिल में यहीं उमड़ता गुमड़ता है..आपने बहुत सहजता से बात रख दी..जय हो!! आपकी अब तक पढ़ी बेहतरीन रचनाओं में से एक.

सुशील छौक्कर ने कहा…
on 

बहुत खूब ललित जी।

M VERMA ने कहा…
on 

क्योकि तुम तीनो हो मेरी
जनक-नियंता और विधायिका
तीनो रूपों को नमन

Padm Singh ने कहा…
on 

बहुत सुंदर रचना ....
मन प्रसन्न हो गया आज की रचना पढ़ कर

Padm Singh ने कहा…
on 

आप तक पहुँचने का रास्ता अंततः खोज ही लिया
अब तो मिलते रहेंगे ऐसे ही
बहुत बधाई सुंदर रचना के लिए

राज भाटिय़ा ने कहा…
on 

है भगवान..... आदमी तो फ़ुटवाल ही है, इधर से मां ने मारा पेर उधर से बीबी ने मारा. ओर ललू मियां फ़ुदकते रहो बीच मै फ़ुटवाल की तरह से... सुनो तीनो की , करो मन की सदा सुखी रहोगे जी

बहुत ही सुंदर ओर अनमोल रचना.
धन्यवाद

Yashwant Mehta "Yash" ने कहा…
on 

बहुत सुंदर रचना
बहुत गहरी बात

रानीविशाल ने कहा…
on 

Badi gahari baat kahi is rachana ke madhyam se jivan ka yah sundar sanyojan aur santulan bana rahe yahi shubhkaamna hai ....Dhanywaad.

दीपक 'मशाल' ने कहा…
on 

अपने जीवन की उलझन को कैसे मैं सुलझाऊं.. अपनों ने जो दर्द दिए हैं कैसे मैं बतलाऊं..

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…
on 

अत्यंत मार्मिक रचना
एक तरफ माँ की ममता
दूसरी ओर पत्नी की प्रेरणा
और संतुलन कायम रखने के
लिए बिटिया का आगमन
बहुत खूब!

हरकीरत ' हीर' ने कहा…
on 

इतने सारे ब्लोगों को खंगालते हुए मुश्किल से यहाँ तक पहुंची हूँ .....देखा तो ताऊ जी पगड़ी उतारे लठ लिए बैठे हैं ......पहले तो डर गयी ......बाद में पता चला वे लट्ठ से दोनों धुरियों के बीच संतुलन बनाये हैं .....!!

हास्य रूप से शुरू हुई इस कविता ने अंत में आकर मन मोह लिया .....!!

के सी वर्मा ने कहा…
on 

ललित जी,गहन विचारो के मन्थन का फल..यह सुन्दर रचना...उत्तम

mridula pradhan ने कहा…
on 

bahut achche.

Udan Tashtari ने कहा…
on 

बहुत उम्दा बात कह गये...आनन्द आ गया...

vandan gupta ने कहा…
on 

आपकी ये रचना पहले भी पढी और आज भी हर बार एक नया अहसास देती है……………………यथार्थ का गहन चित्रण ………………सम्बन्धों का सन्तुलन काबिल-ए-तारीफ़ है।

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…
on 

इसे कहते हैं सीधी बात ... आपने जो सच सामने रखा है उसे तो शायद सभी लोग अनुभव करते होंगे पर सच इस तरह सामने लाने की हिम्मत बहुत कम लोगों में होती है ... एक तरफ ममता को खोने का डर तो दूसरी तरफ घर की शांति ...
सवाल अब ये है की नब्बे प्रतिशत घर की यही कहानी क्यूँ है? क्या बिव कभी भी सास नहीं बनेगी ... या फिर माँ कभी बहु नहीं थी ?

ZEAL ने कहा…
on 

.
चलती चाकी देखि के दिया कबीरा रोय
दो पाटन के बीच में साबित बचा न कोय

संजय भास्‍कर ने कहा…
on 

बहुत अच्‍छी रचना!!

हरीश प्रकाश गुप्त ने कहा…
on 

बहुत सुन्दर कविता है। जीवन का सच। यथार्थ। हृदयस्पर्शी।

हरीश प्रकाश गुप्त ने कहा…
on 

बहुत सुन्दर कविता है। जीवन का सच। यथार्थ। हृदयस्पर्शी।

Anamikaghatak ने कहा…
on 

बहुत ही भावपूर्ण रचना…………बिल्कुल सही कहा आपने………॥सामन्जस्य बैथाना कोई हंसीखेल नहीं………।बहुत सुन्दर

संध्या शर्मा ने कहा…
on 

आपकी लेखनी को नमन... धन्य कर दिया आपने...

 

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