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खोया बचपन

कंचे,लट्टू,गुल्ली-डंडा,पुराना बक्सा खोल रहा हूँ।
खोया बचपन ढूंढ रहा हूँ,मैं बचपन ढूंढ रहा हूँ॥

राजा-रानी, परियों की, कहानी खूब सुनाती थी।
खोयी ममता ढूंढ रहा हूँ,मैं बचपन ढूंढ रहा हूँ॥

लड्डू-पेड़े,खाई-खजाना,मुझको खूब खिलाती थी।
तेरे आंचल की छाया में, मैं बचपन ढूंढ रहा हूँ।।

करता जब धमा-चौकड़ी,मार से तुम बचाती थी।
तुम्हारी यादों में घर कर,मैं बचपन ढूंढ रहा हूँ।।

कभी न करुंगा उधम, कान पकड़ बोल रहा हूँ।
खोया बचपन ढूंढ रहा हूँ, मैं बचपन ढूंढ रहा हूँ॥


शिल्पकार

हे माँ


हे माँ 
तू कितनी भोली हैं
तू कितनी चिंता करती हैं मेरी
मैं तुझे रोज कितना छलता हूँ
तुझसे कितना झूठा सच बोलता हूँ
सिर्फ कोरा झूठा सच
मैं सोचता हूँ
जो बातें तेरे से छिपाता हूँ
वह तू नहीं जानती
लेकिन माँ /तू तो माँ हैं
तू  सब कुछ जानती हैं
तू जननी हैं
तू मेरी झूठ में भी
मेरा भला चाहती हैं
माँ तू कितनी करुणामयी हैं
एक दम जगदम्बा की तरह
लेकिन माँ
तुझे दुःख ना हो इसलिए 
तेरे से मैं बातें छिपाता हूँ
अगर बता दूँ तो 
तू दिन भर व्याकुल रहती  हैं
सोचती रहती हैं 
मेरा बेटा मुसीबत में हैं 
उस दिन तुझसे  खाना भी नही खाया जाता
माँ तेरे जगाने से ही मैं उठता हूँ
तुझसे ही मैंने जाना दिन कैसे निकलता हैं
तू ही मेरा सूरज हैं
तेरी ममता के प्रकाश में 
मैं नित नए सोपानों पर चढ़ता हूं
भीषण अंधकार झंझावातों में 
तेरी ममता का प्रकाश ही मुझे राह दिखाता हैं
माँ तू सत्य हैं,
सूरज,चाँद,पृथ्वी,हवा पानी,प्रकृति की तरह
तेरा सामीप्य पाकर 
हृदय निर्मल हो जाता हैं,
तेरे ममतामयी आँचल की छाया में
मै सदा सुरक्षित हूँ
तू मेरा भगवान हैं,
तू ही मेरी सब कुछ हैं
मै तेरा पुत्र हूं
तेरी करुणा  ही मेरा संबल हैं
तेरा स्नेह ही मेरा जीवन हैं
तेरे बिना मै व्याकुल रहता हूँ माँ
तू ये मत सोचना की मै तुझसे दूर हूँ
तू हमेशा मेरी आँखों के सामने हैं माँ
मेरी माँ 
माँ 


आपका
पुत्र
चित्र ललित शर्मा

वह माँ के आंचल की छाया !!!!!!!

ओ!!! मेरे प्रियतम सजना
लौट के आ घर दूर नही
बात जोह रही राह है तेरी
आ जा अब तू जरुर यहीं
बालकपन का भोला बचपन
रह-रह याद दिलाता है
गांव पार का बुढा बरगद
तुझको रोज बुलाता है
खेलकूद कर जिस पर तुने
यौवन पाया जरुर यहीं
ओ!!!!मेरे परदेशी सजना......
पनघट की जिस राह चला तू
उसकी याद सताएगी
चंदा की पायल की छम-छम
प्रीत के गीत सुनाएगी
पंख फैलाये नाचेंगे तेरे
चारों ओर मोर वही
ओ!!!मेरे परदेशी सजना.........
आए बसंत तो सुमन खिलेंगे
पवन झकोरे खूब चलेंगे
महकाए जो तुझे हमेशा
मधुर सुवासित समीर बहेंगे
खेतों की विकल क्यारी की
तुझे याद आएगी जरुर कहीं
ओ!!!! मेरे परदेशी सजना.........
वह माँ के अंचल की छाया
जिसमे छिपकर सो जाता था
वही पुराना टुटा छप्पर
जहाँ सपनों में खो जाता था
मधुर सुरीली माँ की लोरी
तुझे तडफाएगी जरुर कहीं
ओ!!!!मेरे परदेशी सजना
लौट के आ घर दूर नही
आपका
शिल्पकार

(फोटो गूगल से साभार)

पॉँच रोटियां

रोटी तू तो
जीवन है मेरा
मर जाता
तेरे बिना मैं
तू मेरी महबूबा है
प्रियतमा है
सब कुछ
रोटी तू
नदिया है
आशा-निराशा
रोना-हँसना
सूख-दुख
बहा ले जाती है
अपने साथ
सब कुछ


रोटी तू तो
सागर है
गाली,झूठ
थप्पड़
माँ का दुःख
समा लेती
अपने अन्दर
सबकुछ
रोटी तू तो
गोल है
समय का चक्र
गाड़ी का पहिया
कुम्हार का चाक
सूरज का गोला
सबकुछ
रोटी तू तो
छलना है
महाठगनी है
लेती है
अपने बदले
इज्जत
हर लेती है
सब कुछ


आपका
शिल्पकार

(फोटो गूगल से साभार)

 

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