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गुगल बाबा

इंडी ब्लागर

 

शिल्पकार कहिन

पाठकों,
कुछ बरस पहले एक कवि की कविता सुनी थी, उनका नाम मुझे
याद नही है, ये कविता आप तक पंहुचा रहा हूँ

छींक उनको भी आती है ,
छींक हमको भी आती है ,
उनकी और हमारी छींक मै बड़ा अन्तर है,
हमारी छींक साधारण है , उनकी छींक मै जादू मंतर है,
हमारी छींक छोटे नाक की है, उनकी छींक बड़े धाक की है,
हमारी छींक हवा मै यूँ ही खप जाती है , उनकी छींक आखबारों मै छप जाती है,

हमारे साथ भी ये होता रहा है, इस संसार को बसाने वाले रचाने वाले निर्माण कर्मी समुदाय की पूछ परख करने वाला कोई भी नही है, मेने अख़बारों मै पढा की इंटरनेट पर अपनी बात कहने की एक नई विधा आई है, जिसे ब्लॉग कहते हैं। तो मेने भी सोचा की इस सुविधा का लाभ उठाया जाय और अपनी बात लोगों तक पहुंचाई जाय। मेरे ब्लॉग लिखने से पहले मेने किसी का ब्लॉग नही पढा था, गांव मै रहने के कारन कोई ऐसा भी नही था जो मुझे इसके बरी मै जानकारी देता , एक दिन इंटरनेट पर ये कारनामा मेने कर ही डाला "शिल्पकार के मुख से" नामक ब्लॉग बना ही डाला तथा जो मेरे मन मै आया लिख डाला, कुछ दिनों के बाद पुन: ब्लॉग खोलने पर टिप्पणियाँ नजर आई, उन्हें मेने उत्सुकता के साथ पढ़ा, बड़ा अच्छा लगा, लोगों ने मेरा उत्साह वर्धन किया, एक सज्जन सिर्फ़ नारायण- नारायण कह कर चले गए, मुझे थोडी कोफ्त हुई, उन्हें अच्छी या बुरी कोई भी टिप्पणी करनी चाहिए थी, एक भाई ने लिखा "जब हम सच्ची बात कहते हैं तो जमाने को अखर जाती है" अरे भाई जब सदियों से उपेक्षित प्रताडित समाज का कोई आदमी जब अपने हक के लिए खड़ा होता है तो सामन्तवादी विचार धाराओं के लोगों को कहाँ सहन होगा?
लेकिन अब भारत के १४ करोड़ परम्परागत शिल्पकारों को भी अपने हक के लिए खड़ा होना ही पड़ेगा। आजादी के ६० सालों मै हमे क्या मिला, पुरे भारत मै विस्वकर्मा वंशियों के इतने बड़े समाज मै इस समाज का एक भी आदमी दिल्ली की बड़ी पंचायत मै हमारी बात कहने को नही है, हमारी प्रताड़ना सुनने वाला कोई नही है, जबकि ये समाज हमेसा से एक योगी की तरह निर्माण की अपनी साधना मै लगा रहा है। अनवरत समाज के लिए अपना खून और पसीना बहते रहा है, इसने कभी सर्दी - गर्मी- बरसात -आग- शोलों की चिंता नही की। क्योंकि इसके शरीर मै छेनी हथौडेकी धवनी से ही रक्त का संचार होता है, मैंने भी ये काम किया है। लेकिन अब इस समाज को जगाना ही होगा, ओउद्योगिक कर्ण के कारन इस समाज खानदानी पेशा ख़तम हो गया है। अब इसके सामने रोजी-रोटी की समस्या खड़ी हो गयी है। परम्परागत रूप से काम करने वाले सभी समाजों का येही हॉल है।
छत्तीसगढ़ मै एक समुदाय है जो सदियों से बुनकारी का काम करते रहा था। "पनिका समाज" जिसे लोग यहाँ पर "मानिकपुरी समाज" के नाम से भी जानते हैं। मुझे लग-भग ४०० परिवारों से मिलने का सौभाग्य मिला। आज ये लोग बहुत ही गरीबी मै जीवन बसर कर रहे हैं। किसी के घर मै भी कपड़ा बनने का कम नही होता। क्योंकि मशीनों के बने कपड़े बाजार मै हैं तो इनके हाथ से बने कपड़े कौन खरीदेगा? आज भारत के सभी कुशल कारीगरों की येही दशा है, जिस तरह सभी समाजों कोमिलाकर इस देश का निर्माण हुवा है, उसी तरह हमारा भी इसमे योगदान है। परम्परागत शिल्पकार वर्ग के लोगों को मुलभुत संविधान प्रदत्त सुविधाएं भी नही मिल पाई हैं। २४ जुलाई को जी छत्तीसगढ़ पर कोरिया जिला की नाथारेली पंचायत के बैजनाथ विश्वकर्मा का समाचार दिखाया गया था। जिसमे बताया की वह ११ सदस्यों के परिवार के साथ एक १० गुना १०फुट की झोपडी मै निवास करता है। तथा पत्थर के सिल बनाने का काम करता है। उसके बच्चे स्कूल नही जाते उसके साथ काम मै हाथ बताते हैसरकारी योजनायें इस परिवार से कोसो दूर हैये शिल्पकार समुदाय पुरे भारत मै भीषण गरीबी मै जीवन बसर कर रहा हेअभी मुझे जानकारी मिली थी की महाराष्ट्र मै एक पंचाल युवक को दबंगो ने मार डालाइसके बाद भी कोई "नारायण-

नारायण" कह कर उपहास करे ये ठीक नही है

(प्रतिक्रियाएं आमंत्रित हैहम तो आपके सहयोग के आकांक्षी हैं।,)

आपका

शिल्पकार

Comments :

2 टिप्पणियाँ to “शिल्पकार कहिन”
A desk of An Artisan ने कहा…
on 

ye ek bahut hi bada mudda hai.Jis par hakikat me sarkar ne koi dhyan nahi diya.swagat hai.

Dr Satyajit Sahu ने कहा…
on 

MOVEMENT LIKE THIS IS VERY MUCH REQIRED TO RAISE THE ISSUE AND MAKE JUSTICE TO THE OPPRESSED PEOPLE.

 

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