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गुगल बाबा

इंडी ब्लागर

 

बंजारन की बेटी हूँ मैं तो ये चली

हवा है मेरा नाम मैं बादल की सहेली
आकाश पे छ जाती हूँ मैं बनके पहेली

आँधियों ने आके मेरा घर बसाया
आकाश के तारों ने उसे खूब सजाया
चली जब गंगा की ठंडी पुरवैया
धुप के आंगन में खिली बनके चमेली

चुपके आके कान में बादल ने ये कहा
भर के लाया हूँ पानी तू धरती पे बरसा
प्यास मिटेगी सबकी फैलेगी हरियाली
धरती भी झूमेगी बनके दुल्हन नवेली

जादे के मौसम की मैं सर्द हवा हूँ
पहाडों में भी बहती रही मैं सर्द हवा हूँ
फागुनी रुत में सिंदूरी हुआ पलाश
पतझड़ आया तो फिरि मैं बनके अकेली

सदियों से मैं तो यूँ ही चलती रही हूँ
चलते-चलते मैं कभी थकती नही हूँ
बहना ही मेरा जीवन चलना ही नियति है
बंजारन की बेटी हूँ मैं तो ये चली


हवा है मेरा नाम मैं बादल की सहेली
आकाश पे छा जाती हूँ मैं बनके पहेली।


आपका
शिल्पकार

(फोटो गूगल से साभार)

Comments :

6 टिप्पणियाँ to “बंजारन की बेटी हूँ मैं तो ये चली”
Udan Tashtari ने कहा…
on 

बेहतरीन!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
on 

हवा है मेरा नाम मैं बादल की सहेली
आकाश पे छा जाती हूँ मैं बनके पहेली।

बहुत सुन्दर!
बधाई!

Ram ने कहा…
on 

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Pankaj Mishra ने कहा…
on 

अत्यंत सजीवता कविता में

रंजना ने कहा…
on 

सुन्दर कविता....बादलों और वर्षा ऋतु का बड़ा ही सजीव चित्र खींचा आपने शब्दों के माध्यम से...

Appu ने कहा…
on 

सुन्दर कविता

 

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