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कवि रामेश्वर शर्मा की एक कविता---अंधा

कवि रामेश्वर शर्मा की एक कविता

अंधा

एक अंधा
एक हाथ कटोरा
एक हाथ डंडा
भूख से धंसा पेट
कहता दे दाता
करता गुहार
वहां से गुजरता
हर व्यक्ति
अनदेखा बन
चल पड़ता है
अंधों की तरह
वाह रे!
अंधे की दुनिया
अंधे की सरकार
रोज गरीबी भूखमरी
अखबारों भाषणों से
दे रहे दुहाई
बैठा सिंहासन पर
लाज द्रौपदी की
लुटवा रहा है
कृष्ण को उलझा रहा है
कि यह कथन
कितना सच होगा
उस अंधे से
यह अंधा अच्छा होगा।

कवि रामेश्वर शर्मा
शिवनगर मार्ग
बढई पारा रायपुर (छ ग)
09302179153

देख क्रुरता फ़ूलों की हम दंग हो गये--एक गीत

कवि रामेश्वर शर्मा का एक गीत

देख क्रुरता फ़ूलों की हम दंग हो गये

जीवन है या जटिल समस्या तंग हो गये।
आदर्शों के रंग गिरगिट के रंग हो गये।

कपटी भावों में डूबे जग मुंह बोले संबंध हुये
विश्वासों के रुपक पछतावे भर के अनुबंध हुये
सच धोखे के व्यापारी के संग हो गये।

आशाओं का राग रंग तो भ्रम का खेल खिलौना है
संध्या की आशंकाओं में घिरा हुआ दोपहर बौना है
संयम नियम विवशताओं के अंग हो गये।

अपनी-अपनी लोलुपता में मधुमक्खी है लोग बने
परिभाषाओं के प्रपंच में अर्थ व्यर्थ का रोग बने
देख क्रुरता फ़ूलों की हम दंग हो गये।

रामेश्वर शर्मा
शिवनगर मार्ग बढई पारा
रायपुर (छ.ग.)
09302179153

 

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