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गुगल बाबा

इंडी ब्लागर

 

रामपुर गांव

नदियों में नाथ
शिवनाथ नदी के तीर बसा हुआ
सूंदर सा गाँव रामपुर,
जहाँ पीपल की छांव,
मांझी की नाव,
नदी तट पर जलक्रीड़ा करती सोन मछरिया,
सुंदर साधारण घर-दुवरिया,
मंथर जल को
पैरों की छपछपाहट से उकसाती छोरी,
महादेव संग बैठी गौरी
सब कुछ है इस गाँव रामपुर में
कलचुरीकाल का त्रिस्तरीय शिवालय,
जिसका नंदी खंड खंड हो बाहर पड़ा
अपनी दूर्दशा पर टसुए बहा रहा है,
हाथ जोड़े नृपति
जीर्णों उद्धार संरक्षण की बाट जोह रहा है।
यायावर ने यह खुबसूरत स्थान देखा
तो मन मचल गया,
नदिया, गोरी, छोरी, छावं,
पीपल देख कर वैराग्य न धर ले
इसलिए टहल टल गया।

मौसमी गजल



पत्तियाँ पीली हुई पीपल के झाड़ की
बरफ़ पिघलने लगी दोस्तों पहाड़ की

छुट्टा छोड़ दिया किस ने सूरज को
जैसे सांकल खुल गई हो सांड़ की

सुबह से ही लहकने लगी है गरमी
सटक गई बेचारे कूलर जुगाड़ की

कट गए सब पेड़ हरियाली है गायब
दशा खराब हुई अब गांव गुवाड़ की

त्राहि त्राहि मची पारा भी चढ गया
बस जरुरत है यारों पहली फ़ुहार की

कविता तुम्हारी

नही पढ पाता मैं
भावोत्पादक कविताएं
सीधे दिल में उतरती हैं
और निर्झर बहने लगता है
एक एक शब्द
अंतर में उतर कर
बिंध डालता है मुझे
आप्लावित दृग
देख नहीं पाते
छवि तुम्हारी
बिसरने की कल्पना मात्र
तार तार कर देती है
जीवन रेखा को

तमाम उम्र सफ़र में रहा

तमाम उम्र सफ़र में रहा
नहीं मैं कभी घर में रहा

यायावरी पर क्या कहूँ
कांटो भरी डगर में रहा

तम्मना-ए-परवाज थी
पर उनकी कैद में रहा

कह न सका दिल की
पासबां कोई हद में रहा

मीठे बोल बोलते हैं वो
सिर उनकी जद में रहा

चलते चलते पहुंचा तो
सज्जादों के शहर में रहा

रावण मेरे गाँव का

आज मरने आ खड़ा है रावण मेरे गाँव का
लम्बा तगड़ा हट्ठा कट्टा रावण मेरे गाँव का

काले काले बादल झमाझम बरस रहे हैं खूब
आसमान से होड़ लेता रावण मेरे गाँव का

आतिशबाजी होगी तो धूर में मिल जाएगा
नेता जी के हाथों मरेगा रावण मेरे गाँव का

बारुद भरी देह पर रंग बिरंगे हैं अलंकरण
आज नहीं कल जलेगा रावण मेरे गाँव का

गुब्बारे और गोलगप्पे की दुकाने है सजी
रावण भाटा में बुलाता रावण मेरे गाँव का

हर बरस होता दसहरा और रावण दहन भी
फ़िर भी नहीं मरता है रावण मेरे गाँव का

आओ चुनरिया सतरंगी कर दूँ


आओ चुनरिया सतरंगी कर दूँ अबकी बार होली में
आओ प्रीत रंग हजार बिखेर दूं अबकी बार होली में
जागा है मधुमास मास आज
सुगंध लिए ॠतुराज आया 
कान्हा ने भर ली पिचकारी
देख मन मोरा भी हरसाया 
लेकर आया हूँ प्रीत अमिट रंग,भरके अपनी झोली में
आओ चुनरिया सतरंगी कर दूँ अबकी बार होली में
परसा फ़ूला नीम भी बौराया 
भंग रंग भंगीला मौसम आया 
गुलाल से गाल रंगवा ले गोरी
कुंजन में भंवरा भी भंगियाया 
लाया ठंडाई बदामी केसरिया भरके अपनी डोली में
आओ चुनरिया सतरंगी कर दूँ अबकी बार होली में
अरे रंग तू लगवाले गोरिया 
काहे को इतना शरमाती है
चार दिन है अब होलिया के
काहे को इतना इठलाती है
हाथ पकड़ कर झूम ले गोरी आए मजा ठिठोली में
आओ चुनरिया सतरंगी कर दूँ अबकी बार होली में
महका चंदनिया मधुबन है 
कोयल की कूक निराली
रंग भर ले तू पिचकारी में
सजनी होली खेलें आली
भीग जाए सब तन मन रंग से अबकी बार होली में
आओ चुनरिया सतरंगी कर दूँ अबकी बार होली में

कविता कहाँ से आएगी?


कविता
बहुत कठिन है
समोसे खाने से नहीं आती
पहले यूँ ही आ जाती थी
टहलते टहलते कभी भी
कागज न हो चादर पर
लिख लेता चंद लाईने,
कभी तकिए के खोल पर
वो अब मुझसे रुठ गयी
देखकर भी नहीं बोलती
बोलकर भी नहीं देखती
राजा नल के आने पर
बाल्टी लेकर दौड़ता हूँ
बिजलीरानी जाने पर
पैरों से पंखा झलता हूँ
हाथों से मच्छर मारता हूँ
नींद नहीं आती मुई
इस भीषण गर्मी में
कविता कहाँ से आएगी?

शिल्पकार

साक्षरता


मै अनपढ
मिला तुमसे तो
सीख गया पढना
चेहरे के भाव
जो सपाट लगते थे
स्वयं कह देते हैं
बिना कहे ही
और मैं पढ लेता हूँ
तुम्हारे अंतरमन  की
साक्षर हो गया हूँ
तुम्हारी एक मुस्कान
छा जाती है नभ बनकर
खामोशी तुम्हारी
मेघों में भरा हुआ वर्षा जल
गर्भ धारण कर रखा हो उसने
हिरण्यमयी गर्भ
वर्षा उपरांत
उजास फ़ैलाने के लिए
मै पढना सीख गया हूँ

अबके वसंत में ------------ ललित शर्मा

महुआ बीनती
वह अनमनी सी लड़की
हँसती है जब
झरते हैं फूल, महुआ के
मन करता है उसके जूड़े में
खोंस दूं कुछ फूल टेसू के
इस वसंत में
उसे पहना दूं हार
सुर्ख सेमल के फूलों का
महुए के फूल बीनती वह
अभिसारिका
जब नदी किनारे बैठ कर
पैरों से छपछपाती है जल
तो उससे बनता है तीरथगढ़
धुंआधार जैसा जल प्रपात
उसके पायल की झंकार
देती झरनों को स्वर
उड़ती है बहुरंगी तितलियाँ
सुनने पायल की झंकार
सामने बैठा पंडुक जोड़ा
चुगता है मनियारी गोटी
कनखियों से देखता मेरी ओर
उड़ रहे हैं धरसा में
शाख से जुदा पीले पात
मन करता है खोंस दूँ
टेसू के फ़ूल और दोना पान
जूड़े में इस वसंत में

ये तुम हो...?


अब काव्य उमड़ता-घुमड़ता नहीं -- ललित शर्मा

एक अरसे से शिल्पकार ने कुछ काव्य रचा नहीं, पहले रोज एक पोस्ट आ ही जाती थी नित नेम से। शायद काव्य का सोता सूख गया। अब काव्य उमड़ता-घुमड़ता नहीं। पता नहीं क्यो अनायास हीं एक जीता जागता ब्लॉग मृतप्राय हो गया, जबकि यह मेरा पहला ब्लॉग है। शिल्पकार ब्लॉग जगत की गलियों भटकता रहा। कहते हैं न खरबूजे को देख कर खरबूजा रंग बदलता है ऐसा ही कुछ हुआ है। फ़ेसबुक की चार लाईनों ने एक गजल तैयार करने की लालसा जगा दी। बहुत सारे ब्लॉगर साथी फ़ेसबुक पर लगे हुए हैं, धड़ाधड़ महाराज की तरह वहीं पोस्ट हो रहा है। एक गजल नुमा प्रस्तुत कर रहा हूँ, ईटर-मीटर का तो पता नहीं। गुणी जन कृपा करेगें, उम्मीद है कि हफ़्ते में एकाध बार तो इस ब्लॉग पर काव्यमय पोस्ट लग जाएगी।




जीते जी कुछ करो तो बात बने।
कोई महफ़िल सजाओ तो बात बने।।

तुम्हारी महफ़िल में आना चाहते हैं।
कोई नगमा सुनाओ तो बात बने॥

कतरा समंदर भी असर रखता है।
प्यास मन की बुझाओ तो बात बने॥

गर्म हवाओं से झुलसा है मन मेरा।
हवा प्यार की बहाओ तो बात बने।।

मचलता रहा यह दिल तुम्हारे लिए।
आकर सीने से लगाओ तो बात बने॥

तनहा खड़ा जिन्दगी के चौराहे पर ।
बस साथ मेरा निभाओ तो बात बने॥


आपका शिल्पकार

शकुन्तला तरार की एक कविता "जंगली सौंदर्य"

शकुन्तला तरार  की एक कविता "जंगली सौंदर्य"

जंगली सौंदर्य

बैलाडिला लौह अयस्क प्रोजेक्ट
ऊँचा नाम ऊँचा काम
नये-नये लोग
अचानक बस्तर आना
जंगली सौंदर्य
उफ!
परिणति
अनब्याही मां
नाबालिग मां
घरेलू काम के एवज में
लुटी हुई अस्मत
दैहिक शोषण की शिकार बालाएं
चंद टुकड़े रुपयों के
लुटी हुई अस्मत के बदले, ठगी हुई मानसिकता
पुनः परिणति
दैहिक शोषकों से जबरिया ब्याह
अधिकारियों द्वारा स्थानांतरण, तलाक  अथवा पलायन
क्या बचा?
गोद में बच्चे और तिरस्कार, उपेक्षा
परदेशियों द्वारा ठगी का शिकार
और
आज भी जारी है
बदस्तूर
अधिकारियों के
व्यापारियों के
कुत्सित भावनाओं की
कुत्सित निगाहों की
घृणित मानसिकता की
और वही भोलापन
अल्हड़पन
और
निर्द्वन्द्व हंसी ।

खोया बचपन

कंचे,लट्टू,गुल्ली-डंडा,पुराना बक्सा खोल रहा हूँ।
खोया बचपन ढूंढ रहा हूँ,मैं बचपन ढूंढ रहा हूँ॥

राजा-रानी, परियों की, कहानी खूब सुनाती थी।
खोयी ममता ढूंढ रहा हूँ,मैं बचपन ढूंढ रहा हूँ॥

लड्डू-पेड़े,खाई-खजाना,मुझको खूब खिलाती थी।
तेरे आंचल की छाया में, मैं बचपन ढूंढ रहा हूँ।।

करता जब धमा-चौकड़ी,मार से तुम बचाती थी।
तुम्हारी यादों में घर कर,मैं बचपन ढूंढ रहा हूँ।।

कभी न करुंगा उधम, कान पकड़ बोल रहा हूँ।
खोया बचपन ढूंढ रहा हूँ, मैं बचपन ढूंढ रहा हूँ॥


शिल्पकार

कठपुतली

कठपुतली नाचती है
उसके हर ठुमके पर
तालियाँ बजती हजार
होठो पर छाती है स्मित 
थिरकते कदमों से 
करती है अभिवादन
खेल ख़त्म होते ही
नट खोलता है धागे
अपने पोरों से 
बेजान कठपुतलियां
फिर टंग जाती हैं
बरसों पुरानी खूंटी से
बार बार छली जाती हैं
मालूम होते हुए भी 
उनके प्राण किसी 
और के हाथों में हैं
जो धागे बांध नाचता है
     
आपका 
शिल्पकार  

बसंत तू कब आया ?

रात के तीन बजकर 29 मिनट हुए हैं, चैट पर टन्न की आवाज आती है। बसंत पंचमी की शुभकामनाएं लिखा दिखाई देता है। ध्यान से देखता हूँ तो अरुण राय जी हैं। जिनकी कविताएं मुझे बहुत पसंद आती है। समय-बेसमय उनके ब्लॉग पर जाता हूँ और बिना आहट के चला आता हूँ। मुझे कविता लिखे लगभग एक बरस होने को आ गया। कहीं से एक झटका लगा और कविता का प्रवाह रुक गया। बरस भर में 10 पंक्तियाँ भी कविता, गीत, गजल कह न सका। लेकिन आज कवि को देख कर कवि मन जाग उठा। एक कविता उतर  आई। प्रस्तुत है आपके लिए, शायद आपको पसंद आ जाए।

पता ही न चला
बसंत तू कब आया
लगा था उधेड़ बुन में
एक आहट तो दी होती
मैं भी संवर जाता
मदनोत्सव के लिए
तेरा आना सहज है
लेकिन जाना पीड़ादायक
कामदेव रति के बिछोह के बाद
तू चला जाता है अपनी राह
अधुरा मदनोत्सव छोड़कर
पलाश की लालिमा 
बाट जोहती है
बरस भर
तेरे आने की
कामदेव भस्म होकर भी
जीवन पा गया
लेकिन मैं जलता रहता हूँ
सुलगता रहता हूँ 
सिगड़ी सा
पतझड़ की गर्म हवाओं में
तेरी प्रतीक्षा करते हुए 

आपका 
शिल्पकार

ओ महाकाल -- अम्बर का आशीष से ----- ललित शर्मा

संत पवन दीवान जी ने अपनी एक कविता " ओ महाकाल " अपने काव्य संकलन "अम्बर का आशीष" के विमोचन के अवसर पर सुनाई थी। उन्होने कहा कि आज राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता है, छोटी-छोटी एकता मिलकर बड़ी एकता बनती है। इस कविता का पॉडकास्ट सुनिए।

ओ महाकाल



ओ महाकाल तुम कब दोगे
जीने के लिले हमें दो क्षण
हम किस पृथ्वी पर बैठे हैं
पांवों में क्यों भर रहा गगन

उड़ने वाले चेहरे किसके
सूने में लटके हाथ
यह अंतहीन पथ किसका है
अंकित हैं छोड़े हुए साथ

आँखें ही आँखें हैं उपर
केवल आँखे ही आँखे हैं
कुछ मांस अस्थियाँ नहीं शेष
उतराती टूटी पांखे हैं

ये निष्फ़ल खड़ी याचनाएं
दरवाजों पर क्यों टूट रही
कांचों ने पत्थर तोड़ दिए
खिड़कियाँ हवाएं लूट रही है

चर मर करती कुर्सियाँ हाय
यह देश बैठता जाता है
जितना हर धागे को खोलो
उतना ही ऐंठता जाता है

कुछ राष्ट्र देवता को समेट कर
हर पत्थर में समा गए
अपने वंशों की पुस्तक पर
संस्करण दूसरा जमा गए

रास्ते पर पड़ा एक चेहरा
कितना निर्जन कितना उदास
वह किसका है,कुछ पता नहीं
परिचय को कोई नहीं पास

उसकी नहीं जरुरत कोई
इस पगलाई हुई भीड़ में
पत्नी बच्चे लटक रहे हैं
मंहगाई के किसी चीड़ में

किन राहों में चप्पलें फ़टी
जुड़ते-जुड़ते गल गए हाथ
आँखे हैं पर पुतलियाँ नहीं
खाई-खाई बंट गया ग्राम

वह देह नहीं है प्राण नहीं
केवल विनाश का सड़ा शेष
है कहाँ मेरे तन के नक्शे
कैसा है अपना जन्म देश

जिन्दगी जिसे तुम कहते हो
जिसको तुम कहते रहे प्यार
उस चेहरे का हो सका नहीं
कोई दर्पण एक बार

अब तक पड़ा हुआ वह चेहरा
हर आकृति को कराहता है
लेकिन उसकी जीभ नहीं है
कहता नहीं क्या चाहता है

लेकिन मुझे पता है सब कुछ
वह हम सबको श्राप रहा है
कितना बड़ा देश है उसका
वह पलकों से नाप रहा है

पड़ा रह गया वहीं चेहरा
तो चौराहा जल जाएगा
उसके रिसते हुए दर्द से
हृदय देश का गल जाएगा

रुक जाओ कुछ और देख लो
शायद कोई उसे उठा ले
विस्फ़ोटों का सुत्र काट कर
सब चेहरों का नाश बचा ले

पवन दीवान
ग्राम किरवई (राजिम)
जिला रायपुर छत्तीसगढ

शोषण की रोशनी--अम्बर का आशीष विमोचित ---- ललित शर्मा

हिन्दी और  छत्तीसगढ़ी  कविताओं के माध्यम से जन-चेतना की अलख जगाने वाले लोकप्रिय  संत  कवि पवन दीवान  (स्वामी अमृतानंद सरस्वती ) से जगत में सभी परिचित हैं। इसलिए मुझे उनके विषय में परिचय देने की आवश्यकता नहीं है। दीवान जी  का "मेरा हर स्वर इसका पूजन" नामक काव्य संकलन दो दशक पहले आया था। सौभाग्य से उसकी एक प्रति मेरे संग्रह में भी है। स्वराज करुण जी के द्वारा जानकारी मिली कि उनके दूसरे काव्य संकलन का विमोचन 1 जनवरी 2011 को जन्मदिन के अवसर पर है। इसके पश्चात छत्तीसगढी प्रख्यात गीतकार  एवं लोकसुर प्रकाशन के मुखिया भाई लक्ष्मण मस्तुरिया ने फ़ोन पर आमंत्रित किया। स्वराज्य करुण जी के साथ विमोचन समारो्ह में मुझे भी शामिल होने का मौका मिला, गरिमामय वातावरण में "अम्बर का आशीष" का विमोचन माननीय कृष्णा रंजन जी के करकमलों से हुआ। कार्यक्रम की विस्तृत रिपोर्ट के लिए यहाँ पर जाएं। दीवान जी के नवीन कविता संग्रह "अम्बर का आशीष" से एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।  

शोषण की रोशनी

कब तलक कठिनाइयाँ झेलेगा आदमी
कब तलक तनहाइयाँ झेलेगा आदमी
जिन्दगी का अब कोई मतलब न रहा
कुछ दिनों में खून से खेलेगा आदमी

महलों के गले काट के कुटियों को पिन्हा दो
शोषण की रोशनी को अंधेरे में मिला दो
जिसने भी नोच-नोच के खाया है देश को
उसका कलेजा चीर के कुत्तों को खिला दो

बेटी है शहीदों की वो शोलों में खिलेगी
इस देश को आजादी किस्तों में मिलेगी
मजदूर  को, गरीब को रोटी न मिलेगी
तुम ऐसे कटोगे कि बोटी न मिलेगी

आदमी होकर भी जीते नहीं हो क्या
खून को उबाल कर पीते नहीं हो क्या
फ़ट रही जो रोज-रोज दर्द की कमीज
बेटी की गर्म सांस से सीते नहीं हो क्या

कितनी तबाह हो चुकीं मजबूर बेटियाँ
इज्जत खरीदती है जेवरों की पेटियाँ
सत्ता की कुर्सियाँ तो लाशों पे खड़ी है
पेटों को तुमने कर दिया वोटों की पेटियाँ

बोलो जरा किसने इन्हे मजबूर बनाया
आदमी से आदमी को दूर बनाया
तुम्हीं आदमखोर थे इतिहास के घर में
एक गेहूँ जख्म को तंदूर बनाया

पवन दीवान
ग्राम किरवई (राजीम)
जिला रायपुर - छत्तीसगढ

बढ रही मंहगाई हमको आजमाने के लिए

भाई योगेन्द्र मौदगिल के गजल संग्रह ‘अंधी आँखे-गीले सपने” से एक गजल प्रस्तुत कर रहा हूँ।

बढ रही मंहगाई हमको आजमाने के लिए।
आदमी जिंदा है केवल तिलमिलाने के लिए।

बेकसी बढती रही गर दाने-दाने के लिए।
तन पड़ेगा झोंकना चूल्हा जलाने के लिए।

प्याज ने आँसू निकाले, देख बेसन ने कहा।
चाहिए अब तो कलेजा, हमको खाने के लिए।

इतनी ऊँची कूद मारी इस उड़द की दाल ने।
लोन अब लेना पड़ेगा दाल खाने के लिए।

सोचता हूं वो जमाना खूब था,जब हम पढ लिए।
दिन में तारे दिख गए, बच्चे पढाने के लिए।

नौकरी जब ना मिली तो उसने किडनी बेच दी।
दो निवाले भूखे बच्चों को खिलाने के लिए।

इक चटाई, एक धोती, एक छ्प्पर, एक घड़ा।
उम्र सारी काट दी इनको बचाने के लिए।

भूख ने तड़फ़ा दिया तो बेईमानी सीख ली।
शुक्रिया रब्बा तेरा ये दिन दिखाने के लिए।

तन पे है बनियान चड्डी,दोनों के, पर फ़र्क है।
इक छिपाने के लिए और इक दिखाने के लिए।

भन गया मैं भी मिनिस्टर, भोली जनता शुक्रिया।
मिल गया लाईसेंस मुझको देख खाने के लिए।

माफ़िया का क्या गजब का शौक है भैइ देख लो।
वर्दियों को पाल रक्खा दुम हिलाने के लिए।

चंद वादे, चंद नारे, चंद चमचे “मौदगिल’
पर्याप्त हैं इस देश की संसद में जाने के लिए।

तुम्हारी गांधारी दृष्टि

मैं सोचता था
कविता में सिर्फ़ भाव होते हैं
जो अंतरमन से उतरते हुए
कागज पर अपना रुप लेते है
लेकिन जब कविता
तुम्हारे पास पहुंचती है तो
उसमें क्या-क्या नहीं ढूंढ लेते तुम
गांधारी आंखो से
विदुर दृष्टिकोण तुम्हारा
ढूंढ लेता है
शिल्प,बिंब, अलंकार, व्यथा
व्याकरण, छंद, समास
अतिश्योक्ति, रस और श्रंगार
वियोग,करुणा, रसखान
जो मुझे नहीं दिख पाते
वंदन है तुम्हारी गांधारी दृष्टि का

आपका 
शिल्पकार

तुलने लगे कुबेर भी अनुदान के लिए

हम लड़ रहे हैं मित्र दोना पान के लिए
भाड़े में भीड़ जुटती है सम्मान के लिए

क्या नहीं होता अब पूजा के नाम पर
बिक जाते हैं फ़रिश्ते अनुष्ठान के लिए

है खेल सियासत का कुर्सी के वास्ते
तुलने लगे कुबेर भी अनुदान के लिए

अपने उसुलों के लिए बागी हुए हैं हम
छोड़े हैं सिंहासन भी स्वाभिमान के लिए

माला गले में डालने की होड़ मची है
सब दौड़ रहे हैं झूठी पहचान के लिए

संदेह से घिरी हैं सारी उपाधियाँ
जीता है कौन धर्म और ईमान के लिए

इतने गरीब हो गए नवरंग इन दिनों
दो फ़ूल जुटा न पाए बलिदान के लिए

माणिक विश्वकर्मा 'नवरंग'
कोरबा (छ ग)

 

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