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तृप्ति तभी ही संभव है.!!!!

तृष्णा
मृग तृष्णा
मरीचिका
अतृप्त आत्मा
अतृप्त चक्षु 
मन चातक
मयंक की ओर
निहार रहा है 
अपलक
दुनिया के प्रपंच
बाधाएं जीवन की
खड़ी हैं निरंतर 
सामने 
अवरोधक बनकर 
जिन्हें पार करना है
एक कुशल धावक की तरह
पहुंचना है विजय रेखा तक 
तृप्ति
तभी ही संभव है.


आपका
शिल्पकार

Comments :

6 टिप्पणियाँ to “तृप्ति तभी ही संभव है.!!!!”
जी.के. अवधिया ने कहा…
on 

"बाधाएं जीवन की
खड़ी हैं निरंतर
सामने
अवरोधक बनकर
जिन्हें एक पार करना है
एक कुशल धावक की तरह
पहुंचना है विजय रेखा तक
तृप्ति
तभी ही संभव है."


अति सुन्दर!

Udan Tashtari ने कहा…
on 

बहुत ऊँची बात कह गये आप!! जय हो इस रचना के लिए.

पी.सी.गोदियाल ने कहा…
on 

बाधाएं जीवन की

खड़ी हैं निरंतर

सामने

अवरोधक बनकर

जिन्हें पार करना है

एक कुशल धावक की तरह

पहुंचना है विजय रेखा तक

तृप्ति

तभी ही संभव है.

KYA BAAT HAI, ज्ञान की बात कही आपने ललित जी !

Murari Pareek ने कहा…
on 

कुशल धावक ही तो नहीं हैं यहाँ !! sundar rachnaa !!!

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…
on 

एक कुशल धावक की तरह
पहुंचना है विजय रेखा तक
तृप्ति
तभी ही संभव है.

बेहतरीन ।

मनोज कुमार ने कहा…
on 

अद्भुत।

 

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