स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
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स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
आचार्य ललित मुनि, रविवार, 15 अगस्त 2010
लेबल:
बधाई,
ललितशर्मा,
स्वतंत्रता दिवस
इस नश्वर लोक में तू भी अमर हो जायेगी
आचार्य ललित मुनि, शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009इस बहती नदी को
इसके दोनों किनारों को
बरसों से देखता आ रहा हूँ
इनके अथाह प्रेम का
एक मूक दर्शक मैं भी हूँ
इनकी मुहब्बत
सदियों से प्रेरणा रही है
बनजारों के लिए
कभी कभी
मैं नदी से कहता हूँ
तू क्या सूख नहीं सकती
सदियों से दो दिलों को
मिला नहीं सकती
तू कितनी बेदर्द है
इनकी आहें लेकर
अपना अस्तित्व देखती है
तेरा ये कैसा बैर है इनसे
जो सदियों-शहस्त्राब्दियों से
चला आ रहा है
ये भी बड़े ढीठ प्रेमी है
जो तुझे भी नहीं छोड़ते हैं
तू ये क्यों भूल जाती है
किनारे हैं तभी तो
तेरा अस्तित्व है
ये सिर्फ तेरे लिए जीते हैं
कितना महान व्यक्तित्व है
इनको मिला दे तू
किस्से कहानियों में
ढाली जायेगी
जब तक दुनिया है
ये तेरे ही गीत जायेगी
इस नश्वर लोक में
तू भी अमर हो जायेगी
आपका
शिल्पकार
फोटो गूगल से साभार
लेबल:
कविता,
ललितशर्मा,
शिल्पकार ललितशर्मा
छोडो इतिहास का बोझा,पथ नवीन अपनाओ अब तुम अपने हाथो से ,इतिहास नया रचाओ
आचार्य ललित मुनि, गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009यह कविता मैंने काफी वर्षों पहले कारगिल युद्घ के समय लिखी थी,
आज पुरानी डायरी हाथ में आ गयी तो सोचा की आपको भी पढ़वा दूँ
छोडो इतिहास का बोझा,पथ नवीन अपनाओ
अब तुम अपने हाथो से ,इतिहास नया रचाओ
नव युग का आह्वान करो,अब तुम्हारी बारी है,
हो जाओ तैयार रणबीरों,अब तुम्हारी बारी है
कदम आगे बढाकर तुम नव अश्वमेघ रचाओ
छोडो इतिहास का बोझा,पथ नवीन अपनाओ
अब तुम अपने हाथो से ,इतिहास नया रचाओ
तेज करो शमशीरों को,तुफानो से मत घबराओ,
बाधाओं से लड़ जाओ,लान्घो ऊँची दीवारों को
घनघोर युद्ध रचाओ ऐसे, नाम अमर कर जाओ
छोडो इतिहास का बोझा,पथ नवीन अपनाओ
अब तुम अपने हाथो से ,इतिहास नया रचाओ
भीष्म प्रतिज्ञा बिना कही,रास्ट्र कल्याण होगा
नवीन सूर्य उदित होगा, जब शर संधान होगा
लक्ष्य तुम ही पाओगे, बसंती चोला अपनाओ
छोडो इतिहास का बोझा,पथ नवीन अपनाओ
अब तुम अपने हाथो से ,इतिहास नया रचाओ
आपका
शिल्पकार
फोटो गूगल से साभार
खबरदार ! ये इश्क नही है
आचार्य ललित मुनि, बुधवार, 30 सितंबर 2009बारूद का एक ढेर है अपनी तबाही के लिए ,
मुफलिस-ऐ-मोह्हबत के तारीख-ऐ-निशां नही होते,
ये शगल तो है सिर्फ़ जिल्ले इलाही के लिए,
मै तडफता रहा वहां जाम-ऐ-महफ़िल सजती रही,
नए बुत तराशे जाते रहे तख्त-ऐ-शाही के लिए
मेरी मुमताज़ ताजमहल मै भी बनवा सकता था
कैसे किसे पेश करूँ अब तेरी गवाही के लिए,
इश्क के आगाज़ पर अंजाम न सोचा था "ललित"
वरना क्योंकर तैयार होता अपनी तबाही के लिए,
आपका
शिल्पकार,
(फोटो गूगल से साभार)
तेरे छलकते नैनों ने भरम तोड़ दिया
आचार्य ललित मुनि, मंगलवार, 29 सितंबर 2009एक निष्प्राण में
नए जीवन का
संचरण था
बुझते दीपक में
एक नई उर्जा का
अवतरण था
बरसों से जंग लगी
स्वझरनी की नींद खुली
वह कहने लगी
पहले से मुखर होकर
प्रखर होकर
कुछ अपने पन का
पारदर्शी अहसास
परिष्कृत कर गया मुझे
जनम गई इसके गर्भ से
कुछ कालजयी कृतियाँ
तेरे आने से
प्रेरणा की अदृश्य तरंगों ने
चेतना को झकझोर दिया
तेरे सामीप्य ने आकाश में
वासंती रंग भर दिए
वातावरण रात रानी की
महक से सराबोर था
काली नगीन मस्त होकर
झूम रही थी / सहसा
तेरे छलकते नैनों ने
भरम तोड़ दिया
देने से पहले
लेने वाले
तुम भी निकले
आपका
शिल्पकार
(फोटो गूगल से साभार)
फूलों से हो लो तुम,जीवन में सुंगध भर लो
आचार्य ललित मुनि, शुक्रवार, 25 सितंबर 2009फूलों से हो लो तुम,जीवन में सुंगध भर लो
महकाओ तन-मन सारा भावों को विमल कर लो
फूलों से हो लो तुम ........................................
वो मालिक सबका हैं ,जिस माली का हैं ये चमन
वो रहता सबमे हैं तुम ,कर लो उसी का मनन
हो जाये सुवासित जीवन ऐसा तो जातां कर लो
फूलों से हो लो तुम.......................................
शुभ कर्मों की पौध लगाओ जीवन के उपवन में
देखो प्रभु को सबमे वो रहता हैं कण-कण में
बन जाओ प्रभु के प्यारे ऐसा तो करम कर लो
फूलों से हो लो तुम......................................
मै कोन?कहाँ से आया ? कर लो इसका चिंतन
जग में रह कर के ,उस दाता से लगा लो लगन
रह कर के कीचड़ में खुद को कमल कर लो
फूलों से हो लो तुम.......................................
वो दाता सबका हैं, दुरजन हो या सूजन
वो पिता सबका हैं, धनवान हो या निरधन
ललित उसमे लगा करके जीवन को सफल कर लो
फूलों से हो लो तुम ........................................
आपका
शिल्पकार
(फोटो गूगल से साभार)
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