मंगलवार, 24 मई 2011

कठपुतली

कठपुतली नाचती है
उसके हर ठुमके पर
तालियाँ बजती हजार
होठो पर छाती है स्मित 
थिरकते कदमों से 
करती है अभिवादन
खेल ख़त्म होते ही
नट खोलता है धागे
अपने पोरों से 
बेजान कठपुतलियां
फिर टंग जाती हैं
बरसों पुरानी खूंटी से
बार बार छली जाती हैं
मालूम होते हुए भी 
उनके प्राण किसी 
और के हाथों में हैं
जो धागे बांध नाचता है
     
आपका 
शिल्पकार  

8 टिप्पणियाँ:

ravikumarswarnkar ने कहा…

बेहतर जनाब...

AlbelaKhatri.com ने कहा…

aanand aa gaya bhai ji..........

baabe ki jai ho !

वन्दना ने कहा…

सशक्त अभिव्यक्ति।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

हम भी कठपुतलियाँ ही हैं बस बेजान नहीं हैं ...

सुन्दर रचना

शरद कोकास ने कहा…

हमे तो इतना पता है कि इस कठपुतली को बनाता शिल्पकार ही है । अब इस कठ्पुतली और शिल्पकार के ध्व्न्यार्थ समझ लें ।

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

हम सब कठपुतलियां है ... कभी उस अनदेखे ईश्वर के हाथ, कभी राजनेता के हाथ, कभी अधिकारियों के हाथ तो कभी हालात के हाथ :(

ZEAL ने कहा…

इश्वर के रचे इस खेल में , हम सब कठपुतलियां ही तो हैं ।

Kailash C Sharma ने कहा…

गहन भाव लिये बहुत सुन्दर प्रस्तुति...