मास्टर जी ने सवाल लगाया के बतावे सुरेश
भैंस में तै पाड़ी घटाई झोट्टा रह गया शेष
बता तू अकल बड़ी के भैंस
जाडा भोत पड़े था भाई खूब लगाई रेस
पहले तो कम्बल ओड्या उस पे डाला खेस
बता तू अकल बड़ी के भैंस
कुत्ते के पिल्लै पकड़े उसके मुंडे केश
बिना उस्तरे नाइ मुंडा ताऊ पे चल्या केश
बता तू अकल बड़ी के भैंस
बिना चक्के की गाड्डी चाली रेल उडी परदेश
गार्ड बेचारा खड़ा रह गया देखे बाट नरेश
बता तू अकल बड़ी के भैंस
एक पेड़ पे चालीस चिडिया तभी घटना घटी विशेष
शिकारी की एक गोली चाली बच गई कितनी शेष
बता तू अकल बड़ी के भैंस
आपका
शिल्पकार
(फोटो गूगल से साभार)
बता तू अकल बड़ी के भैंस
आचार्य ललित मुनि, मंगलवार, 8 सितंबर 2009बूँद को सागर में ही रहने दो
आचार्य ललित मुनि, रविवार, 6 सितंबर 2009क्या प्रलय
एवं स्थिति में
मात्र
एक बूँद का
फासला है
कांप जाता हूँ
किसी अनिष्ट की
आशंका से
जब डबडबाती है
तेरी आँखें
ब्रह्माण्ड में घूमता हुआ
"हैल्बाप"
भीतर तक डरा जाता है,
यदि टपक जाए
तो धरती
रसातल में चली जायेगी
संतुलन बिगड़ जाएगा
सभी आकर्षण में बंधे हैं
बंधे हैं ,जाने अनजाने बन्धनों में
सूर्य का आकर्षण बाँध लेता है सबको
सभी छोटे बड़ों को
जीवन एवं मृत्यु का
यह निकट का फासला है
बूँद
जीवन/मृत्यु है
मर्यादा के बंधन से
इसे निकलने ना देना
वरना
इस महाप्रलय की
महाविनाश का बोझ लेकर
तुम भी जी न सकोगे
बूँद को सागर में ही रहने दो
आपका
शिल्पकार
(फोटो गूगल से साभार)
राजनीती के तवे पर कोरे झूठ की रोटियां
आचार्य ललित मुनि,चले जा रहे हैं वाहन
सड़क का सीना रौंदते हुए
चीरते हुए /निर्दयी होकर
ठीक राजनीती के तवे पर
कोरे झूठ की रोटियां
सेकने वाले नेता की तरह
निर्भय होकर,
कड़कती धुप में खड़ा है
सर छुपाने की चाह लिए
युग निर्माता मजदूर
जो गढ़ता है
आलिशान इमारतें
लेकिन
उसे सर छुपाने तक की जगह
नसीब नही
सिसकियाँ लेता हुआ
समाजवाद
ये पेट आश्वासन का भूखा नही
ये दो हाथ
किस्मत गढ़ते हैं देश की
सियासत के दलाल
खा जाते हैं "रोटियां"
हम गरीबों की
छोड़ जाते हैं
कोरा आश्वासन
हमारी भूख मिटाने के लिए
सबको अपना हक़
अपना अधिकार दिलाने की हसरत लिए
दम तोड़ रहा है
प्रजातंत्र
इन निष्ठुर हाथों में
आपका
शिल्पकार
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