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वह माँ के आंचल की छाया !!!!!!!

ओ!!! मेरे प्रियतम सजना
लौट के आ घर दूर नही
बात जोह रही राह है तेरी
आ जा अब तू जरुर यहीं
बालकपन का भोला बचपन
रह-रह याद दिलाता है
गांव पार का बुढा बरगद
तुझको रोज बुलाता है
खेलकूद कर जिस पर तुने
यौवन पाया जरुर यहीं
ओ!!!!मेरे परदेशी सजना......
पनघट की जिस राह चला तू
उसकी याद सताएगी
चंदा की पायल की छम-छम
प्रीत के गीत सुनाएगी
पंख फैलाये नाचेंगे तेरे
चारों ओर मोर वही
ओ!!!मेरे परदेशी सजना.........
आए बसंत तो सुमन खिलेंगे
पवन झकोरे खूब चलेंगे
महकाए जो तुझे हमेशा
मधुर सुवासित समीर बहेंगे
खेतों की विकल क्यारी की
तुझे याद आएगी जरुर कहीं
ओ!!!! मेरे परदेशी सजना.........
वह माँ के अंचल की छाया
जिसमे छिपकर सो जाता था
वही पुराना टुटा छप्पर
जहाँ सपनों में खो जाता था
मधुर सुरीली माँ की लोरी
तुझे तडफाएगी जरुर कहीं
ओ!!!!मेरे परदेशी सजना
लौट के आ घर दूर नही
आपका
शिल्पकार

(फोटो गूगल से साभार)

Comments :

4 टिप्पणियाँ to “वह माँ के आंचल की छाया !!!!!!!”
एकलव्य ने कहा…
on 

बहुत ही बढ़िया रचना अच्छे भावो के साथ . बधाई .

aarya ने कहा…
on 

भाई जी
सादर वन्दे
सुन्दर रचना

Mithilesh dubey ने कहा…
on 

बहुत ही सुन्दर रचना। बधाई

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…
on 

ललित भईया, यादों की तड़फ को शव्‍दों में बहुत भावनापूर्ण उकेरा है आपने. आभार.

 

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