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इंडी ब्लागर

 

घुटने टेक देने से जीत नहीं होती !

लड़ो,  भिड़ो,   श्रम   करो, संघर्ष करो 
घुटने   टेक   देने   से जीत नहीं होती 


खुरचते  रहो, छिलते  रहो, काटते रहो
समर्पण  करने  से   जीत  नहीं  होती


झोंको,  तोड़ो,  काँटों को उखाड़ फेंको
हाथ  खड़े  करने से  जीत  नहीं  होती


बिना  चैन डटे रहो अंतिम साँस तक
डरके   भागने   से   जीत  नहीं होती


छोड़ते नहीं शिकारी सोई चिड़िया को
हार  मानकर सोने से जीत नहीं होती
 
आपका 
शिल्पकार

Comments :

9 टिप्पणियाँ to “घुटने टेक देने से जीत नहीं होती !”
Udan Tashtari ने कहा…
on 

छोड़ते नहीं शिकारी सोई चिड़िया को
हार मानकर सोने से जीत नहीं होती


-जबरद्स्त उत्साह!! वाह!!

जी.के. अवधिया ने कहा…
on 

बहुत बढ़िया लिखे हस महराज!

prashant ने कहा…
on 

अच्छा लिखा है

पी.सी.गोदियाल ने कहा…
on 

ललित जी ,एकदम सही बात कविता के माध्यम से,
गिरते है .. वो क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते है

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…
on 

बहुत ही ओजपूर्ण कविता है। बधाई।
------------------
सांसद/विधायक की बात की तनख्वाह लेते हैं?
अंधविश्वास से जूझे बिना नारीवाद कैसे सफल होगा ?

M VERMA ने कहा…
on 

हाथ खड़े करने से जीत नहीं होती
सुन्दर और प्रेरक रचना.

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…
on 

हौसला कभी कम ना हो,
दिल में कोई गम ना हो,

जिंदगी तो संघर्ष का नाम है,
लड़ते रहो जीत जाओगे..

बढ़िया प्रस्तुति...आभार

राज भाटिय़ा ने कहा…
on 

छोड़ते नहीं शिकारी सोई चिड़िया को
हार मानकर सोने से जीत नहीं होती
ललित जी बहुत सुंदर रचना

मनोज कुमार ने कहा…
on 

अच्छी रचना। बधाई।

 

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