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काहे नेह लगाय!!!

मित्रों शिल्पकार दो दिनों तक कुछ लिख नहीं पाया क्योंकि गरमा गरम ही प्रस्तुत करने की आदत पड़ गई है. तुरंत लिखो और छाप दो. इन दिनों में मैंने टेम्पलेट बदला और इस पर अभी और भी काम बाकी है. पुराने टेम्पलेट के विषय में हमारे कई मित्रों ने शिकायत दर्ज कराई थी. यह ठीक से खुलता नहीं है  इससे लिखा हुआ दीखता नहीं है. इसे ही ध्यान में रख कर टेम्पलेट बदला गया है. अब कैसा है? कृपया अवगत कराएँ. इस अवसर पर एक नया "काया गीत" प्रस्तुत है. ब्लॉग का चोला तो बदल गया है. यह टेम्पलेट ( माटी का चोला) भी बदलना पड़ेगा . इसे बदलना उस परमेश्वर के हाथ है. इसलिए इसकी तैयारी भी आवश्यक ही हो जाती है.पता नहीं कब बुलावा आये, इस लिए चलने की तैयारी में यह गीत प्रस्तुत है. आपका आशीर्वाद चाहूँगा.  


हंसा जग है एक सराय
एक पल का ठहराव यहाँ पर काहे नेह लगाय

कोई  चलने की जल्दी में है कोई खड़ा राहों में
कोई  झांक रहा  झरोखे  से कोई पड़ा बाहों में
कोई  बतियाए  बालम  से  कोई  नैन  चुराय
हंसा जग है एक सराय
एक  पल  का ठहराव यहाँ पर काहे नेह लगाय

कोई  नाचे रोये गाये कोई सारंगी तान सुनाय
कहीं  मरघट  कहीं  जगमग  कोई धुनी  रमाय
खुब  लगा  मेला  जग  का देखे आँख न समाय
हंसा जग है एक सराय
एक पल का ठहराव यहाँ पर काहे नेह लगाय


तभी  एक  पल  की आँधी  ने कैसा रचा है खेला
सबका सब ही उजड़  गया बचा न एक भी धेला
दे दे किराया अपना प्राणी, काहे को ॠण चढ़ाय
हंसा जग है एक सराय
एक पल का ठहराव यहाँ पर काहे नेह लगाय


आपका
शिल्पकार

Comments :

11 टिप्पणियाँ to “काहे नेह लगाय!!!”
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
on 

तभी एक पल की आँधी ने कैसा रचा है खेला
सबका सब ही उजड़ गया बचा न एक भी धेला
दे दे किराया अपना प्राणी, काहे को ॠण चढ़ाय
हंसा जग है एक सराय
एक पल का ठहराव यहाँ पर काहे नेह लगाय

गर्जना और वर्जना का सुन्दर संगम।
रचना बहुत बढ़िया है।

जी.के. अवधिया ने कहा…
on 

सही कहा है...

कोऊ काहू में मगन, कोऊ काहू में मगन ...

निर्मला कपिला ने कहा…
on 

सही बात है । ताज़ा परोसा अच्छा लगा। धन्यवाद्

ताऊ रामपुरिया ने कहा…
on 

हंसा जग है एक सराय
एक पल का ठहराव यहाँ पर काहे नेह लगाय


सही कहा आपने, पर नेह, राग विराग तो दिन प्रतिदिन बढता ही जारहा है? कोई उपाय महाराजजी?

रामराम.

M VERMA ने कहा…
on 

कोई बतियाए बालम से कोई नैन चुराय
हंसा जग है एक सराय
बेहतर ढंग से जीवन का कौतूहल उजागर हुआ है. नेह तो लग जाती है सायास कौन लगाता है.

राज भाटिय़ा ने कहा…
on 

बहुत सुंदर रचना, लेकिन लोग समझते कहा है, सब सात पिडियो तक का जोड कर रखते है

गिरीश पंकज ने कहा…
on 

chola bhi achchha lag raha hai, aur rachana bhi...badhai. apni lalit-pratibha ka isi tarah parichay dete rahana....

Mithilesh dubey ने कहा…
on 

क्या बात है , लाजवाब लगा पढ़कर , बहुत खूब ।

संगीता पुरी ने कहा…
on 

बहुत बढिया !!

singhsdm ने कहा…
on 

कोई संदेह नहीं शिल्पकार जी यह कलेवर पहले से ज्यादा प्रभावशाली है ......साथ ही कविता भी शानदार.....दोनों की बधाई!

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…
on 

सुन्‍दर टैम्‍पलेट व भावपूर्ण कायागीत. धन्‍यवाद.

 

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