मंगलवार, 27 दिसम्बर 2011
मंगलवार, 6 दिसम्बर 2011
अब काव्य उमड़ता-घुमड़ता नहीं -- ललित शर्मा
एक अरसे से शिल्पकार ने कुछ काव्य रचा नहीं, पहले रोज एक पोस्ट आ ही जाती थी नित नेम से। शायद काव्य का सोता सूख गया। अब काव्य उमड़ता-घुमड़ता नहीं। पता नहीं क्यो अनायास हीं एक जीता जागता ब्लॉग मृतप्राय हो गया, जबकि यह मेरा पहला ब्लॉग है। शिल्पकार ब्लॉग जगत की गलियों भटकता रहा। कहते हैं न खरबूजे को देख कर खरबूजा रंग बदलता है ऐसा ही कुछ हुआ है। फ़ेसबुक की चार लाईनों ने एक गजल तैयार करने की लालसा जगा दी। बहुत सारे ब्लॉगर साथी फ़ेसबुक पर लगे हुए हैं, धड़ाधड़ महाराज की तरह वहीं पोस्ट हो रहा है। एक गजल नुमा प्रस्तुत कर रहा हूँ, ईटर-मीटर का तो पता नहीं। गुणी जन कृपा करेगें, उम्मीद है कि हफ़्ते में एकाध बार तो इस ब्लॉग पर काव्यमय पोस्ट लग जाएगी।
जीते जी कुछ करो तो बात बने। कोई महफ़िल सजाओ तो बात बने।। तुम्हारी महफ़िल में आना चाहते हैं। कोई नगमा सुनाओ तो बात बने॥ कतरा समंदर भी असर रखता है। प्यास मन की बुझाओ तो बात बने॥ गर्म हवाओं से झुलसा है मन मेरा। हवा प्यार की बहाओ तो बात बने।। मचलता रहा यह दिल तुम्हारे लिए। आकर सीने से लगाओ तो बात बने॥ तनहा खड़ा जिन्दगी के चौराहे पर । बस साथ मेरा निभाओ तो बात बने॥ |
आपका शिल्पकार
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