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साक्षरता


मै अनपढ
मिला तुमसे तो
सीख गया पढना
चेहरे के भाव
जो सपाट लगते थे
स्वयं कह देते हैं
बिना कहे ही
और मैं पढ लेता हूँ
तुम्हारे अंतरमन  की
साक्षर हो गया हूँ
तुम्हारी एक मुस्कान
छा जाती है नभ बनकर
खामोशी तुम्हारी
मेघों में भरा हुआ वर्षा जल
गर्भ धारण कर रखा हो उसने
हिरण्यमयी गर्भ
वर्षा उपरांत
उजास फ़ैलाने के लिए
मै पढना सीख गया हूँ

Comments :

12 टिप्पणियाँ to “साक्षरता”
Pallavi ने कहा…
on 

वाह बहुत ही सुंदर भाव संयोजन के साथ सार्थक प्रस्तुति ....

संध्या शर्मा ने कहा…
on 

बिना कहे ही
और मैं पढ लेता हूँ
तुम्हारे अंतरमन की
साक्षर हो गया हूँ...
लाज़वाब रचना ...प्रेम और समर्पण की पराकाष्ठा...
अब मेरा कुछ भी ना रहा
तू मैं और मैं तू हो गया हूँ...

Sunita Sharma ने कहा…
on 

bahut hi khubsurat rachna hai..sanketik bhaw is rachna ke mahatwpurn paksha hai..badhai ho

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…
on 

चेहरे के भाव
जो सपाट लगते थे
स्वयं कह देते हैं
बिना कहे ही
और मैं पढ लेता हूँ
तुम्हारे अंतरमन की.

बहुत सुंदर......

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…
on 

बड़ सुग्घर कविता हवे ललित भईया....
सादर बधइ.

Rahul Singh ने कहा…
on 

ढाई आखर...

sushila ने कहा…
on 

""और मैं पढ लेता हूँ
तुम्हारे अंतरमन की
साक्षर हो गया हूँ
तुम्हारी एक मुस्कान
छा जाती है नभ बनकर
खामोशी तुम्हारी
मेघों में भरा हुआ वर्षा जल"

बहुत सुंदर !

sushila ने कहा…
on 

""और मैं पढ लेता हूँ
तुम्हारे अंतरमन की
साक्षर हो गया हूँ
तुम्हारी एक मुस्कान
छा जाती है नभ बनकर
खामोशी तुम्हारी
मेघों में भरा हुआ वर्षा जल"

बहुत सुंदर !

sushila ने कहा…
on 
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
yashoda agrawal ने कहा…
on 

आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार साक्षरता दिवस 08/09/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

Onkar ने कहा…
on 

वाह, कमाल की रचना

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…
on 

बहुत ही बढ़िया


सादर

 

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