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गुगल बाबा

इंडी ब्लागर

 

जंजीरों से बांधने वाली सभ्यता

मैं जंगली हूँ,
सीधा सा,भोला सा
सबसे डरने वाला
अपनी छोटी सी दुनिया में
बसने वाला,रहने वाला
अपने जंगल को चाहने वाला
एक मृग के पीछे चला आया
रास्ता भटक गया,
पकड़ लिया गया मुझे
शहर में घेरकर


जंजीरों से बंधा गया मुझे
इनमे मेरा अपना कोई नही था
सब पीछे जंगल में छुट गया
मेरी माँ,मेरा कुत्ता,मेरी शान्ति
अब ये मुझे पाल रहे हैं
कुर्बानी के बकरे की तरह
जगह -जगह भीड़ में घुमाते है मुझे
बन्धनों में जकडा छटपटाता हूँ मैं
मुझे मेरे घर की याद आती है
मेरा घर
मेरा जंगल बुलाता है मुझे
मैं उसके पलंग के पाए से बंधा हूँ
पामेरियन कुत्ते की तरह
वे हँसते हैं तो
मुझे बड़ा डर लगता है
उनकी हँसी बड़ी डरावनी है
कैसी विडम्बना है
शहरी जंगल से डरता है
जंगली शहरी से डरता है,
दोनों डरते हैं,
वे मुझे चाहते हैं,
पुचकारते हैं ,दुलारते हैं,
लेकिन मैं जंगली,सिर्फ़ जंगली
जंगल की रट लगाये रहता हूँ



वह भी मुझे दुलारती है
पुचकारती है खिलाती है
अपने आंचल में बाँध लेना चाहती है
मै जंगल में अपना
भविष्य देखता हूँ
इन जंजीरों को तोड़ना है
तोड़ने का प्रयास करूँगा
आजाद होना चाहता हूँ
इस कैद से
यहाँ पर सब अपने हैं लगता है
पर अपना सा कोई नही होता
कुछ समय का अनुबंध है अभिनय का
छुट कर जाना चाहता हूँ
अपने जंगल में
जो सिर्फ़ मेरा है
अपना सा है/सभ्य है
एक बार इस कैद से छुट जाऊँ
फ़िर कही नही आऊंगा
शहर में
जंजीरों से बांधने वाली
सभ्यता में
गूम होने के लिए 

आपका
शिल्पकार

(फोटो गूगल से साभार)

Comments :

1
संजीव तिवारी ने कहा…
on 

बहुत ही सुन्‍दर कविता ललित भाई, आभार.


आपको विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनांए.

 

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