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साजन के संदेशे अब हमें मिल गए

साजन के संदेशे अब हमें मिल गए
हजारों कंवल मन में अब खिल गये

चल  पड़ेंगे  अब सफ़र में सोच कर 
मन  के  दुवारे हजारों दीप जल गए

ये कैसा मिलन का आनंद है साजन
दुनिया   के  सब  मेले  फीके रह गए

मिलन  की  आस लगी थी दिन रैन 
मिलेंगे  अब  नये चमन में कह गए

साँस  यूँ  आई   बड़ी   जब   जोर  से 
मौत  के  किवाड़  सब  ये   खुल  गये

आपका 
शिल्पकार

Comments :

10 टिप्पणियाँ to “साजन के संदेशे अब हमें मिल गए”
जी.के. अवधिया ने कहा…
on 

"साजन के संदेशे अब हमें मिल गए
हजारों कंवल मन में अब खिल गये"


सावन के झूले पड़े तुम चले आओ ....

संगीता पुरी ने कहा…
on 

वाह सुंदर रचना !!

पी.सी.गोदियाल ने कहा…
on 

क्या ललित साहब , आज बहुत उदास दिख रहे हो कविता में !

Kusum Thakur ने कहा…
on 

बहुत अच्छी अभिव्यक्ति है , बधाई !!

ताऊ रामपुरिया ने कहा…
on 

वाह बहुत लाजवाब.

रामराम.

नीरज गोस्वामी ने कहा…
on 

अच्छे भाव वाली रचना है...लिखते रहें...
नीरज

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…
on 

साँस यूँ आई बड़ी जब जोर से
मौत के किवाड़ सब ये खुल गये
बहुत सुन्दर.

राजीव तनेजा ने कहा…
on 

भावपूर्ण रचना

GK Khoj ने कहा…
on 

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GK Khoj ने कहा…
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