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गुगल बाबा

इंडी ब्लागर

 

जहाँ फिर ना कोई अग्नि परीक्षा होती


उस शाम 
बढ़ चले थे 
मेरे कदम 
अज्ञात पथ की ओर
दिशा हीन मैं 
तुमने कहा 
मत जाओ 
बहुत कांटे है इस राह पर
लेकिन  प्रिये 
कैसे भूल जाऊँ?
उन ह्रदय भेदी शब्दों को
कैसे भूल जाऊँ?
उस दासता को 
कैसे भूल जाऊँ?
उस कबीले के 
कानून को 
जिसका पालन करना ही
मेरी विरासत हैं
कैसे भूल जाऊँ?
उस कर्कश वाणी को
जिसने जिस्म चीर 
हृदय छलनी किया है
मै वो परकटा पंछी 
उस डाल पर बैठा
जिसके एक तरफ कुँआ 
एक तरफ खाई है
कदम आगे बढाऊ तो मरा 
पीछे हटाया तो मरा 
काश! ये धरती ही फट जाती 
उसमे समां जाती 
सीता की तरह 
जहाँ फिर ना कोई 
अग्नि परीक्षा होती 
बढ़ जाती उस अंतहीन 
पथ की ओर 
जहाँ सिर्फ मै होती
और सिर्फ मै होती 

आपका 
शिल्पकार 
(फोटो गूगल से साभार)



इस नश्वर लोक में तू भी अमर हो जायेगी



इस बहती नदी को 
इसके दोनों किनारों को 
बरसों से देखता आ रहा हूँ
इनके अथाह प्रेम का 
एक मूक दर्शक मैं भी हूँ
इनकी मुहब्बत 
सदियों से प्रेरणा रही है
बनजारों के लिए 
कभी कभी 
मैं नदी से कहता हूँ
तू क्या सूख नहीं सकती
सदियों से दो दिलों को 
मिला नहीं सकती 
तू कितनी बेदर्द है
इनकी आहें लेकर 
अपना अस्तित्व देखती है
तेरा ये कैसा बैर है इनसे
जो सदियों-शहस्त्राब्दियों से
चला आ रहा है
ये भी बड़े ढीठ प्रेमी है 
जो तुझे भी नहीं छोड़ते हैं 
तू ये क्यों भूल जाती है
किनारे हैं तभी तो 
तेरा अस्तित्व है
ये सिर्फ तेरे लिए जीते हैं
कितना महान व्यक्तित्व है
इनको मिला दे तू 
किस्से कहानियों में 
ढाली जायेगी
जब तक दुनिया है
ये तेरे ही गीत जायेगी
इस नश्वर लोक में
तू भी अमर हो जायेगी 

आपका 
शिल्पकार
फोटो गूगल से साभार

छोडो इतिहास का बोझा,पथ नवीन अपनाओ अब तुम अपने हाथो से ,इतिहास नया रचाओ




यह कविता मैंने काफी वर्षों पहले कारगिल युद्घ के समय लिखी थी,
आज पुरानी डायरी हाथ में आ गयी तो सोचा की आपको भी पढ़वा दूँ

छोडो इतिहास  का बोझा,पथ नवीन अपनाओ
अब तुम अपने हाथो से ,इतिहास नया रचाओ 

नव युग का आह्वान करो,अब तुम्हारी बारी है,
हो जाओ तैयार रणबीरों,अब तुम्हारी बारी है 
कदम आगे  बढाकर  तुम नव अश्वमेघ रचाओ 


छोडो इतिहास  का बोझा,पथ नवीन अपनाओ
अब तुम अपने हाथो से ,इतिहास नया रचाओ 


तेज करो शमशीरों को,तुफानो से मत घबराओ,
बाधाओं से लड़ जाओ,लान्घो ऊँची दीवारों को 
घनघोर युद्ध रचाओ ऐसे, नाम अमर कर जाओ


छोडो इतिहास  का बोझा,पथ नवीन अपनाओ
अब तुम अपने हाथो से ,इतिहास नया रचाओ 


भीष्म प्रतिज्ञा बिना कही,रास्ट्र कल्याण होगा 
नवीन सूर्य  उदित होगा, जब शर संधान होगा
लक्ष्य तुम  ही पाओगे, बसंती  चोला अपनाओ


छोडो इतिहास  का बोझा,पथ नवीन अपनाओ
अब तुम अपने हाथो से ,इतिहास नया रचाओ 


आपका  

शिल्पकार 
फोटो गूगल से साभार





 

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