उस शाम
बढ़ चले थे
मेरे कदम
अज्ञात पथ की ओर
दिशा हीन मैं
तुमने कहा
मत जाओ
बहुत कांटे है इस राह पर
लेकिन प्रिये
कैसे भूल जाऊँ?
उन ह्रदय भेदी शब्दों को
कैसे भूल जाऊँ?
उस दासता को
कैसे भूल जाऊँ?
उस कबीले के
कानून को
जिसका पालन करना ही
मेरी विरासत हैं
कैसे भूल जाऊँ?
उस कर्कश वाणी को
जिसने जिस्म चीर
हृदय छलनी किया है
मै वो परकटा पंछी
उस डाल पर बैठा
जिसके एक तरफ कुँआ
एक तरफ खाई है
कदम आगे बढाऊ तो मरा
पीछे हटाया तो मरा
काश! ये धरती ही फट जाती
उसमे समां जाती
सीता की तरह
जहाँ फिर ना कोई
अग्नि परीक्षा होती
बढ़ जाती उस अंतहीन
पथ की ओर
जहाँ सिर्फ मै होती
और सिर्फ मै होती
आपका
शिल्पकार
(फोटो गूगल से साभार)



