शिल्पकार. Blogger द्वारा संचालित.

चेतावनी

इस ब्लॉग के सारे लेखों पर अधिकार सुरक्षित हैं इस ब्लॉग की सामग्री की किसी भी अन्य ब्लॉग, समाचार पत्र, वेबसाईट पर प्रकाशित एवं प्रचारित करते वक्त लेखक का नाम एवं लिंक देना जरुरी हैं.
स्वागत है आपका

गुगल बाबा

इंडी ब्लागर

 

रोटी तू तो छलना है- महाठगनी है

रोटी तू तो
जीवन है मेरा
मर जाता
तेरे बिना मैं
तू मेरी महबूबा है
प्रियतमा है
सब कुछ
रोटी तू
नदिया है
आशा-निराशा
रोना-हँसना
सूख-दुख
बहा ले जाती है
अपने साथ
सब कुछ


रोटी तू तो
सागर है
गाली,झूठ
थप्पड़
माँ का दुःख
समा लेती
अपने अन्दर
सबकुछ
रोटी तू तो
गोल है
समय का चक्र
गाड़ी का पहिया
कुम्हार का चाक
सूरज का गोला
सबकुछ
रोटी तू तो
छलना है
महाठगनी है
लेती है
अपने बदले
इज्जत
हर लेती है
सब कुछ




आपका
शिल्पकार

(फोटो गूगल से साभार)

चाहत में वफ़ा का तोहफा नायाब दूंगा


तुम्हारे  हर सवाल का आज जवाब दूंगा
पूछो तुम मै  एक  एक का हिसाब  दूंगा

बहुत सवाल खड़े किये तुने मेरे प्यार पे 
एक  बार नहीं  हजार  बार  जवाब  दूंगा 

रुको भागो मत सब तुम सुनकर जाओ 
जब  चाहा  है तुम्हे प्यार बेहिसाब दूंगा

क्यों  शक किया है तुमने मेरे प्यार पर 
एक  गजल क्या प्यार की किताब दूंगा

यूँ  इल्जाम  ना  लगाओ  मेरे प्यार पर 
चाहत  में  वफ़ा का तोहफा नायाब दूंगा  


आपका 
शिल्पकार



(फोटो हरविंदर गूगल से साभार)

 

लडेगा कौन इनसे सर पर कफ़न बांध कर


लडेगा कौन इनसे सर पर  कफ़न बांध कर
आते हैं ये चोर भी घर से   कफन बांध कर


कल रात खिड़की से घर  में सारे  घुस गये
ले  गये  सब  कुछ  मेरे  हाथ  पैर बांध कर

मैं जोर से रात में चोर चोर चिल्लाता  रहा
कोई पडोसी न जगे सोये रहे मुंह बांध कर 


थाने गया रपट लिखने वहां बड़ा  हंगामा था
सुना कोई चोर भागा है  सिपाही को मारकर


सायरन बजाते पुलिस की गाड़ी  निकल गयी
एक बोला मरने आते हैं साले कफन बांध कर


आपका
शिल्पकार


(फोटो गूगल से साभार) 

समंदर का सफ़र है क्यों डरूं ऊँची लहरों से


आज  पुरानी   हवेली   के   किवाड़   खोलूँगा
तेरा   ख्याल    आया  तो   उदास   हो  लूँगा

तेरी   याद   में   आँखों    से   आंसू   गिरेंगे
चलो  एक  बार  फिर  से  मुंह  तो  धो लूंगा

बदलता  हुआ  मौसम  खुशबु  लायेगा तेरी
मैं  दिल  में  दुःख  के  नये  बिरवे  बो  लूँगा

भले  ही  तेरी   यादों  के  आ  जाये  तूफान
तू करीब  तो  आ  एक  बार  देख  तो  लूँगा

समंदर का सफ़र है क्यों डरूं ऊँची लहरों से
मैं  वो  नहीं  हूँ  जो अपनी कश्ती डुबो लूँगा

प्रीत  की  मय नहीं तो गम का जहर ही सही
सदियों की प्यास बुझेगी जब लब भिगो लूँगा

इस दिल का जलना भी एक अहसान है "ललित" 

गम   की   स्याह    रातों  को   तो   रौशन  बोलूँगा


आपका 
शिल्पकार
(फोटो गूगल से साभार)

कह गए नयन मेरे


ढूंढ़ते हैं 

तुझको
अरसे से
नयन मेरे 
तेरे जाने से
तुझे देखने
बहुत तरसे हैं
नयन मेरे
हर पल 
सावन से
अनवरत 
बहुत बरसे हैं
नयन मेरे
नहीं चैन
एक पल भी
व्याकुल थे
नयन मेरे
उस दिन 
जब तुम आई
तो मारे ख़ुशी के
छलक उठे 
नयन मेरे
ठहरा वक्त 
सिहर उठा मै
जब दिखे 
नयन तेरे
कुछ कहने को
तरसे अधर मेरे
ना अधर खुले
ना संवाद हुआ
जो कुछ
कहना था
कह गए 
नयन मेरे


आपका
शिल्पकार


(फोटो गूगल से साभार)

नया मौसम आया है जरा सा तुम संवर जाओ



नया  मौसम  आया  है  जरा  सा तुम संवर जाओ
जरा सा हम बदल जाएँ, जरा सा तुम बदल जाओ

जमी  ने  ओढ़  ली  है  एक  नयी  चुनर  वासंती 
गुजारिश है के  अब  जरा  सा  तुम  महक  जाओ

नए  चंदा- सितारों से सजाओ मांग तुम अपनी

परिंदों  के तरन्नुम में जरा सा तुम चहक जाओ

तुम्हारे  पैर  की  पायल  नया  एक  राग  गाती  है
जरा सा हम मचल जाएँ जरा सा तुम थिरक जाओ

"ललित" के मय के प्याले में तुम भी तैर लो साकी
जरा सा हम बहक जाएँ जरा सा तुम बहक जाओ



आपका 
शिल्पकार

(फोटो गूगल से साभार)

कैसे मै ओढूँ राम चदरिया.........




कैसे   मै  ओढूँ राम चदरिया...................................
पाप की गठरी सर पे धर के कैसे आऊं मै तेरी दुवरिया
कैसे   मै  ओढूँ  राम चदरिया...................................

जो  चोला   तुने   दिया   था,   वो   मैला   कर   डाला 
पाप   कर्म   कर  के    निस दिन ,ना  देखा  ना   भाला
रार  ठान  कर  बैर   पाल  कर,  करता    रहा   बुरईया
कैसे मै  ओढूँ राम चदरिया.....................................

झूठ पाखंड कपट करने में, मुझको बड़ा  ही  रस  आया
माया नगरी  की चक मक  ने, निस दिन ही  भरमाया 
तन भी मैला,मन भी मैला,कैसे आऊं मैं तेरी नगरिया
कैसे मै ओढूँ राम चदरिया......................................

राम रतन ही असली  रतन  है, बाकी सब  रतन  झूठे 
कांकर   पत्थर   सकेल   रहा  है, करम  ही  तेरे   फूटे 
राम  रतन  ही  श्रेष्ठ रतन  है, कर ले उसे ही सांवरिया 
कैसे मै  ओढूँ राम चदरिया.....................................

आपका
शिल्पकार



(फोटो गूगल से साभार)




मांझी हूँ मुझे बस कोई पतवार चाहिए,२२ साल पुरानी ग़ज़ल

मित्रों! काफी दिनों पहले लिखी हुई ग़ज़ल है, लग-भग २२ साल हो गये होंगे मुझे अभी दीवाली के सफाई कार्यक्रम में मिल गई जिसे हमारे बड़े भाई गिरीश पंकज जी ने संवारा है वही ग़ज़ल आज आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ,आशा है पसंद आएगी.  



वक्त को  रुकने  का  इक   आधार  चाहिए
मांझी  हूँ  मुझे  बस  कोई पतवार चाहिए

झुलसा  है  मन  मेरा ज़माने की आग से
अब   प्यार  की   ठंडी  इसे फुहार चाहिए

बेगानी   दुनिया   में  अपनों  की है तलाश
सीने  से  जो  लगे मुझे  वह  प्यार  चाहिए

चिंगारियां है इश्क की अब तो सुलग रही
जो  तोड़  दे  सीमा  को वही ज्वार चाहिए


अबके  फिजां  में वैसी रौनक  नहीं मिली

अरमां   को   जगा दे   वो  बहार   चाहिए

मरने   के  बाद  यारों  अर्थी  को मेरे कोई
मंजिल  तक  ले  जाये वही कहार चाहिए 


आपका
शिल्पकार 


(फोटो गूगल से साभार)

ढूंढ़ रहा हूँ मै अपने असली चेहरे को




 
मैं  एक बहुरुपिया हूँ 
क्षण - प्रतिक्षण
मुखौटे बदल लेता हूँ
तू है तो तेरे जैसा
मै हूँ तो मेरे जैसा
न जाने सुबह से शाम तक
कितने रूप बदलता हूँ
बेटा,पिता,पति
चाचा,ताऊ,मामा,आदि आदि
आचार्य, कवि, चित्रकार
उद्घोषक, संचालक आदि आदि
किसान,जवान,सियान
मुर्ख, विद्वान्,बुद्धिमान आदि आदि
मित्र ,शत्रु, आलोचक,
समीक्षक,परीक्षक आदि आदि
अभियुक्त, मुंशी, न्यायाधीश,
गवाह, वकील, आदि आदि,
क्लर्क ,चपरासी, अधिकारी,
चौकीदार, अर्दली आदि आदि
भंगी, पंडित, रसोइया,
महाराज, शिल्पकार आदि आदि
इन बहुरूपों में
मेरा रूप खो गया
ढूंढ़ रहा हूँ मै
अपने असली चेहरे को
जो इन मुखौटों में
एक मुखौटा बनकर
खूंटी से लटक गया है

आपका
शिल्पकार

(फोटो गूगल से साभार)

ये पेट आश्वासन का भूखा नही


चले जा रहे हैं वाहन
सड़क का सीना रौंदते हुए
चीरते हुए /निर्दयी होकर
ठीक राजनीती के तवे पर
कोरे झूठ की रोटियां
सेकने वाले नेता की तरह
निर्भय होकर,
कड़कती धुप में खड़ा है
सर छुपाने की चाह लिए
युग निर्माता मजदूर
जो गढ़ता है
आलिशान इमारतें
लेकिन
उसे सर छुपाने तक की जगह
नसीब नही
सिसकियाँ लेता हुआ
समाजवाद
ये पेट आश्वासन का भूखा नही
ये दो हाथ
किस्मत गढ़ते हैं देश की
सियासत के दलाल
खा जाते हैं "रोटियां"
हम गरीबों की
छोड़ जाते हैं
कोरा आश्वासन
हमारी भूख मिटाने के लिए
सबको अपना हक़
अपना अधिकार 
दिलाने की हसरत लिए
दम तोड़ रहा है
प्रजातंत्र
इन निष्ठुर हाथों में

आपका
शिल्पकार 


(फोटो गूगल से साभार)



जाग रे! जाग रे! जाग रे! मनवा .............


जाग रे,जाग रे,जाग रे मनवा जाना है उस पार
करके  अपनी खाली कुटिया,अब हो  जा तैयार
रे! मनवा जाना है उस पार

हुई सांझ तो रात-रानी, ले आई खुशबु का हार
महका  ले तु  अपना  मन,खोल  ह्रदय के द्वार 
रे! मनवा जाना है उस पार

गई  रात  तो  आया  सवेरा, ले किरण उपहार
मिल जायेगा तुझे किनारा,अब धरले पतवार
रे! मनवा जाना है उस पार

इस नदिया  के दो पार हैं,हमरे प्रियतम उस पार
चलते-चलते बढ़ते जाना,धर प्रियतम का ध्यान 
रे! मनवा जाना है उस पार

अपने  सपने  छलते जाएँ,तुझको अनगिन बारम्बार
जो जागेगा,वो कर पायेगा, अपने प्रियतम का दीदार
रे! मनवा जाना है उस पार

चमकेंगे तब हजारों सूरज,भूल जायेगा तु संसार 
आनंद  रस  की  लहर  उठेगी,जा प्रियतम के द्वार 
रे! मनवा जाना है उस पार   

आपका
शिल्पकार,



फोटो गूगल से साभार

   
 

हमारा जन प्रतिनिधि कैसा हो ?????


हमारा जन प्रतिनिधि हो महान
जीतते  ही बंगला ले आलिशान
एक दिन में आ जाये बड़ी कार 
जन भूखा मरे, रोज जाये "बार"

दिल्ली  में बड़े -बड़े नेताओं के 
दिन-रात   हाथ-पैर  दबाता हो
सुबह-सुबह मेडम के टॉमी को
नित  तफरी कराने ले जाता हो


पॉँच  सालों  में  खूब  कमा  ले
स्विस  बैंक  में  खाता  बना ले
जमा  करा  दे  सारा  धन  वहां
कई  पीढियों  मामला  जमा ले


एक  बार  तो   मुझे  जीता दो 
भाई- बाबा- अम्मा  कहता  हो
चेहरे  पर  रहे  मुस्कान  ऐसी 
जैसे  मंजा हुआ  अभिनेता  हो


हमारा  जन प्रतिनिधि ऐसा हो
जनता  पर  रखे  अपना  मन 
जब   जीत  जाये वो चुनाव तो
आकर   दे  सबको  "दूरदर्शन"

आपका
शिल्पकार 
 फोटो गूगल से साभार 

बहारें चली गई,प्राण में बिना नयी सांसे भरे


एक बार 
दीये फिर जल उठे थे
लगा की उजड़ा चमन 
आज बस गया
लगा की बहारें 
आज लौटी हैं फिर
कुछ प्राण में नयी 
सांसे भरने को 
उदासी में कुछ 
उमंग भरने को
तम में कुछ 
उजास भरने को
सहसा एक हवा चली 
दीये  बुझ गये
बहारें चली गई
बिना प्राण में 
नयी सांसे भरे 
मैं बैठा था 
उसकी प्रतीक्षा में
इस चमन को 
आंसुओं से सींचते 
बुझे दीयों में 
अपना खून जलाते
तम को दूर करने का 
भरसक प्रयास करते हुए
हमेशा की तरह 


आपका 
शिल्पकार



(फोटो गूगल से साभार)


मैं परदेश फंसा हूँ आय ......


 मैं  परदेश  फंसा  हूँ आय .................................
तोड़  के पिंजरा  एक  दिन, उड़ जाऊँ पंख फैलाय

आ बैठा था एक डाली   पे,चन्द्र  किरण को ताके
दिवस  हो  तो  मैं  उड़ जाऊँ,  ईत  उत था  झांके 
जाल फैलाये बैठा बहेलिया,मुझको लिया फंसाय
मैं परदेश फंसा हूँ  आय...................................

पॉँच  डोर  से  बांध के मुझको,पिंजरे दिया बैठाय
खुले  गगन  में  उड़ने  वाला,  कैद  हुआ हूँ  आय 
काल  कोठरी  मिली  भयंकर,  कैसे   कैद   हेराय
मैं परदेश फंसा हूँ  आय...................................


मुझ  हंसा  का  यहाँ  नहीं  घर, मेरा  दूर  ठिकाना
दिन   रैन   कैदी   बनके,  पडा  है  समय  बिताना
पिंजरा  खुलते  ही  उड़  जाऊँ, अपने   पर  फैलाय
मैं  परदेश  फंसा  हूँ  आय..................................







आपका 
शिल्पकार 

फोटो गूगल से साभार

रफ्तार, हिंदी ब्लोग्स डॉट कॉम, बलोगिस्तान, ब्लॉग प्रहरी, ई डिग एवं अन्य हिंदी के समस्त एग्रीगेटरों एवं ब्लोगर परिवार को दीवाली की हार्दिक शुभ कामनाएं.



रफ्तार, हिंदी ब्लोग्स डॉट कॉम, बलोगिस्तान, ब्लॉग प्रहरी, ई डिग एवं अन्य हिंदी के समस्त एग्रीगेटरों एवं ब्लोगर परिवार को दीवाली की हार्दिक शुभ कामनाएं.

अंधियारे को दूर भगा कर एक दीप नेह का धर दो


दीप
जलाओगे तुम
उजियारे को न्योत
अंधियारे को दूर करोगे
गुनगुनाओगे
अपने मन में खुशियों के राग
गुनगुनाओ 
लेकिन 
जीवन का यह सत्य भी देखो
दीपों की कतार में अँधेरे तले
ऊंची ईमारतों की झोंपडियों तले
किसी राधा का रुदन सुनो
किसी पीडित मंगलू की व्यथा सुनो
क्यों अँधेरे में है उनकी दुनिया?
इनकी भी कुछ कथा सुनो
जीवन के जले उपवन का 
दर्द भरा गान सुनो
क्या बन सकोगे?
तुम उनकी एक आशा
तो आओ आशा के क़दमों 
की आहट बन कर
सारी दुनिया जग-मग कर दो
अंधियारे को दूर भगा कर
एक दीप नेह का धर दो
निर्धन-निर्बल की आहों को तुम
उजास की किरणों से आलोकित कर दो
तुम जीवन की रीत बदल दो
कर दो शंखनाद तुम
तम के विरुद्ध युद्ध का
अपने संकल्प से 
बंधन खोल दो
आज पीड़ित निरुद्ध का
तभी दीपोत्सव सार्थक होगा
नया सवेरा
कराहती मानवता का 
संबल बनकर आये
आओ हम सब 
अँधेरी झोपडियों में भी
दीप जलाएं
तम को दूर करें
दीपोत्सव मनाएं 


आपका
शिल्पकार
(फोटो गूगल से साभार)




मालूम नहीं???? आज नरक चौदस है!!!!



आज सुबह-सुबह श्रीमती ने  जगाया
हाथ में चाय का कप थमाया
तो मैंने  पूछा- क्या टाइम हुआ है?
मुझे लगता नहीं कि अभी सबेरा हुआ है
बोली ब्रम्ह मुहूर्त का समय है,चार बजे हैं
और आप अभी तक खाट पर पडे हैं
मालूम नहीं आज नरक चौदस है
आज जो ब्रम्ह मुहूर्त में स्नान करता है
वो सीधा स्वर्ग में जाता है
वहां परम पद को पता है
जो सूर्योदय के बाद स्नान करता है
वो सारे नरकों को भोगता है
चलो उठो और नहाओ
यूँ घर में आलस मत फैलाओ
मैंने कहा मेडम कृपा करके
तुम मुझे तो सोने दो
मुझे नहीं जाना स्वर्ग में
यही नर्क में ही रहने दो
मैं स्वर्ग में  नहीं रह  सकता हूँ
वहाँ जाकर मै उकता जाऊंगा
सारे दोस्त तो नरक में ही मिलेंगे
इसलिए स्वर्ग में क्या लेने जाऊंगा?
उनके पास कई जन्मों का पुण्य संचित है
इसलिए हमारा नरक में ही रहना उचित है
फिर वहां रम्भा,मेनका, उर्वशी
जैसी  अप्सराओं से तुम्हे डाह होगी
तुम्हारे होठों पर एक आह होगी
कोई लाभ नहीं होगा बाद पछताने में
इसलिए क्या बुरा है नरक आजमाने में
शूर्पनखा, ताड़का, मंथरा को देखकर
वहां मेरा मन वहां नहीं भटकेगा
आखिर आसमान का गिरा
खजूर पर ही अटकेगा ,
श्रीमती मान गई- और बोली
अगर ये बात है तो जाओ,सो जाओ
अगर नही नहाना है तो नरक ही जाओ 



आपका
शिल्पकार 



(फोटो गूगल से साभार)

पनघट मैं जाऊं कैसे?छेड़े मोहे कान्हा !!!!



पनघट मैं जाऊं कैसे, छेड़े मोहे कान्हा 
पानी      नहीं    है,    जरुरी   है   लाना

बहुत   हुआ  मुस्किल, घरों  से  निकलना 
पानी  भरी  गगरी को,सर पे रख के चलना
फोडे  ना   गगरी,   बचाना    ओ    बचाना 

पनघट मैं जाऊं कैसे,छेड़े मोहे कान्हा 
पानी      नहीं    है,    जरुरी    है   लाना

गगरी    तो   फोडी   कलाई   भी  ना  छोड़ी
खूब   जोर  से  खींची  और  कसके  मरोड़ी 
छोडो  जी  कलाई,  यूँ सताना  ना   सताना

पनघट मैं जाऊं कैसे,छेड़े मोहे कान्हा 
पानी      नहीं     है,   जरुरी   है   लाना 

मुंह    नहीं    खोले    बोले    उसके    नयना 
ऐसी   मधुर   छवि  है  खोये  मन का चयना
कान्हा   तू   मुरली    बजाना   ओ   बजाना

पनघट मैं जाऊं कैसे,छेड़े मोहे कान्हा 
पानी      नहीं    है,   जरुरी   है   लाना 


आपका 
शिल्पकार 

फोटो गूगल से साभार




दुनिया है आनी जानी रे बन्दे, दुनिया है आनी जानी




दुनिया  है  आनी  जानी  रे  बन्दे,  दुनिया  है आनी जानी 
बोल  ले  अब  तो  अपने  मुंह से प्यारे प्रभु की मीठी बानी 
दुनिया    है    आनी     जानी , 
दुनिया   है  आनी  जानी,रे बन्दे


सुन्दर  थी वह  गात  भी  गई,  गरजने वाली बात भी गयी
रहता   है  क्यों भुला-भुला,  साँस  गई  और  रात  भी गई
छोड़  दे  अब  तू तीर कमानी,
दुनिया है आनी जानी रे बन्दे 


राजा  गये और  गए भिखारी,मुरख गये और नीति धारी
रहता  है  क्यों  फुला-फुला, नामी  गये  और  गद्दी  धारी 
फिर  भी  तुने  बात  ना मानी
दुनिया है आनी जानी रे बन्दे.


साधू  गये  और महंत भी गए,संत गये और  असंत भी गए
तू माया पींग पर झुला-झुला,ना जाने कितने बसंत भी गये
फिर क्यों करता तू अभिमानी
दुनिया  है  आनी  जानी रे बंदे


कर  ले  अब  कुछ  तो  समाई, छोड़  दे  सारे  दुर्गुण  भाई,
प्यारे  प्रभु में  लगन लगा कर,कर ले कुछ तो नेक कमाई 
संवर   जायेगी  ये जिंदगानी,
दुनिया है आनी जानी रे बन्दे,


आपका 
शिल्पकार


फोटो गूगल से से साभार

सबको बांटा जाएगा यौवन????!!!!

बूढा वृक्ष
जवान हो गया
जब से एक नन्ही परी
आदेश लायी वनराजा से
सबको बांटा जाएगा
यौवन
अब के मदन महोत्सव में
बोनस के रूप में
मैंने भी सोचा
यौवन वितरण
कितना पुनीत कार्य है!
मैं भी अपनी केंचुली
बदल लूँगा,
बूढी शाखाओं में
कोंपले फूटेंगी,
फ़िर आपस में
वे बुझेंगी
तू बता
मैं कल जैसी नही लग रही हूँ?
बड़ी उमंगें भर लाया संदेश
सावनी हिंडोले ने
जर्जर बुढापे को
पींगे मार-मार कर हिला डाला था।
सावनी बयार मेघदूतजैसी थी
हर तरफ उमंगे जवान थी,
मेरी मन में भी जवान होने की कसक थी
सोच कर बूढी हड्डियों में
एक सिरहन सी दौड़ गयी
सहसा विराम लग गया,
मै जाग चुका था,
वो मेरा सपना टूट चूका था।
वो सिरहन का अहसास अभी तक बाकी है,


आपका
शिल्पकार

(फोटो गूगल से साभार)

हरदम फटे पैजामे ही रहे मेरी खातिर ????!!!!!!



पाँव   के   छाले   ही,   रहे   मेरी  खातिर,
सूखे   निवाले   ही,    रहे    मेरी    खातिर

फूलों   के   बिछौने रहे, उनके ही घर  तक
टाट   के  बिस्तर  ही , रहे   मेरी   खातिर


बच्चों  ने  जब  मांगे, जन्मदिन के तोहफे
सर्द  आहों  के   नाले, ही  रहे  मेरी खातिर

जम्मुहरीयत   के  दावे, खूब हुए थे लेकिन
हरदम   फटे   पैजामे , ही  रहे मेरी खातिर

जब  भूखे  पेट  ही,  खुश  रहने  की   सोची
तो  नश्तर चुभोने वाले, ही रहे मेरी खातिर

आपका 

शिल्पकार
फोटो गूगल से साभार





















हे शिल्पकार!!! तेरी पीड़ा मेरी पीड़ा है

हे! शिल्पकार,
तेरी पीड़ा मेरी पीड़ा है,
मुझको व्याकुल करता तेरा करुण क्रंदन,
भीषण झंझावातों   में कर सृजन निरंतर,
पाषाणों को भी दे रहा सांसों का स्पन्दन,
तेरा     करता      हूँ     मैं    अभिनन्दन,
तेरी पीड़ा मेरी पीड़ा है।


तेरे  कठिन  परिश्रम  से  इस  धरती   पर,
कंकर-कंकर, लोहा, सोना, चांदी हो जाता,
अगर तेरा पशीना न गिरता इस भूमि पर,
तो  यह  सोंदर्य   अनूप   कहाँ   से    आता,
तुम ही कहो!
क्या   किसान   बिना   हल   नाखूनों   से,
धरती का सीना चीर फसल उगा सकता है
क्या  बिना   हथियारों   के   कोई   शासक,
दुश्मनों  से अपना  राज्य  बचा  सकता है?

क्या!  तेरे  बिना  राम जी  के  तीर  हठीले,
रावण    का    हृदय    वेध     सकते    थे ?
क्या!  अर्जुन  के  तरकश  के  तीर  नुकीले,
कर्ण    का    मस्तक   छेद     सकते    थे ?

क्या!   बिना   सुदर्शन   चक्र   के     कृष्ण,
रण   में   पांचजन्य   बजा   सकता    था ?
क्या!   बिना   गदा    के     भीम    बहादुर,
लड़ने    का   साहस   दिखा    सकता  था ?

बिना  भाले  के   कैसे   लड़ता  राणा   प्रताप,
वीर शिवा की तलवारों को शान कौन चढाता ?
अगर  न   होता   कवि   चंदर    बरदाई    तो,
पृथ्वी राज शब्दभेदी  निशाना  कैसे  लगाता ?

महल   दुमहले   और  अन्य  आविष्कार   भी,
तुने      अपने इन   हाथों से   किए   अनूप   हैं।
तेरे    खून     पसीने     और      लाशों       पर ,
शताब्दियों       राज     करते      रहे    भूप   हैं।

इस    माटी    का    कण  -  कण   जानता    है,
आज    तेरी     इस     खामोश     कुर्बानी    को,
तेरे श्रम   से    ही   रक्षित    मान    भारत    का
तेरे  श्रम   ने  पावन बनाया है गंगा के पानी को,

तेरी   भट्टी    की     विकराल      ज्वाला    ने ,
फौलादों     को     भी     पिघला      डाला     है।
पहाड़      फोड़      कर     तुने     चट्टानों    में ,
अपना    पथ      नवीन      बना       डाला    है।

तुने     प्राण       भरे       हैं       पाषाणों      में,
मैं     अक्षरों     में     नवजीवन      पाता     हूँ।
तेरी    पीड़ा      मेरी      पीड़ा      है     इसलिए,
तेरा     दर्द      बाँटने       चला      आता     हूँ।

जब    तेरे     घर     में     चूल्हा    जलता    है
तभी      पेट      भर     मैं     भी     खाता    हूँ।
जब खो जाता   हूँ    पीड़ा     की    गहराई    में,
तो    भूखे      पेट      ही      सो      जाता    हूँ।


हे शिल्पकार,
तेरी पीड़ा मेरी पीड़ा है।
आपका
शिल्पकार,

कौन था यह?

गैंती की मार से
एक ढेला मिटटी उखड़ती
मिटटी नही लेट्र्रा था वह
कमर झुक कर कमान हो रही थी
माथे पर पसीने की बुँदे चूह रही थी
तभी फ़िर गैंती की मार से
एक ढेला लेट्र्रा उखाड़ता
उसे रांपा से चरिहा में भरता
बुधियारिन के माथे पर धरता
एक गोदी माटी वह कोड़ता
नई श्रृष्टि रचता
भाषण और नारों से दूर
चूल्हे पर हंडिया में भात चुरती वह
सबको खिला कर लांघन रह जाती वह
फ़िर भी दुगने ताकत से चरिहा उठती वह
आज के लांघन से बचने के लिए
उसकी गैंती की धमक से
धरती हिलती, 
ब्रह्माण्ड हिलता
उसकी बाँहों के बल से
नई सुबह,नया उजाला
उससे दूर था ,
कौन था यह?
मेरे देश कर्मरत
मजदूर था

आपका
शिल्पकार

शब्दार्थ
गैंती = कुदाली
लेट्र्रा-लाल कड़ी मिटटी
रांपा=फावडा
चरिहा=मिटटी उठाने की टोकनी
चुरती= बनती
लांघन=भूखी/भूखा

(फोटो गूगल से साभार)

सदियों का मर्ज ही मेरे हिस्से आया



                                              
 सदियों    का   मर्ज  ही   मेरे  हिस्से  आया
पत्थरों   का   कर्ज   ही  मेरे  हिस्से  आया


कलियों   को  चुन  लिया  माली ने बाग से
काँटों   का  जिस्म  ही  मेरे  हिस्से   आया


राज  सदियों   से   उनके   लिए   ही    रहा
काम  दरबानी  का  ही  मेरे  हिस्से   आया


कौन सुनता है मेरी रिन्दों  की  महफिल में
फ़कत  खाली  जाम  ही  मेरे  हिस्से  आया


बहुत  किस्से  सुने  थे  इंसाफ   के   तुम्हारे 
फ़कत मौत का पैगाम  ही मेरे हिस्से आया








आपका
शिल्पकार
(फोटो गूगल से साभार) 

उगे बीज को मरते देखा, जैसे कोई गर्भपात हो गया।

एक बीज से  आस  जगी  थी, मृगतृष्णा  सी  प्यास  जगी  थी,
सारा  चौपाल   सूना-सूना  था,  जैसे  गांव  में  आग  लगी  थी,
चारों तरफ़ सन्नाटा-ही सन्नाटा,जैसे कोई सन्निपात हो गया,
उगे  बीज  को  मरते  देखा,
जैसे कोई गर्भपात हो गया

तेरे इस  विशाल  नीले  आँचल  में,  पंख  फैलाये   उड़ता  था  मै,
प्रगति  के  नए   सोपानों   में,  नित्य   सितारे   जड़ता   था   मै,
मुझसे  क्या  अपराध  हो  गया,  मुझ  पर  क्यों  आघात हो गया,
उगे  बीज  को  मरते  देखा,
जैसे कोई गर्भपात हो गया,

पहले भी मै तडफा-तरसा था, तू  कभी  न समय  पर  बरसा था,
लिए  हाथ  में  धान  कटोरा, मै  फ़िर  भी  बहुत - बहुत  हर्षा  था,
नई  सुबह  की  आशा  में   था,   सहसा   ही   वज्रपात   हो   गया,
उगे बीज को मरते देखा,
जैसे कोई गर्भपात हो गया,

गीली मेड की  इस  फिसलन  पर,  मै  बहुत  दूर  जा  फिसला हूं,
तेरे  कृपा  की   आस   लिए   मै,  नित   तुझको   ही   भजता   हूँ,
डोला  गगन  आ  गया  विप्लव, जैसे  कोई  उल्का  पात  हो गया,
उगे  बीज  को  मरते  देखा,
जैसे कोई गर्भपात हो गया,

असमय  बरसा  तो  क्यों  बरसा, चारों  तरफ  हा-हा  कार हो गया,
जिस  पर  अभी  यौवन  आना  था, वो  जीवन  से  बेजार  हो  गया,
तेरी    इस    असमय    वर्षा   पर,   रोऊँ   या   मै   जान   लुटा   दूँ,
लूटा-पिटा   बैठा   हूँ   अब   मै ,  जैसे   कोई   पक्षाघात   हो   गया,
उगे  बीज  को  मरते  देखा,
जैसे कोई गर्भपात हो गया।

आपका
शिल्पकार
(फोटो गूगल से साभार)

 

लोकप्रिय पोस्ट

पोस्ट गणना

FeedBurner FeedCount

यहाँ भी हैं

ईंडी ब्लागर

लेबल

शिल्पकार (94) कविता (65) ललित शर्मा (56) गीत (8) होली (7) -ललित शर्मा (5) अभनपुर (5) ग़ज़ल (4) माँ (4) रामेश्वर शर्मा (4) गजल (3) गर्भपात (2) जंवारा (2) जसगीत (2) ठाकुर जगमोहन सिंह (2) पवन दीवान (2) मुखौटा (2) विश्वकर्मा (2) सुबह (2) हंसा (2) अपने (1) अभी (1) अम्बर का आशीष (1) अरुण राय (1) आँचल (1) आत्मा (1) इंतजार (1) इतिहास (1) इलाज (1) ओ महाकाल (1) कठपुतली (1) कातिल (1) कार्ड (1) काला (1) किसान (1) कुंडलियाँ (1) कुत्ता (1) कफ़न (1) खुश (1) खून (1) गिरीश पंकज (1) गुलाब (1) चंदा (1) चाँद (1) चिडिया (1) चित्र (1) चिमनियों (1) चौराहे (1) छत्तीसगढ़ (1) छाले (1) जंगल (1) जगत (1) जन्मदिन (1) डोली (1) ताऊ शेखावाटी (1) दरबानी (1) दर्द (1) दीपक (1) धरती. (1) नरक चौदस (1) नरेश (1) नागिन (1) निर्माता (1) पतझड़ (1) परदेशी (1) पराकाष्ठा (1) पानी (1) पैगाम (1) प्रणय (1) प्रहरी (1) प्रियतम (1) फाग (1) बटेऊ (1) बाबुल (1) भजन (1) भाषण (1) भूखे (1) भेडिया (1) मन (1) महल (1) महाविनाश (1) माणिक (1) मातृशक्ति (1) माया (1) मीत (1) मुक्तक (1) मृत्यु (1) योगेन्द्र मौदगिल (1) रविकुमार (1) राजस्थानी (1) रातरानी (1) रिंद (1) रोटियां (1) लूट (1) लोकशाही (1) वाणी (1) शहरी (1) शहरीपन (1) शिल्पकार 100 पोस्ट (1) सजना (1) सजनी (1) सज्जनाष्टक (1) सपना (1) सफेदपोश (1) सरगम (1) सागर (1) साजन (1) सावन (1) सोरठा (1) स्वराज करुण (1) स्वाति (1) हरियाली (1) हल (1) हवेली (1) हुक्का (1)