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प्रभु जी मन अंधकार हरो, कर दो जगमग अंतर मन को,करुणा दीप धरो


प्रभु जी मन अंधकार हरो 
कर दो जगमग अंतर मन  को,करुणा दीप धरो


मैं  प्राणी   माया   बंधन  में,  बंधा   रहा   हमेशा
मतवालों   की   इस   नगरी  में, दूर करो कलेशा
तेरी   करुणा  का   प्यासा   हूँ,शीश  पे  हाथ धरो

प्रभु जी मन अंधकार हरो 
कर दो जगमग अंतर मन को,करुणा दीप धरो

खूब  सजाया ये तन मैंने,आतम ना  सिंगार किया 
खडा था खजूर ही बन के,छाया का ना प्रसार किया 
ये   जीवन भी  बीता  जाये, कुछ  तो   ध्यान  धरो 


प्रभु जी मन अंधकार हरो 
कर दो जगमग अंतर मन को,करुणा दीप धरो

खूब कमाई धन और दौलत,व्यसनों में ही सना रहा
जब  आई  जाने  की वेला,  सबका सब  ही पड़ा रहा 
कोई  भी  ना  ले  जा पाया कुछ भी,लाख जतन करो

प्रभु जी मन अंधकार हरो 
कर दो जगमग अंतर मन को,करुणा दीप धरो

तेरी शरण में आके प्रभु जी,"ललित"क्या मांगेगा 
सोया  पढ़ा   रहा है  मनवा, झटपट  उठ  जागेगा 
जो चाहोगे सभी मिलेगा,तुम उसकी लगन  लगो


प्रभु जी मन अंधकार हरो 
कर दो जगमग अंतर मन को,करुणा दीप धरो

आपका 
शिल्पकार 

(फोटो गूगल से साभार)






Comments :

2 टिप्पणियाँ to “प्रभु जी मन अंधकार हरो, कर दो जगमग अंतर मन को,करुणा दीप धरो”
समयचक्र - महेंद्र मिश्र ने कहा…
on 

प्रभु जी मन अंधकार हरो
कर दो जगमग अंतर मन को,करुणा दीप धरो
बहुत बढ़िया रचना . धन्यवाद

kriti ने कहा…
on 

this is very innovative and different type of poem and very stupendous job is done by poet and well wishes with him and always write poem like this. may god bless you forever and make you more ac curable to write poem.

 

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