नव वधु सी
लजाती
सकुचाती आई
वह कविता
बिना टिप्पणी
बैरंग लिफ़ाफ़े सी
लौट आई
वह कविता
कुछ दिन बाद
कविता का स्वंयवर
रचा गया
कर माल लिए
रावण को वर आई
वह कविता
क्योंकि
भरी सभा मे
रावण ने धनुष
खंडित किया
अप्रीतम को
वर आई
वह कविता
आपका
शिल्पकार
कविता का स्वंयवर!!
आचार्य ललित मुनि, रविवार, 31 जनवरी 2010
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शिल्पकार
इसे अवश्य पढिए-अच्छे लोग किनारे हो गए!!!
आचार्य ललित मुनि, शुक्रवार, 29 जनवरी 2010कल रात की बात है, हम कुछ लिख रहे थे तभी चैट पर हमारे बड़े भाई गिरीश पंकज जी का आगमन हुआ और उन्होंने पूछ "फौजी भाई क्या हाल चाल है" हमने कहा नमस्ते भैया सब ठीक है. आनंद है. आज आप हिंदी में लिख रहे हैं. तो गिरीश भाई बोले" कट पेस्ट का जमाना है इस लिए कट पेस्ट कर रहा हूँ" हमने कहा चलिए अच्छी बात है....
कट गया फट गया खिस्को हो गया. अब इसका मोल भी डिस्को हो गया.
तो गिरीश भाई बोले ये तो कविता हो रही है तुकबंदी" अब मित्रों इस तुक बंदी का सिलसिला चल पड़ा आगे चल कर क्या बना? ज्यों का त्यों आपके सामने प्रस्तु कर रहा हूँ. इस गजल लेखन को गिरीश भाई ने मजमुआ गजल कहा. अब ये मजमुआ गजल आपके समक्ष पेश है. कृपया आपका आशीर्वाद चाहूँगा.
Girish: अच्छे लोग किनारे हो गए/ मंचो पर हत्यारे हो गए
ललित: काले पीले सारे हो गए/सच्चे सब बेचारे हो गए
Girish: लुच्चो का है राज यहाँ पर/ श्वेत सभी कजरारे हो गए.
ललित: मेहनत कश को रोटी नही, चमचों के चटखारे हो गए
Girish: काम यहाँ कुछ कैसे होगा/ खाली-पीली नारे हो गए
ललित: डंडा लेकर घुमने वाले/उनकी आंखो के तारे हो गए
Girish: जो कमजोर बहुत थे वे ही. सत्ता के सहारे हो गए.
शातिर खुल्ले घूम रहे है. हम अल्ला को प्यारे हो गए....
ललित:सच की राह पे चलने वाले / देखो अब बेसहारे हो गए
Girish: सत्ता पाकर दो कौड़ी भी/ आसमान के तारे हो गए
ललित: छाती पीट पीट के लगाते थे/ झुठे वे सब नारे हो गए
खुन बह रहा है गलियों मे/ नेता सब हत्यारे हो गए
अब इस तरह यह मजमुआ गजल तैयार हो गई, जैसे थी वैसी ही प्रस्तुत कर रहा हूँ. आखरी की दो पंक्तियाँ
Girish: जैसे जिन्दगी एक जुआ हो गयी.
ललित: वैसे ही ग़ज़ल मजमुआ हो गयी
ललित: वैसे ही ग़ज़ल मजमुआ हो गयी
आपका
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लाँघ पाऊँ बाधाओं को!!
आचार्य ललित मुनि, गुरुवार, 28 जनवरी 2010मरीचिका
मृगतृष्णा
अतृप्त चक्षु
अतृप्त आत्मा
मन चातक
व्याकुल अनवरत
जीवन दुर्भर
कांक्रीट की दीवारें
टूटती नहीं
बाधाएं लाँघ नहीं पाया
अग्नि ज्वालायें
धधकती सीने में
पुन: उर्जा
निर्मित करने
पुन: कोशिश करूँ
लाँघ पाऊँ बाधाओं को
तृप्ति तभी संभव है.
आपका
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