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गुगल बाबा

इंडी ब्लागर

 

मुआवजे का नमक!!

आज एक कविता फिर पुरानी डायरी से लिख रहा हूँ. इस पर डॉ. के.डी.सारस्वत ने अपनी कलम चलाई थी. आज से ६ वर्ष पूर्व उनकी हत्या स्नातक महाविद्यालय के प्राचार्य पद पर रहते हुए कर दी गई थी. अब उनकी यादें ही शेष है.

श्मशान 
सिर्फ श्मशान
जहाँ एक भयावह चुप्पी 
और नीरवता रहती है
घनघोर अँधेरे से 
अपनी बात कहती है
श्मशान की चार दीवारी से
लगा बहता है एक नाला
नाला नहीं 
दुखो और आंसुओं का सैलाब
देखी है उसने चिताए खुशियों की  
जहाँ दफन हैं गुलाब
एक बेशरम का झुण्ड
उसके साथ कुछ नरमुंड
जाता रहे थे सहानुभूति
साथ लाये थे 
मुआवजे का नमक
रिसते जख्मो पर मलने के लिए
तड़फते सिसकते लोगों, 
परिजनों के बीच 
बेशर्मी से खड़े हैं.
वोटों की राजनीति ने
इन्हें आदमी से 
हैवान बना डाला
मैं सोच रहा था.
इनको कभी श्मशान बैराग
क्यों नहीं व्यापता?
बस एक प्रश्न करता हूँ
कितनी हुयी विधवाएं?
कितने हुए अनाथ?
क्यों आये शमशान में?
एक प्रश्न चिन्ह है साथ.


(बेशरम= हमारे यहाँ उगने वाली एक तरह की झाड़ी है. जो काट कर फेंक देने से कहीं पर भी अपनी जड़ें जमा लेती है.)


आपका
शिल्पकार, 
  

Comments :

17 टिप्पणियाँ to “मुआवजे का नमक!!”
Udan Tashtari ने कहा…
on 

बहुत गहरी और प्रभावपूर्ण रचना...

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…
on 

बहुत शानदार रचना |

जी.के. अवधिया ने कहा…
on 

"साथ लाये थे
मुआवजे का नमक
रिसते जख्मो पर मलने के लिए
तड़फते सिसकते लोगों,
परिजनों के बीच
बेशर्मी से खड़े हैं.
वोटों की राजनीति ने
इन्हें आदमी से
हैवान बना डाला"

वाह!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…
on 

कविता अपने भाव का पूर्ण दर्शन करा रही है.
लोहड़ी की बधाई!

निर्मला कपिला ने कहा…
on 

bahut gaharee bhaavapoorN racanaa ke liye dhanyavaad lohaDee kee shubhakaamanaayeM

पी.सी.गोदियाल ने कहा…
on 

वोटों की राजनीति ने
इन्हें आदमी से
हैवान बना डाला
मैं सोच रहा था.
इनको कभी श्मशान बैराग
क्यों नहीं व्यापता?
बस एक प्रश्न करता हूँ
कितनी हुयी विधवाएं?
कितने हुए अनाथ?
क्यों आये शमशान में?
एक प्रश्न चिन्ह है साथ.
Bahut khoob !

Anil Pusadkar ने कहा…
on 

वाह!

ताऊ रामपुरिया ने कहा…
on 

बहुत गहन अभिव्यक्ति.

रामराम.

वन्दना ने कहा…
on 

bahut gahan abhivyakti.

मनोज कुमार ने कहा…
on 

साथ लाये थे
मुआवजे का नमक
रिसते जख्मो पर मलने के लिए
बेबाकी तथा साफगोई का बयान ...

राज भाटिय़ा ने कहा…
on 

बहुत अच्छी रचना,

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…
on 

गंभीर सोच!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
on 

बहुत ही सार्थक लेखन!
लोहिड़ी पर्व और मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएँ!

अविनाश वाचस्पति ने कहा…
on 

शमशान पर भी गुलाब
लाल टपक रहे हैं।

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…
on 

सुन्दर भावाभिव्यक्ति भाई
.


सकरायेत तिहार के गाडा गाडा बधई.

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…
on 

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति
वोट में ही तो खोट है
जहाँ देखो वहाँ लूट खसोट है
किसको पड़ी है किसी के जान की
बस फिक्र है तो अपनी "शान" की

ले फेर सकरायेत के बधाई
अउ ए साल फेर जम्मो झन कब
संकराबो (संघरबो)?

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…
on 

बहुत शानदार कविता. धन्यवाद.

 

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