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कब तक युवा रहेगा बसंत?

सुरसा मुख सी
बढती मंहगाई
कोल्हु के बैल कंधों पर
गृहस्थी का जुड़ा डाले
प्राण वायु मे घुलता जहर
रसायन से मौत उगलते खेत
बोझ से झुकी कमर
दीमक लगी उमर
जो नित चाट रही
जीवन रेखा
घुटने साथ नही देते
लेकिन
वो कहते हैं
बसंत बुढा नही होता
कोई उनसे पूछे
मोतियाबिंद से
अंधी हुई आंखे लेकर
मधुमेह ग्रसित
देह लेकर
धृतराष्ट्री व्यवस्था में
कब तक युवा रहेगा
बसंत


आपका
शिल्पकार

Comments :

15 टिप्पणियाँ to “कब तक युवा रहेगा बसंत?”
Udan Tashtari ने कहा…
on 

उफ्फ!! गहरी बात!!

गिरिजेश राव ने कहा…
on 

यह कविता'शरद कोकास' की संगति के असर से तो नहीं उपजी !

@ बोझ से झुकी कमर
दीमक लगी उमर
जो नित चाट रही
जीवन रेखा
घुटने साथ नही देते
लेकिन

वारे गए !!

ललित शर्मा ने कहा…
on 

हा हा हा
गिरजेश भाई,
शरद के बाद ही बसंत आता है।
इसलिए शरद से भी होकर गुजरना पड़ता है।


चिट्ठाकार चर्चा

निर्मला कपिला ने कहा…
on 

बहुत अच्छी रचना शुभकामनायें

जी.के. अवधिया ने कहा…
on 

"कब तक युवा रहेगा बसंत?"

भाई ललित जी, वसन्त ने तो चिर-यौवन पाया है फिर आप ऐसा प्रश्न क्यों कर रहे हैं? यदि वसन्त ने आपकी इस रचना को पढ़ लिया तो वह "दुष्यन्त कुमार" के जैसा यह कहेगाः

मँहगाई और गृहस्थी के बोझ ने मिलकर मादकता को भुला दिया होगा, मैं बूढ़ा कभी हुआ ही नहीं आपको धोखा हुआ होगा ...

ताऊ रामपुरिया ने कहा…
on 

बसंत ओ पैदायशी युवा है. बस व्यवस्था के खिलाफ़ उसको कमर क्सनी होगी.

रामराम.

श्यामल सुमन ने कहा…
on 

लोगों के ही राथ में बूढ़ा हुआ वसंत।
मँहगाई की मार से झेले कष्ट अनंत।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…
on 

कब तक युवा रहेगा
बसंत....
वाकई गहरी बात कह गये आप.

पी.सी.गोदियाल ने कहा…
on 

वो कहते हैं
बसंत बुढा नही होता
कोई उनसे पूछे
मोतियाबिंद से
अंधी हुई आंखे लेकर
मधुमेह ग्रसित
देह लेकर
धृतराष्ट्री व्यवस्था में
कब तक युवा रहेगा
बसंत ?

बहुत सुन्दर कविता और विचारणीय प्रश्न ललित जी

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…
on 

धृतराष्ट्री व्यवस्था में
कब तक युवा रहेगा
बसंत ?

सही ब्यान किया है.

मनोज कुमार ने कहा…
on 

लाख टके का प्रश्न। बहुत सटीक रचना।

'अदा' ने कहा…
on 

@ललित जी
हा हा हा
गिरजेश भाई,
शरद के बाद ही बसंत आता है।
इसलिए शरद से भी होकर गुजरना पड़ता है।

नहले पे दहला ,,,हा हा हा
अरे हम खुद धृतराष्ट्र हुए जा रहे हैं आज कल... दिन रात कंप्यूटर के सामने बैठे रहे हो धृतराष्ट्र नहीं तो गांधी तो हो ही जावेंगे न...
बढ़िया लिखते हैं आप ...

'अदा' ने कहा…
on 

गाँधी नहीं बाबा गांधारी ..:):)
वैसी गाँधी भी ठीक ही है....

राज भाटिय़ा ने कहा…
on 

रसायन से मौत उगलते खेत
बोझ से झुकी कमर
दीमक लगी उमर
जो नित चाट रही
बहुत सुंदर रचना आप से सहमत है जी

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…
on 

वाह भैया, वयस्था पर करारा चोट, गिरिजेश जी की टिप्पणी भी.


धृतराष्ट्री व्यवस्था का बढिया चित्र खींचा आपने, धन्यवाद.

 

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