वह मुक्त होकर
मांग रही थी तृप्ति
खुले आम मंच से
एक अतृप्त भटक रहा था
आनंद की तलाश में
तृप्त होना क्यों चाहती हो तुम
अतृप्ति ही तो जीवन है
तृप्त होकर ठहर जाना
रुक जाना
क्यों, जीवन का अंत नहीं है?
अगर पड़ाव को मंजिल नहीं बनाना है
तो अतृप्ति को स्वीकार करो।
अतृप्ति को स्वीकार करो--एक कविता---ललित शर्मा
आचार्य ललित मुनि, गुरुवार, 5 अगस्त 2010कवि रामेश्वर शर्मा की एक कविता---अंधा
आचार्य ललित मुनि, रविवार, 11 जुलाई 2010कवि रामेश्वर शर्मा की एक कविता
अंधा
एक अंधा
एक हाथ कटोरा
एक हाथ डंडा
भूख से धंसा पेट
कहता दे दाता
करता गुहार
वहां से गुजरता
हर व्यक्ति
अनदेखा बन
चल पड़ता है
अंधों की तरह
वाह रे!
अंधे की दुनिया
अंधे की सरकार
रोज गरीबी भूखमरी
अखबारों भाषणों से
दे रहे दुहाई
बैठा सिंहासन पर
लाज द्रौपदी की
लुटवा रहा है
कृष्ण को उलझा रहा है
कि यह कथन
कितना सच होगा
उस अंधे से
यह अंधा अच्छा होगा।
देख क्रुरता फ़ूलों की हम दंग हो गये--एक गीत
आचार्य ललित मुनि, शुक्रवार, 9 जुलाई 2010कवि रामेश्वर शर्मा का एक गीत
देख क्रुरता फ़ूलों की हम दंग हो गये
जीवन है या जटिल समस्या तंग हो गये।
आदर्शों के रंग गिरगिट के रंग हो गये।
कपटी भावों में डूबे जग मुंह बोले संबंध हुये
विश्वासों के रुपक पछतावे भर के अनुबंध हुये
सच धोखे के व्यापारी के संग हो गये।
आशाओं का राग रंग तो भ्रम का खेल खिलौना है
संध्या की आशंकाओं में घिरा हुआ दोपहर बौना है
संयम नियम विवशताओं के अंग हो गये।
अपनी-अपनी लोलुपता में मधुमक्खी है लोग बने
परिभाषाओं के प्रपंच में अर्थ व्यर्थ का रोग बने
देख क्रुरता फ़ूलों की हम दंग हो गये।
रामेश्वर शर्मा
शिवनगर मार्ग बढई पारा
रायपुर (छ.ग.)
09302179153
