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गुगल बाबा

इंडी ब्लागर

 

बहारें चली गई,प्राण में बिना नयी सांसे भरे


एक बार 
दीये फिर जल उठे थे
लगा की उजड़ा चमन 
आज बस गया
लगा की बहारें 
आज लौटी हैं फिर
कुछ प्राण में नयी 
सांसे भरने को 
उदासी में कुछ 
उमंग भरने को
तम में कुछ 
उजास भरने को
सहसा एक हवा चली 
दीये  बुझ गये
बहारें चली गई
बिना प्राण में 
नयी सांसे भरे 
मैं बैठा था 
उसकी प्रतीक्षा में
इस चमन को 
आंसुओं से सींचते 
बुझे दीयों में 
अपना खून जलाते
तम को दूर करने का 
भरसक प्रयास करते हुए
हमेशा की तरह 


आपका 
शिल्पकार



(फोटो गूगल से साभार)


Comments :

8 टिप्पणियाँ to “बहारें चली गई,प्राण में बिना नयी सांसे भरे”
sandeep ने कहा…
on 

bahut badhiya kavita hai, ye hi hota hai.jivan me kai rang hain. badhai

udaychadra ने कहा…
on 

sundar kavita

sunilkaushal ने कहा…
on 

ललित भैया,बहुत सुन्दर चित्रण,कविता के माध्यम से
बधाई।

जी.एल. शर्मा ने कहा…
on 

उम्दा कविता-बधाई

school ने कहा…
on 

बहुत सुन्दर कविता बधाई।

shruti priya ने कहा…
on 

मैं बैठा था
उसकी प्रतीक्षा में
इस चमन को
आंसुओं से सींचते
बुझे दीयों में
अपना खून जलाते

सुन्दर अभिव्यक्ति

ललित शर्मा ने कहा…
on 

धन्यवाद संदीप जी। शुभकामनाएं

ललित शर्मा ने कहा…
on 

धन्यवाद उदय भाई, शुभकामनाएं

 

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