सोमवार, 30 नवंबर 2009

साजन के संदेशे अब हमें मिल गए

साजन के संदेशे अब हमें मिल गए
हजारों कंवल मन में अब खिल गये

चल  पड़ेंगे  अब सफ़र में सोच कर 
मन  के  दुवारे हजारों दीप जल गए

ये कैसा मिलन का आनंद है साजन
दुनिया   के  सब  मेले  फीके रह गए

मिलन  की  आस लगी थी दिन रैन 
मिलेंगे  अब  नये चमन में कह गए

साँस  यूँ  आई   बड़ी   जब   जोर  से 
मौत  के  किवाड़  सब  ये   खुल  गये

आपका 
शिल्पकार

रविवार, 29 नवंबर 2009

याद आ जाये दूध छठी का ऐसा युद्ध रचाऊँगा !!!!!!

जब मातृभूमि पर संकट आता है, जब कोई दुश्मन आँखे दिखाता है, तो बच्चा, बुढा, जवान, स्त्री-पुरुष सभी उसकी रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग करने को लालायित हो जाते हैं और दुश्मन को करार जवाब देने की उत्कट अभिलाषा उनके मन में उठती है. ऐसा ही एक अवसर "कारगिल" युद्ध के रूप में हमारे सामने आया था. जिसका समस्त देशवाशियों ने कसकर मुकाबला किया और लड़ाई भी जीती. उस समय एक बालक के मन में भी यही  देश भक्ति का जज्बा था वो अपनी माँ से  कहता है.

माँ मै भी लड़ने जाऊंगा
कारगिल के घुसपैठियों को जाकर मार भागूँगा
काँप  उठेंगी  पाकी  फौजें  ऐसी मार लगाऊंगा 
माँ मै भी लड़ने जाऊंगा
भारत माँ की  रक्षा  खातिर  अपना लहू बहाऊंगा
पहन बसंती चोला मै दुश्मन का दिल दहलाऊंगा 
माँ मै भी लड़ने जाऊंगा  
हर-हर  महादेव  का नारा  वहां जोर से लगाऊंगा
करने  सरहदों  की  रक्षा  अपना  शीश  चढाऊंगा 
माँ मै भी लड़ने जाऊंगा 
करके दुश्मनों की छुट्टी वहां तिरंगा लहराऊंगा 
याद  आ  जाये दूध छठी का ऐसा युद्ध रचाऊँगा 
माँ मै भी लड़ने जाऊंगा 


आपका 
शिल्पकार

शनिवार, 28 नवंबर 2009

समा जाना है फिर इसी माटी में

मौसम ही कुछ
ऐसा हुआ है 
वृक्ष पर एक भी पत्ता नहीं
यह मौसम पहले भी आता था
इतना भयानक रूप 
पहले कभी देखा नहीं
कोयल की कूक 
बुलबुल के नगमे 
खो गये हैं कहीं
तेज पवन के झोंकों से
सिर्फ पत्तों के 
खड़कने की आवाज आती है
पत्ते कहते हैं
वृक्ष हमारा साथ छोड़ देता है
उस पर फिर यौवन आएगा
हरियाली का उन्माद छाएगा
वह स्वयं ही जुदा हुआ है
हमसे फिर कहता है 
पत्ते साथ छोड़ देते हैं
लेकिन हम साथ रहे सदा तुम्हारे
पहले भी हमने 
आँधियों का तुफानो का
सामना साथ किया था
लेकिन अबकि बार 
आंधियों में हमारे पांव जम न सके
हम शीशे की तरह
टूट कर बिखर गए
यह तो प्रकृति का खेल है
कुछ देर यौवन का उन्माद देखना है
फिर टूट कर बिखर जाना है
समा जाना है फिर 
इसी माटी में 
गुम हो जाना है
बिना किसी अस्तित्व के 
बेनाम होकर

आपका
शिल्पकार

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

कब आओगे??????????

तलाशता हुँ 
तुम्हे नित्य
सड़क पर
आती जाती बसों में
अपने गंतव्य की ओर जा रहे
यात्रियों की भीड़ में
जब कोई बस आती हुई 
दिखाई देती है दूर से
तुम्हे देखने चढ़ जाता हूँ
ऊँचे टीले पर
पहाडी टेकरी पर
फिर एक बार 
सवारियों के बीच 
तुम्हें तलाशता हूँ
कुछ समय बाद 
दूसरी बस आती है
तुम्हे लिए बिना
मैं उसे जाते हुए देखता हूँ
फिर उसके आने की
प्रतीक्षा करता हूँ
जब से तुम गई हो
नित्य यही होता है
बस आती है 
और चली जाती है
मैं इंतजार करता हूँ
हाथ में लिए हुए 
सुखा गुलाब का फूल
जो लाया था उस दिन 
तुम्हारे जन्म दिन पर
तब से आज तक 
फिर नहीं आया 
तुम्हारा जन्म दिवस
मैं तुम्हारे लौट आने की
प्रतीक्षा में खड़ा हूँ 
वहीं पर 
उस टेकरी पर
आती जाती बसों को 
देखते हुए.
रोज की तरह 
जन्म दिन की 
मुबारकबाद देने के लिए 

आपका 
शिल्पकार

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

तड़-तड़ तड़-तड़

आज  मै 
एक अरसे बाद
फिर उस गली से
हो कर गुजरा
जहाँ हुआ करती थी
रात-रानी के 
फूलों की मधुर महक
चम्पा के फूलों की
खुशबु से भरी सुबह
मगर वह खुशबु 
आज मुझे नहीं मिली
बारूद की गंध 
उड़ रही थी फिजा में 
तड़-तड़ तड़-तड़ 
गोलियों की आवाज 
के बीच 
कहीं खो गई थी 
वह गली 
मासूमों का खून 
बहाती वह सुबह
जिन्हें पता ही नहीं था
मौत कहाँ से आ गई?
खून से रंगी हुयी सड़क
मौत के तांडव की कहानी
कह रही थी
मुझे लगा की पुरानी
गली कहीं खो गई है
ठीक हमारी 
सुरक्षा के 
ठेकेदारों की तरह
उसकी जगह नई 
गली आ गई है
नेपाली गोरखों की 
पनाह लिए
सिर्फ "जागते रहो"
सुनने के लिए 
कब तक हम 
इनके भरोसे
सोते-सोते 
जागते रहेंगे
सिर्फ" जागते रहो"
के सहारे


आपका 
शिल्पकार 


बुधवार, 25 नवंबर 2009

एक भीख मांगता बच्चा

एक सप्ताह के अवकाश के बाद आज पुनः एक कविता प्रस्तुत है.


धुप में
झुलसता हुआ
रेत की आग में
जलता हुआ
एक भीख मांगता बच्चा


करुण स्वर में
पुकार कर
दर्शनार्थियों को 
आकर्षित करता
एक भीख मांगता बच्चा


वक्त के 
क्रूर चक्र में
भाग्य रेखाओं की
उलझन में
उलझा हुआ 
एक भीख मांगता बच्चा


अपंगता का 
वरदान लिए
भाग्य में श्राप लिए
आसमान की ओर निहारता
एक भीख मांगता बच्चा

आपका 
शिल्पकार

बुधवार, 18 नवंबर 2009

"दुनिया ने तजुर्बातो हवादिश की शक्ल में जो कुछ मुझे दिया वो लौटा रहा हूं मैं" -शिल्पकार 100 वीं पोस्ट

म्रित्रों आज मेरे ब्लॉग की 100 वीं पोस्ट है. मैं आज अपने अनुभव लिख रहा हूं, ब्लॉग पर वैसे मैं जनवरी माह में आ गया था अपने पहले ब्लॉग"शिल्पकार के मुख से" के साथ, तब यह ही समझ नहीं थी कि ब्लॉग पर क्या लिखा जाता है, ब्लॉग का नाम तो बहुत सुना था इसलिए इस पर आ भी गए, लेकिन एक समस्या से काफी दिनों तक जूझता रहा. ब्लॉग का पता लोगों को कैसे चले और कहाँ से पढ़ा जाये. मैंने अपने मित्रों का इसका पता भेजा, उन्होंने पढना शुरू किया, लेकिन तब तक मैं किसी ब्लोगर के संपर्क में नहीं आया था. फिर लगातार मेरा दौरा चालू हो गया फिर जून में मैंने ब्लॉग पर एक पोस्ट लिखी और फिर अपने काम में लग गया. कई दिनों बाद मैंने ब्लॉग खोला तो उसमे 8 टिप्पणियाँ थी, जिन्हें पढ़ कर मैं बहुत ही खुश हुआ, चलो मेरे लिखे को किसी  पढा  तो सही, फिर मैं सोचने लगा कि इनको मेरे ब्लाग का एड्रेस कैसे पता चला? मैंने जब टिप्पणी के लिंक पर क्लिक किया तो, टिप्पणी कर्ता की प्रोफाइल खुली. उनसे और भी ब्लॉग  के नाम थे वहां से मैंने पहली बार किसी दुसरे ब्लॉग का दर्शन किया और फिर मैं वही से पढ़ता था. बड़ा आनद आता था. एक दिन मैंने अपने ब्लॉग का पता सर्च किया तो चिटठा जगत के साथ मेरे ब्लॉग का नाम दिखा, मैंने उसे खोला तो देखा वहां पर ब्लॉग ही ब्लॉग थे. पढने की इतनी सारी सामग्री देख के मैं बहुत ही खुश हुआ. लगा कि किसी दूसरी ही दुनिया में पहुँच गया. मैं इतना अभिभूत था की जिसका वर्णन मैं शब्दों में नहीं कर सकता और उस अनुभूति का वर्णन करने के लिए आज भी मेरे पास शब्द नही हैं. अब मैं चिटठा जगत से ब्लॉग पढने लगा. लेकिन मुझे ये पता नही चला कि चिटठा जगत से ब्लॉग कैसे जोड़ते हैं? और यह यक्ष प्रश्न कई दिनों तक मेरे सामने खडा रहा. फिर मैंने सोचा कि एक ब्लॉग और बनया जाये जिसे हरियाणी में ताऊ के किस्से लिखे जाएँ. फिर "एक लोहार की" नामक ब्लॉग का जन्म हुआ. और उसपे भी लिखने लगा. "शिल्पकार के मुख से" नामक ब्लॉग पर पहली टिप्पणी गिरिजेश राव जी की थी-गिरिजेश राव ने कहा…सम्भवत: आप पहले व्यक्ति हैं जिसने हिन्दी ब्लॉग पर अपने को शिल्पकार घोषित किया है। स्वागत है निर्माण के कर्मी। ।June 3, 2009 10:12 PMएक अनुरोध - word verification रखा हो तो हटा दें,समय ने कहा… भाई पहले जरा इस शिल्पकार शब्द से आपका तात्पर्य समझा दीजिए.भ्रम ना रहे।स्वागत है.ravikumarswarnkar ने कहा… शुभकामनाएं...नारदमुनि ने कहा… naryan नारायण,  nislamicwebdunia ने कहा… ..आपने अच्छा मुद्दा उठाया है,alka sarwat ने कहा… प्रिय बन्धु ,जय हिंद, हे शिल्पी मेरे देश को नये तरीके से गढ़ने में मेरी मदद करो अगर आप अपने अन्नदाता किसानों और धरती माँ का कर्ज उतारना चाहते हैं तो कृपया मेरासमस्त पर पधारिये और जानकारियों का खुद भी लाभ उठाएं तथा किसानों एवं रोगियों को भी लाभान्वित करें,Kavyadhara ने कहा… जब भी कोई बात डंके पे कही जाती है,न जाने क्यों ज़माने को अख़र जाती है ।संगीता पुरी ने कहा…बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं। इस तरह ये प्रथम आठ टिप्पणियाँ मुझे मिली. इससे मेरा उत्साह वर्धन हुआ. लेकिन इनमे से एक टिप्पणी ने मुझे आहत किया वो थी नारदमुनि- की -नारायण-नारायण. अब इस विषय पर मैं आपसे ही पूछता हूँ कि यदि आप किसी दुनिया के विषय में कुछ नहीं जानते हो और कोई आपको आकर नारायण-नारायण कहे तो आप उसका क्या अर्थ लगायेंगे? यही ना कि यह व्यक्ति आपका उपहास कर रहा है-आपकी मजाक उड़ा रहा है. मुझे भी ऐसा ही लगा. मैंने अपनी अगली पोस्ट में इनका उल्लेख किया. और अपने मन की बात कही, तब तक मुझे नारद मुनि जी का पता नहीं था. अब पता चल गया. उनसे मेरा एक ही निवेदन है. कि जब आप नए चिट्टों का स्वागत कर रहे हों तो उसके ब्लॉग पर अपनी पूरा कमेन्ट कर के आयें. चाहे वो अच्छा हो या बुरा, शब्दों का पूरा इस्तेमाल करें-कहीं फिर कोई नया व्यक्ति आपके नारायण-नारायण कि गुहार से अनजाने में ही आहत हो जाये. भले आपकी मंशा सही हो. मेरे लगातार लेखन के इस महीनो में मुझे ब्लोगर भाइयों-बहनों एवं मित्रो का  अथाह प्रेम-स्नेह एवं वात्सल्य मिला, अब मुझे सब अपने एक परिवार की तरह ही लगने लगे हैं "गिरीश पंकज भैया" के शब्दों में "ललित ये तो अद्भुत दुनिया है भाई" इनके शब्द अक्षरश: सत्य प्रतीत होते हैं. अद्भुत दुनिया है. हम कभी कम्प्यूटर पर बैठे बैठे, अकेले ही किसी अनजान के दुःख में शरीक हो कर दुखी हो जाते हैं . कभी कुछ ख़ुशी मिलने पर या किसी की टिप्पणी पढ़ के अकेले में ही हंस रहे होते है. लगता है ना कभी! अजीब ही पागलपन है? लेकिन इतने दिनों में मैंने एक बात समझी जानी है. यदि किसी बीमार आदमी को, जो मरने वाला हो और इस ब्लॉग की दुनिया से जोड़ दिया जाये तो उसे ले जाने वाले यमदूत भी भाग जायेंगे. और वह ठीक हो जायेगा. मुझे लग भग सभी का स्नेह मिला, जिनमे कुछ लोगो के नामो का तो उल्लेख अवश्य ही करूँगा. मेरे सभी आदरणीय-समीर लाल जी- इनका रहस्यमयी व्यक्तित्व, बाबु  देवकी नंदन खत्री के उपन्यास के "चन्द्रकान्ता संतति" के एयारों की तरह, मैं कई बार देखता हूँ कि इनकी टिप्पणियाँ रात १२ बजे तक चलती हैं. और फिर सुबह उठ कर देखता हूँ तो मेरे ब्लॉग पर इनकी टिप्पणी साढ़े चार बजे भी रहती है. और सभी ब्लोगों तक पहुँच भी जाते हैं. इसीलिए ये ब्लोगर नंबर एक है.हम चाह कर भी सब तक नहीं पहुँच पाते. शायद इसी लिए कहते हैं" कानून (समीर भाई) के हाथ बहुत लम्बे होते हैं.एक बार हमारे फौजी ताऊ मनफूल सिंग ने पूछा भी था.इस विषय में लेकिन समीर भाई की तरफ से कोई जवाब नहीं आया. ना ही आज तक उनकी जिज्ञासा शांत हुई. अनिल पुसदकर भैया, बी.एस. पावला, अविनाश वाचस्पति ,डॉ.सत्यजित साहू. अलबेला खत्री, आचार्य रूपचंद शास्त्री, निर्मला कपिला , संगीता पूरी , कुसुम ठाकुर, श्रीमती आशा जोगलेकर, अल्पना देशपांडे, बबली, लवली कुमारी,पी.सी. गोदियाल , संजीव तिवारी, शरद कोकास, दिनेश राय दिवेदी ,गिरिजेश राव, गिरीश पंकज, राजकुमार ग्वालानी, जी.के अवधिया, खुशदीप सहगल, राजीव तनेजा, पंकज मिश्रा, राज भाटिया. ज्ञान दत्त पांडेय, चिटठा चर्चा, हिन्दी चिटठा चर्चा. अजयकुमार झा, एम् वर्मा, परम जीत बाली, श्यामल सुमन, महेंद्र मिश्रा  शिवम् मिश्रा सदा अदृश्य रहें वाले टिप्पू चाचा, मुरारी पारीक, रतन सिंग शेखावत जी, ताऊ जी लट्ठ वाले,हाँ रवि रतलामी भी आये थे एक बार मेरे छत्तीसगढ़ी ब्लॉग पर, सूर्यकांत गुप्ता, बाल कृष्ण अय्यर, सुनील कौशल, विवेक रस्तोगी, रवि  कुमार रावतभाठा, दीपक तिरुवा महफूज अली यदि किसी और भी जाने अनजाने सहयोगी का नाम भूल वश छुट गया हो तो, क्षमा करेंगे. हाँ एक बात मैं अवश्य ही कहना चाहूँगा कि संजीव तिवारी जी ने मुझे बहुत ही तकनीकी सहयोग किया और मेंरा संबल बढाया, उसे मैं जीवन में कभी भुला नहीं सकता. साथ ही चिटठा जगत, ब्लॉग वाणी, ब्लॉग प्रहरी, रफतार, ई डिग, हिन्दी ब्लॉग, ब्लोगिस्तान, एवं अन्य सभी ब्लॉग एग्रीगेटरों को भी धन्यवाद देता हूँ. जो मेरे इस सफ़र के साथी बने. इस तरह ब्लॉग जगत पर मेरा ग्यारह माह का सफ़र अवसान पर है. इस सौवीं पोस्ट तक कितने पाठक आये और कितनी टिप्पणियाँ मिली. इससे मुझे कोई वास्ता नहीं है. मैं तो योगी भाव से लिखता हूं, सफ़र में कभी ऐसा भी होता है कि हमारे साथ कोई सहयात्री है और उससे हमारी सफ़र के अंत तक बात नहीं हो पाती, कई सहयात्री ऐसे मिलते हैं. जिनसे पहले घंटे में ही बात हो शुरू हो जाती है और जीवन पर्यंत प्रगाढ़ मित्रता बनी रहती है और हम एक दुसरे के सुख दुःख में शामिल रहते हैं. जब आभासी दुनिया से निकलकर वास्तविक दुनिया में आपस में मिलते हैं तो यह नही लगता की किसी नये आदमी से मिल रहे हैं, ऐसा लगता है की वर्षों पुराने मित्र से मिल रहे हैं. इस अजब गजब दुनिया में मैंने बहुत कुछ पाया, इस अवधि में आभासी दुनिया से मैंने बहुत कुछ सीखा है. साहिर लुधियानवी का एक शेर इस वक़्त मुझे याद आ रहा है:-
"दुनिया ने तजुर्बातो हवादिश की शक्ल में 
जो  कुछ  मुझे  दिया  वो  लौटा   रहा हूं मैं" 

आप सभी के स्नेह एवं आशीष की आकांक्षा के साथ 
आपका 
शिल्पकार 


मंगलवार, 17 नवंबर 2009

कहे कवि सुनो तब नानी याद आ जाये

जब  भंग  सर चढ़ जाये होते उलटे काम
श्यामलाल  के  घर में घुसे होलिया राम
घुसे  होलिया  राम  जमकर हुयी पिटाई 
सर  भी  फुट  गया और टांगे भी तुडवाई 
कहे  कवि  सुनो  तब नानी याद आ जाये
टूटे फूटे पंहुचे घर जब भंग सर चढ़ जाये

आपका 
शिल्पकार
   

सोमवार, 16 नवंबर 2009

"एक बार फिर"-निर्मला पुत्तुल

आज "एक बार फिर" से आदिवासी कवियत्री निर्मला पुत्तुल जी की एक कविता पेश कर रहा हूँ, जो इन्होने "अंतर राष्ट्रीय महिला दिवस का आमंत्रण" पाकर लिखी थी.

"एक बार फिर"
हम इकट्ठे होंगे 
विशाल सभागार में
किराये की भीड़ के बीच 
एक बार फिर
ऊँची नाक वाली 
अधकटे ब्लोउज पहनी महिलाएं
करेंगी हमारे जुलुस का नेतृत्त्व 
और प्रतिनिधित्व के नाम पर
मंचासीन होंगी सामने
एक बार फिर 
किसी विशाल बैनर के तले
मंच से खड़ी माइक पर वे चीखेंगी
व्यवस्था के विरुद्ध 
और हमारी तालियाँ बटोरते
हाथ उठा कर देंगी साथ होने का भरम


एक बार फिर
शब्दों के उड़न खटोले पर बिठा
वे ले जाएँगी हमे संसद के गलियारों में
जहाँ पुरुषों के अहम से टकरायेंगे हमारे मुद्दे
और चकनाचूर हो जायेंगे 
उसमे निहित हमारे सपने


एक बार फिर
हमारी सभा को सम्बोधित करेंगे 
माननीय मुख्यमंत्री
और हम गौरवान्वित होंगे हम पर 
अपनी सभा में उनकी उपस्थिति से
 एक बार फिर
बहस की तेज आंच पर पकेंगे नपुंसक विचार
और लिए जायेंगे दहेज़-हत्या, बलात्कार, यौन उत्पीडन
वेश्या वृत्ति के विरुद्ध मोर्चाबंदी कर
लड़ने के कई-कई संकल्प


एक बार फिर
अपनी ताकत का सामूहिक प्रदर्शन करते
हम गुजरेंगे शहर की गालियों से
पुरुष सत्ता के खिलाफ 
हवा में मुट्ठी बांधे  हाथ लहराते 
और हमारे उत्तेजक नारों की ऊष्मा से
गरम हो जायेगी शहर की हवा


एक बार फिर 
सड़क के किनारे खडे मनचले सकेंगे अपनी ऑंखें
और रोमांचित होकर बतियाएंगे आपस में कि
यार शहर में बसंत उतर आया है


एक बार फिर
जहाँ शहर के व्यस्ततम चौराहे पर
इकट्ठे होकर हम लगायेंगे उत्तेजक नारे 
वहीं दीवारों पर चिपके पोस्टरों में
ब्रा पेंटी वाली सिने तारिकाएँ
बेशर्मी से नायक की बांहों में झूलती
दिखाएंगी हमें ठेंगा
धीर-धीरे ठंडी पड़ जायेगी भीतर की आग
और एक बार फिर 
छितरा जायेंगे हम चौराहे से
अपने-अपने पति और बच्चों के 
दफ्तर व स्कुल से लौट आने की चिंता में 


आपका 
शिल्पकार



(कथादेश से साभार)







   

रविवार, 15 नवंबर 2009

उतनी दूर मत ब्याहना बाबा! -निर्मला पुतुल

अभी तक शिल्पकार पर आपने मेरी कवितायेँ पढ़ी आज आपके लिए एक मेरी प्रिय कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ जो मेरी नहीं है, इसकी रचयिता "निर्मला पुत्तुल" हैं एक आदिवासी अंचल की कवियत्री जो दिल से कहते हैं. इस कविता को जब-जब पड़ता हूँ तो मेरा गला रुंध जाता है और आँखों में आंसू आ जाते है जिसके बाद छपे हुए शब्द दिखाई देना बंद हो जाते हैं. पता नहीं कैसे मैंने अपने आपको इस कविता के साथ जोड़ लिया. ऐसे लगता है मेरी बेटी स्वयं मेरे सम्मुख खडे होकर मुझे कह रही है, यह कविता कथादेश के मई २००४ के अंक में प्रकाशित है, यह कविता कथादेश से साभार आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ.

बाबा!
मुझे उतनी दूर मत ब्याहना
जहाँ मुझसे मिलने जाने खातिर
घर की बकरियां बेचनी पड़े तुम्हे


मत ब्याहना  उस देश में
जहाँ आदमी से ज्यादा 
ईश्वर बसते हों


जंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहाँ
वहां मत कर आना मेरा लगन 

वहां तो कतई नही
जहाँ की सड़कों पर
मान से भी ज्यादा तेज दौड़ती हों मोटर गाडियां
ऊंचे ऊंचे मकान 
और दुकान हों बड़े बड़े


उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता
जिस घर में बड़ा सा खुला आंगन न हो
मुर्गे की बांग पर जहाँ होती ना हो सुबह
और शाम पिछवाडे से जहाँ 
पहाडी पर डूबता सूरज ना दिखे.

 मत चुनना ऐसा वर 
जो पोचाई और हंडिया में 
डूबा रहता हो अक्सर 


काहिल निक्कम्मा हो 
माहिर हो मेले से लड़कियां उड़ा ले जाने में
ऐसा वर मत चुनना मेरी खातिर


कोई थारी लोटा तो नहीं 
कि बाद में जब चाहूंगी बदल लुंगी
अच्छा-ख़राब होने पर


जो बात-बात में 
बात करे लाठी डंडा की
 निकाले तीर-धनुष कुल्हाडी
जब चाहे चला जाये बंगाल,आसाम, कश्मीर 


ऐसा वर नहीं चाहिए मुझे
और उसके हाथ में मत देना मेरा हाथ
जिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाये 
फसलें नहीं उगाई जिन हाथों ने
जिन हाथों ने नहीं दिया कभी किसी का साथ
किसी का बोझ नही उठाया


और तो और
जो हाथ लिखना नहीं जानता हो "ह" से हाथ
उसके हाथ में मत देना कभी मेरा हाथ


ब्याहना तो वहां ब्याहना 
जहाँ सुबह जाकर 
शाम को लौट सको पैदल


मैं कभी दुःख में रोऊँ इस घाट 
तो उस घाट नदी में स्नान करते तुम 
सुनकर आ सको मेरा करुण विलाप.....

महुआ का लट और
खजूर का गुड बनाकर भेज सकूँ सन्देश 
तुम्हारी खातिर
उधर से आते-जाते किसी के हाथ
भेज सकूँ कद्दू,-कोहडा, खेखसा, बरबट्टी,
समय-समय पर गोगो के लिए भी


मेला हाट जाते-जाते
मिल सके कोई अपना जो
बता सके घर-गांव का हाल-चल 
चितकबरी गैया के ब्याने की खबर
दे सके जो कोई उधर से गुजरते
ऐसी जगह में ब्याहना मुझे


उस देश ब्याहना 
जहाँ ईश्वर कम आदमी ज्यादा रहते हों
बकरी और शेर 
एक घाट पर पानी पीते हों जहाँ
वहीं ब्याहना मुझे!

उसी के संग ब्याहना जो
कबूतर के जोड और पंडुक पक्षी की तरह
रहे हरदम साथ
घर-बाहर खेतों में काम करने से लेकर
रात सुख-दुःख बाँटने तक 


चुनना वर ऐसा
जो बजता हों बांसुरी सुरीली
और ढोल मांदर बजाने में हो पारंगत 


बसंत के दिनों में ला सके जो रोज
मेरे जुड़े की खातिर पलाश के फुल


जिससे खाया नहीं जाये 
मेरे भूखे रहने पर 
उसी से ब्याहना मुझे.


आपका 
शिल्पकार



शनिवार, 14 नवंबर 2009

उठ जा बाबु आंखी खोल

आज बालदिवस पर 36  गढ़ी भाषा में लिखी अपनी एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूं, और साथ ही साथ इसमें प्रयुक्त कुछ विशेष शब्दों  के अर्थ भी दे रहा हूँ.

उठ  जा  बाबु आंखी खोल 
होगे बिहनिया हल्ला बोल 

फूसमुंहा   तैं   बासी  खाबे 
थारी  धर  के  स्कूल  जाबे
स्कुल  जा  के  पट्टी  फोर
अऊ पेन्सिल ला कसके घोर 

मास्टर  ला  तैं  गारी  देबे
चाक चोरा के खीसा  भरबे
सरकारी पुस्तक ला तैं चीर
बांटी  खेलबे  त  बनबे बीर

पढ़े  के  बेरा  पेट  पिराही 
दांतों  पिराही  मुडो पिराही
भात  खा  के  दुक्की भाग
मनटोरा  के चोरा ले साग

समारू   घर के आमा तोर
देखिस  तेखर  आंखी फोर
बरातू ब्यारा के राचर छोर
ढील  दे  गरुआ  होगे भोर

दाई  ददा  के मूड ला फोर
डोकरा बबा के धोती छोर
डोकरी  दाई  के चश्मा हेर
खई  लेय  बर  ओला  घेर

इही बूता मा तरक्की करबे
बहुत  बड़े  तैं साहब बनाबे
बाबु  आघू-आघू  बढे चल
तैं  चेत  लगा  के  पढ़े चल 
आपका 
शिल्पकार 



शब्दार्थ 
बाबु=बच्चा 
आंखी=आँख 
बिहनिया=सुबह
फूस मुंहा=बिना मंजन करे
बासी=३६ गढ़ का भोजन जिसमे चावल को
रात भर पानी में डूबा कर सुबह खाते हैं.
थारी=थाली 
धर के=ले कर
जाबे=जायेगा 
पट्टी=स्लेट 
फोर= फोड़ 
खीसा=जेब
चोराके =चोरी करके
बांटी= कंचे
बनबे =बनेगा 
बेरा=समय
पिराही=दुखेगा, दर्द करेगा
मुडो= सर भी
दुक्की= दो नंबर
टोर=तोड़ 
देखिस=देखना
ब्यारा=खलिहान
राचर=खलिहान का दरवाजा
ढील दे=छोड़ दे
गरुवा=पशु ,मवेशी
दाई-ददा= माँ बाप
डोकरा बबा=दादा
छोर=खोलना
डोकरी दाई=दादी
हेर=निकाल 
खई=बच्चों के खाने की चीजें
बुता=काम
तरकी- तरक्की
करबे=करेगा
बनबे=बनेगा
आघू= आगे
चेत=ध्यान


शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

कहाँ ढूंढें वो आँखों का पानी

कहाँ   ढूंढें  वो  आँखों  का पानी 
कहाँ   ढूंढे   वो    खोई  कहानी 
कहाँ  ढूंढें   वो   चाल  मस्तानी
कहाँ  ढूंढें  वो लहरों की  रवानी

दाल  रोटी की चल  रही है जंग 
मर्यादाएं  नित  हो रही है भंग
रहने  को  हो  रही है जगह तंग
आश्वासनों   के  बज  रहे मृदंग

हकीम साहब का दवाखाना बंद 
सांसों  की  गति  चल  रही  मंद
पेट  पर  लगा  दिये  कई पैबंद 
कहाँ   ढूंढें  अब   हम   मकरंद 

आपका 
शिल्पकार

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

ये चमन, चमन कैसे रहेगा? जब माली ही शैतान हुआ है!!!

फिर यादों के सुमन खिले
सपनों  का  खुला  आगार
मेरा   मन  विकल हुआ है
अब  तुम  आओ  एक बार


पास  नहीं  हो  दूर  हो तुम
मैं  कैसे पास आऊं तुम्हारे 
आज  बहारों  घेर लिया था
पुराने  जख्म  हरे  हुए सारे


आज  बसंत आया है दुवारे 
मन में एक कसक है प्यारे
बसंत  पुरवाई  बन के   लू 
झुलसा  रही  है जख्म सारे


तुम्हारे  बिन वीरान हुआ है
जाने  जैसे सुनसान हुआ है
ये चमन, चमन  कैसे रहेगा 
जब माली ही शैतान हुआ है

फिर  भी लिए आस बैठा हूँ 
कोई चुपके से आज आएगा
भर  कर  झोली  में खुशियाँ
मुझ    पर   खूब   लुटायेगा

आपका 
शिल्पकार

 

बुधवार, 11 नवंबर 2009

आज चांदनी बलखाई-बौराई थी तरुणाई

सरसों  ने  ली अंगडाई गेंहूँ की बाली डोली
सरजू ने ऑंखें खोली महुए ने खुशबु घोली


अमिया पर यौवन छाया जुवार भी गदराया
सदा सुहागन के संग गेंदा भी इतराया
जब रजनी ने फैलाई झोली 
गेंहूँ की बाली डोली


रात-रानी के संग गुलमोहर भी ललियाया
देख महुए की तरुणाई पलास भी हरषाया
जब कोयल ने तान खोली
गेंहूँ की बाली डोली


बूढे पीपल को भी अपना आया याद जमाना
ले सारंगी उसने भी छेडा मधुर तराना
जब खूब जमी थी टोली
गेंहूँ की बाली डोली


गज़ब कहर बरपा था महुए के मद का भाई
आज चांदनी बलखाई बौराई थी तरुणाई
खुशियों की भर गई झोली
गेंहूँ की बाली डोली


आपका 
शिल्पकार

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

आशा का दीप जला गए जाते-जाते- प्रभाष जी को विनम्र श्रद्धांजली

एक  आशा  का दीप जला गए जाते-जाते
सोए  हुए  थे  लोग  जगा  गए जाते-जाते


दबे  हुए  अरमानों के बीहड़  अन्धकार में
किरण  आशा  की  दिखा  गए जाते-जाते


रहनुमा होने का भरम देते थे  लोग हमेशा
उनकी  असलियत  दिखा  गए जाते-जाते


जिन  दुखियों के आंसू पोंछने कोई ना था
वो   उनको  अपना  बना  गए जाते-जाते


जिनकी पेशानी पे थी चिंता की गहरी लकीरें
होठों पे उनके तब्बसुम बसा  गए जाते-जाते


जहाँ  जख्मो से  भरी मानवता कराहती थी
कारसाज  थे  मरहम  लगा  गए जाते-जाते


आपका
शिल्पकार

सोमवार, 9 नवंबर 2009

माटी की ही क्यों ना हो, आख़िर रोटी ही थी

ईंट के भट्ठे पर
वह चितकबरे
पेबंद में लिपटी
ढो रही थी
इंटों का बोझा
खा रही थी
मिटटी से सनी रोटियाँ
कंकरों के साग के साथ
जब से ब्याही 
चिमनी के धुंए से
दुनिया सिमट गई उसकी
धूल से सनी वो
एक्टरनी सी लगती
बेलदार की घुरती निगाहें
चीर जाती चीर को
वह मजदूरों की
दर्द भरी कहानी का
सच्चा पात्र निभा रही हो जैसे
हकीकत कोसों दूर
फंस चुकी थी
माया के जाल में
खनकते सिक्के की चाल में
रोटी की खातिर
चाहे वो माटी की ही क्यों ना हो
आख़िर रोटी ही थी

आपका
शिल्पकार 

(फोटो गूगल से साभार)

रविवार, 8 नवंबर 2009

इक चोर आया,मैं ओत्थे थैली छोड़ आया

ओ मैं निकला थैली ले के 
ओ रस्ते पर,ओ सडक में
इक चोर आया,मैं ओत्थे थैली छोड़ आया
रब जाणे, कब गुजरा,तब सरकस
कब बाजार आया ,
इक चोर आया, मै ओत्थे थैली छोड़ आया
उस मोड़ पर मुझको चोर मिला
मैं घबरा कर सब कुछ भूल गया
उसके चाकू की धार देख 
मैं डर कर चक्कर खा गया
होश आया मैं भागा
सब आलू, सब बैंगन, मै छोड़ आया
मैं ओत्थे थैली छोड़ आया
बस एक किलो करेला ख़रीदा 
लौकी भी मुझको हरी लगी
क्या खूब थी मिर्ची रब जाणे 
मुझको बड़ी ही खरी लगी 
मैंने देखा करोंदा चिकना
संग उसके हरा मखना , मैं छोड़ आया
मैं ओत्थे थैली छोड़ आया
घबराकर मैं यूँ  सूख  गया 
जैसे पालक सूख गई 
छत्ते की ओट में छिपे-छिपे
जैसे जान ही मेरी निकल गयी
वो समझा, आज उसने, थैली में
माल जोर पाया-मैं ओत्थे थैली छोड़ आया
इक चोर आया,मैं ओत्थे थैली छोड़ आया

आपका 

शिल्पकार 


शनिवार, 7 नवंबर 2009

देखो जी श्याम लगाओ ना निशाना

देखो जी श्याम लगाओ ना निशाना
देखो  सर्दी  बहुत है हमें ना भीगाना 

जाने दो जाने दो हमें जाना बच के
मार ना देना पिचकारी चल चल के डगर पे
भीग जाउंगी रंग से बचाना ओ बचाना

देखो जी श्याम लगाओ ना निशाना
देखो  सर्दी  बहुत है हमें ना भीगना

कर देंगे बंद तुम्हारा राहों पे चलना
तुम सोच समझकर जरा हम पे मचलना
चुराया जो माखन छुपाना ना छुपाना

देखो जी श्याम लगाओ ना निशाना
देखो  सर्दी  बहुत है हमें ना भीगना

चुराया जो माखन खाएं तो  कहाँ खाएं
आना तो फिर यहीं है जाएँ तो कहाँ जाएँ
छोड़ दो हमको सताना ना सताना

देखो जी श्याम लगाओ ना निशाना 
देखो  सर्दी  बहुत है हमें ना भीगना

बता देंगे माँ को जरा तू सुधर जा 
खूब होगी पिटाई तू चुपके से निकलजा
राधा को प्यारे बनाओ ना दीवाना 

देखो जी श्याम लगाओ ना निशाना 
देखो  सर्दी  बहुत है हमें ना भीगना

आपका 
शिल्पकार



शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

मेरे थिरक उठे हैं पांव..............



हरियाली  के चादर ओढे, देखो मेरा  सारा गांव ,
झूमके बरसी बरखा रानी,मेरे थिरक उठे हैं पांव,
मेरे  थिरक  उठे हैं पांव..............................


खेतों में है हल चल रहे, बूढे पीपल पर हरियाली,
अल्हड  बालाओं  ने भी,  डाली पींगे सावन वाली,
गोरैया  के  संग-संग  मै  भी,  अपने  पर फैलाऊ,
मेरे थिरक उठे हैं पांव.................................


छानी  पर  फूलों  की  बेले, बेलों पर  बेले ही बेले,
नवयोवना सरिता पर भी हैं,लहरों के रेले ही रेले,
हमको  है  ये  पार कराती, एक  मांझी  की नाव,
मेरे थिरक उठे हैं पांव..............................


भरे  हैं  सब ताल-तलैया,झूमी है अब धरती मैया,
मेघों ने भी डाला डेरा, छुप गए हैं अब सूरज भैया,
गाय-बैल  सब  घूम-घाम  कर, बैठे   अपनी  ठांव,
मेरे  थिरक  उठे  हैं  पांव................................






आपका
शिल्पकार

( चित्र गूगल से साभार)

गुरुवार, 5 नवंबर 2009

रात चाँद की कोशिशें नाकाम हुई

सूना-सूना सा लगता है तेरे बिना 
दिन पहाड़ सा लगता है तेरे बिना
कड़कती है बिजलियाँ बड़ी जोर से
बड़ा  डर  लगता  है मुझे तेरे बिना


रात   काली   भयानक  हो  जाती है
घर-घर  सा  नहीं लगता  तेरे  बिना
बिस्तर पर रेंगती है हजारों चीटियाँ
खा  जाएँगी मुझे लगता है तेरे बिना


मेरा  सूरज  तो  अब  उगता ही नहीं
उजियारा  नही  लगता  है  तेरे बिना
रात  चाँद  की  कोशिशें  नाकाम हुई
अमावश  सा  अंधियार  है  तेरे बिना

आपका 
शिल्पकार

बुधवार, 4 नवंबर 2009

अपना दर्द आंसुओं में निचोती रही कविता

कई  बरसों  से किताबो में सोई रही कविता
अपना दर्द आंसुओं में निचोती  रही कविता
आंसू   लहू  से  कागज  पर  नित  झरते रहे
दर्द  को  दिल  में  ही  संजोती  रही  कविता

 तुम्हारे  आंसू  की  हर  एक  बूंद  सरिता  है
तुम्हारा   कहा   हर   शब्द   मेरी   गीता  है
सोचता   हूँ   तुम्हे  गीतों  में  ढालूँगा  कभी
तुम्हारी  साँस का  हर स्वर मेरी कविता है

सावन का  आज पहला दिन  पहली बरसात हुयी 
तन-भीगा, मन भीगा मेह  वर्षा  की शुरुवात हुयी
फिर  भी  ना  छलका  तुम्हारे   स्नेह   का सागर 
सारी  धरती  भीग गयी यूँ झमाझम बरसात हुयी 


आपका
शिल्पकार

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

फूलों का दर्द आंसुओं से नीचो कर इत्र बनता है.

कभी -कभी रंगों से खेलने का मन करता है. जब रंग-तुलिका और केनवास का मिलन होता है तो अन्दर बैठ चित्रकार जाग जाता है. और वह कुछ गढ़ने लगता है. ऐसा मेरे साथ होता है. जब तक मैं कुछ गढ़ नही लूँ तब तक मुझे आत्मिक शांति नहीं मिलती. सारा शरीर भारी-भारी लगता है.-जब कल्पना केनवास पर उतर जाती है तो अपने आप ही मुझे हल्का लगता है.एक  आत्मिक शांति का अनुभव होता है-एक चित्र आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत है-कृपया आशीष देकर उत्साह बढाये.

 फूलों  का  दर्द  आंसुओं से नीचो कर इत्र बनता है.
लाखों  में  कोई  एक हमदर्द अपना मित्र बनता है.
ग़ालिब की गजल मीरा का विरह रंगों में घोलकर 
कतरा  कतरा   रंगों  से  कोई  एक चित्र बनता है.

आपका 
शिल्पकार 


सोमवार, 2 नवंबर 2009

पृथ्वी गोल घुमती है, ठीक मेरे जीवन की तरह!!!

पृथ्वी गोल घुमती है
ठीक मेरे जीवन की तरह
पृथ्वी की दो धुरियाँ हैं
उत्तर और दक्षिण
मेरी भी दो धुरियाँ हैं
माँ और पत्नी
मै इनके बीच में ही
घूमता रहता हूँ
माँ कहती है,
आँगन में आकर बैठ 
खुली हवा में
पत्नी कहती है 
अन्दर बैठो 
बाहर धुल मच्छर हैं
माँ कहती है
तू कमाने बाहर मत जा
मेरी आँखों के सामने रह
थोड़े में ही गुजारा कर लेंगे
पत्नी कहती है 
घर पर मत रहो
बाहर जाओ
घर में रह के 
सठियाते जा रहे हो
बच्चों के लिए कुछ 
कमा कर जमा करना है
माँ कहती है धीरे चले कर
चोट लग जायेगी
पत्नी कहती है
जल्दी चलो 
अभी मंजिल दूर है
धीरे चलोगे तो 
कब पहुंचोगे वहां पर 
माँ कहती है 
बुजुर्गों में बैठे कर 
कुछ ज्ञान मिलेगा
पत्नी कहती है
बूढों में बैठोगे तो 
तुम्हारा दिमाग सड़ जायेगा 
इन बातों के बीच
एक तीसरी आ जाती है
बेटी भी कूद कर धम्म से 
मेरी पीठ पर चढ़ जाती है
तब कहीं जाकर
मेरा संतुलन बनता है
वह भी कहती है/पापा
क्या मेरा वजन उठा सकते हो
मैं कहता हूँ 
हाँ! बेटी क्यों नहीं?
इन दो धुरियों के बीच 
फ़ुट बाल बनने के बाद
आज तेरे आने से मेरे जीवन में
कुछ स्थिरता बनी है
इन दो धुरियों के बीच 
एक पूल का निर्माण हुआ है
मैं तो तुम तीनो की 
आज्ञा की अवज्ञा नहीं कर सकता
क्योकि  तुम तीनो हो मेरी
जनक-नियंता और विधायिका 

आपका
शिल्पकार


रविवार, 1 नवंबर 2009

श्रुति पूछती है!!!!

जब कारगिल का युद्ध चल रहा था उस समय मेरी बेटी साढ़े तीन साल की थी, टी.वी. पर समाचार देखती थी और मुझसे तरह- तरह के सवाल पूछती थी मै उसके हर सवाल का जवाब देने की कोशिश करता था. एक दिन उसने ऐसे सवाल किये जिसका जवाब मेरे पास नही था.आप भी सुनिए

श्रुति पूछती है
पापा हाथ धो लूँ?
भात खा लूँ ?
मेरा बस्ता कहाँ है?
 मम्मी मैं पढूंगी
अ-अनार, ऍ-एप्पल 
वह पढ़ती है
फिर वह पूछती है
पापा ये युद्ध
क्या होता है?
मैं उसे बताता हूँ 
पापा ये एल.ओ.सी.
क्या होती है?
मैं उस अबोध को
बताता हूँ 
पापा ये कारगिल 
क्या होता है?
मैं उसे भूगोल
समझाता हूँ 
फिर पूछती है
पापा शहीद 
क्या होता है?
मैं समझाता हूँ
भगवान होता है.
फिर वह पूछती है
पापा आप 
भगवान नही हो सकते?
सुन कर मै 
सकते में आ जाता हूँ
मौन हो जाता हूँ 
मेरी आँखे
डबडबा जाती हैं
वह बार-बार पूछती है
निरंतर/अनवरत
मैं निरुत्तर था 
सोच रहा था 
कितना कठिन है?
भगवान बनना


आपका 
शिल्पकार