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बड़ी हवेली ढहने लगी है अब !!

आज ढाई पंक्ति की ही कविता कहने का दिल है. ढाई पंक्ति में ही पूरी बात कहने की कोशिश करता हूँ. आपका आशीर्वाद चाहूँगा.




(१) .

बड़ी हवेली 
ढहने लगी है अब 
किसी ने पलीता लगा दिया



(2 )


बर्फ का हिमालय
आज पसीने से नहा गया 
ज्वाला मुखी जो फुट रहा है


आपका 
शिल्पकार, 

Comments :

16 टिप्पणियाँ to “बड़ी हवेली ढहने लगी है अब !!”
पी.सी.गोदियाल ने कहा…
on 

बड़ी हवेली
ढहने लगी है अब
किसी ने पलीता लगा दिया,
इस कडाके की ठण्ड में
किसने ये ललित जी का
'काव्य-ललीता' जगा दिया ?


बर्फ का हिमालय
आज पसीने से नहा गया
ज्वाला मुखी जो फुट रहा है,
इस कडाके की ठण्ड में
ललित जी की कविता पढ़कर
धैर्य मेरा भी टूट रहा है !

जी.के. अवधिया ने कहा…
on 

वाह ललित जी! आपने तो गागर में सागर भर के रख दिया है!!

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…
on 

ये कविता कहाँ....ये तो बडा भारी व्यंग्य है :)

शहरोज़ ने कहा…
on 

दर्द तो दर्द है! पिघलना !!! ओह!

राजीव तनेजा ने कहा…
on 

कम शब्दों में गहरी बात...बहुत बढिया

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…
on 

बडे भाई जो दिल कहे वही कविता.
वक्त के पलीते से बडे बडे दरोदीवार उजड जाते है.
शव्दो के ज्वालामुखी एसे ही फूटते रहे ...........

राज भाटिय़ा ने कहा…
on 

बडी हवेली...
बहुत गहरी बत लिख दी आप ने
धन्यवाद

मनोज कुमार ने कहा…
on 

बहुत ही कठोर प्रहार है इन ढ़ाई पंक्तियों के द्वारा।

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…
on 

ढाई लाइन की पंक्तियों के रचना कार हो गये आप तो ढाई लाइन में ही कमाल कर दिए..बधाई ललित जी!!!

वाणी गीत ने कहा…
on 

पलीता लगा दिया..... किसने लगाया ...क्यों लगाया ...
कमिटी बिठाई जायेगी ....
बर्फ का ज्वालामुखी ...अतिश्योक्ति वर्णन ...!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
on 

इन्हे क्षणिकाएँ कहूँ या सीपिकाएँ।

दोनों शब्द-चित्र बहुत बढ़िया हैं।

ललित शर्मा ने कहा…
on 

@ वाणी जी, पहले आप ठीक से पढिए, मैने बर्फ़ का "ज्वाला मुखी नही, बर्फ़ का हिमालय" कहा है और इसमे अतिश्योक्ति आपको कहां से नजर आई? अभी भूवैज्ञानिकों ने शोध किया है कि हिमालय के नीचे एक बहुत बड़ा ज्वालामुखी मिला है और उसकी तश्वीरें भी जारी की गई है।

गिरिजेश राव ने कहा…
on 

हम निहाल हैं। समझने वालों को क्या कहें! इसके पहले वाली कविता में इशारा कर दिए हैं।
अब देखिए मेरे भीतर जोर मार रहा है सो कह रहा हूँ। अर्ज किया है:
________________

गिरिजेश राव ने कहा…
on 

बड़ी हवेली
ढहने लगी
लगा पलीता


बर्फ का हिमालय
पसीने पसीने
ज्वालामुखी फूटा।

शरद भैया से बँचवाइएगा।

टिप्पणी तो एक ही थी, पता नहीं कैसे बाद का हिस्सा ग़ायब हो गया। सो दुबारा दे रहा हूँ।

बहुत दिनन पर इत्थे आए
मन ही मन बहुते हरसाए
शिल्प शोभा देख पगलाए
देख रहे हैं दाएँ बाएँ।

धन्य भए महराज। ललित नाम सार्थक कर दिए।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…
on 

सुंदर अति सुंदर. इस मौलिक सोच के लिये शाबासी ग्रहण करिये.

रामराम.

वन्दना ने कहा…
on 

waah, bahut sundar

 

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