शनिवार, 25 दिसम्बर 2010

बढ रही मंहगाई हमको आजमाने के लिए

भाई योगेन्द्र मौदगिल के गजल संग्रह ‘अंधी आँखे-गीले सपने” से एक गजल प्रस्तुत कर रहा हूँ।

बढ रही मंहगाई हमको आजमाने के लिए।
आदमी जिंदा है केवल तिलमिलाने के लिए।

बेकसी बढती रही गर दाने-दाने के लिए।
तन पड़ेगा झोंकना चूल्हा जलाने के लिए।

प्याज ने आँसू निकाले, देख बेसन ने कहा।
चाहिए अब तो कलेजा, हमको खाने के लिए।

इतनी ऊँची कूद मारी इस उड़द की दाल ने।
लोन अब लेना पड़ेगा दाल खाने के लिए।

सोचता हूं वो जमाना खूब था,जब हम पढ लिए।
दिन में तारे दिख गए, बच्चे पढाने के लिए।

नौकरी जब ना मिली तो उसने किडनी बेच दी।
दो निवाले भूखे बच्चों को खिलाने के लिए।

इक चटाई, एक धोती, एक छ्प्पर, एक घड़ा।
उम्र सारी काट दी इनको बचाने के लिए।

भूख ने तड़फ़ा दिया तो बेईमानी सीख ली।
शुक्रिया रब्बा तेरा ये दिन दिखाने के लिए।

तन पे है बनियान चड्डी,दोनों के, पर फ़र्क है।
इक छिपाने के लिए और इक दिखाने के लिए।

भन गया मैं भी मिनिस्टर, भोली जनता शुक्रिया।
मिल गया लाईसेंस मुझको देख खाने के लिए।

माफ़िया का क्या गजब का शौक है भैइ देख लो।
वर्दियों को पाल रक्खा दुम हिलाने के लिए।

चंद वादे, चंद नारे, चंद चमचे “मौदगिल’
पर्याप्त हैं इस देश की संसद में जाने के लिए।