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गुगल बाबा

इंडी ब्लागर

 

कविता का स्वंयवर!!

नव वधु सी
लजाती 
सकुचाती आई
वह कविता
बिना टिप्पणी
बैरंग लिफ़ाफ़े सी
लौट आई
वह कविता
कुछ दिन बाद
कविता का स्वंयवर
रचा गया
कर माल लिए
रावण को वर आई
वह कविता
क्योंकि
भरी सभा मे
रावण ने धनुष
खंडित किया 
अप्रीतम को
वर आई 
वह कविता


आपका
शिल्पकार

इसे अवश्य पढिए-अच्छे लोग किनारे हो गए!!!

कल रात की बात है, हम कुछ लिख रहे थे तभी चैट पर हमारे बड़े भाई गिरीश पंकज जी का आगमन हुआ और उन्होंने पूछ "फौजी भाई क्या हाल चाल है"  हमने कहा नमस्ते भैया सब ठीक है. आनंद है. आज आप हिंदी में लिख रहे हैं. तो गिरीश भाई बोले" कट पेस्ट का जमाना है इस लिए कट पेस्ट कर रहा हूँ" हमने कहा चलिए अच्छी बात है....
कट गया फट गया खिस्को हो गया. अब इसका मोल भी डिस्को हो गया. 
तो गिरीश भाई बोले ये तो कविता हो रही है तुकबंदी" अब मित्रों इस तुक बंदी का सिलसिला चल पड़ा आगे चल कर क्या बना? ज्यों का त्यों आपके सामने प्रस्तु कर रहा हूँ. इस गजल लेखन को गिरीश भाई ने मजमुआ गजल कहा. अब ये मजमुआ गजल आपके समक्ष पेश है. कृपया आपका आशीर्वाद चाहूँगा.

Girish: अच्छे लोग किनारे हो गए/ मंचो पर हत्यारे हो गए
ललित: काले पीले सारे हो गए/सच्चे सब बेचारे हो गए
Girish: लुच्चो का है राज यहाँ पर/ श्वेत सभी कजरारे हो गए.
ललित: मेहनत कश को रोटी नही, चमचों के चटखारे हो गए
Girish: काम यहाँ कुछ कैसे होगा/ खाली-पीली नारे हो गए
ललित: डंडा लेकर घुमने वाले/उनकी आंखो के तारे हो गए
Girish: जो कमजोर बहुत थे वे ही. सत्ता के सहारे हो गए.
          शातिर खुल्ले घूम रहे है. हम अल्ला को प्यारे हो गए....
ललित:सच की राह पे चलने वाले / देखो अब बेसहारे हो गए

Girish: सत्ता पाकर दो कौड़ी भी/ आसमान के तारे हो गए
ललित: छाती पीट पीट के लगाते थे/ झुठे वे सब नारे हो गए
          खुन बह रहा है गलियों मे/ नेता सब हत्यारे हो गए


अब इस तरह यह मजमुआ गजल तैयार हो गई, जैसे थी वैसी ही प्रस्तुत कर रहा हूँ. आखरी की दो पंक्तियाँ 


Girish: जैसे जिन्दगी एक जुआ हो गयी.
ललित: वैसे ही ग़ज़ल मजमुआ हो गयी 
 
आपका
शिल्पकार


 

लाँघ पाऊँ बाधाओं को!!

मरीचिका
मृगतृष्णा
अतृप्त चक्षु
अतृप्त आत्मा
मन चातक
व्याकुल अनवरत
जीवन दुर्भर
कांक्रीट की दीवारें
टूटती नहीं
बाधाएं लाँघ नहीं पाया
अग्नि ज्वालायें 
धधकती सीने में
पुन: उर्जा
निर्मित करने
पुन: कोशिश करूँ
लाँघ पाऊँ बाधाओं को
तृप्ति तभी संभव है.


आपका
शिल्पकार

जागो मेरे प्यारे धरती पुत्रों -अपना लक्ष्य संधान करो-गणतंत्र दिवस




जागो मेरे प्यारे धरती पुत्रों तुम
राष्ट्र हित में कुछ काम करो
गणतंत्र दिवस की पावन बेला में
देश हित में कुछ संकल्प करो


भीष्म प्रतिज्ञा बिना नही देखो
होता है महान काम कोई 
जब तक आगे ना आये तो
होता नहीं बलिदान कोई
सुसुप्त जाति की मृत रगों में
तुम प्राणों का संचार करो


गणतंत्र दिवस की पावन बेला में
देश हित में कुछ संकल्प करो

एकलव्य जैसी निष्ठा से
हिमालय भी झुक जाता है
सागर भी है रह बताता
बल पौरुष बढ़ जाता है
प्रेरणा लेंगे जन गण तुमसे 
अपना लक्ष्य संधान करो


गणतंत्र दिवस की पावन बेला में
देश हित में कुछ संकल्प करो

महावीरों की धरती पर पैदा 
प्राणवान वीर ही होते हैं
जीवन उनका धन्य है जो
देश समाज हित कुछ खोते हैं
अपने तन-मन-धन का 
निश्वार्थ भाव से दान करो


गणतंत्र दिवस की पावन बेला में
देश हित में कुछ संकल्प करो

बनो बलशाली योद्धा तुम
इस धरा को स्वर्ग बना दो
राह रोकें हजार रुकावटें
अपने पुरुषार्थ से उसे हटा दो
महावीरों की इस धरती से
गद्दारों का जीना हराम करो.


गणतंत्र दिवस की पावन बेला में
देश हित में कुछ संकल्प करो

आपका
शिल्पकार
चित्र गुगल से साभार

एक कवि लड़ रहा दो मोर्चों पर-लोकतंत्र शर्मिंदा है!! (गिरीश पंकज)

डी. आई. जी. का डंडा महिला पर चलने से एवं कलेक्टर द्वारा मातहत कर्मचारी को थप्पड़ मारने से एक कवि का मन आहत हुआ और आक्रोश से भर उठा. कलम करने लगी  व्यवस्था पर चोट. गिरीश भाई ने आज इस विषय पर एक कविता कही है. तन बुखार से जूझ रहा है और मन दुष्ट व्यवस्था से, एक कवि दोनों मोर्चों पर संघर्ष कर रहा है. मै गिरीश भाई के जज्बे को सलाम करता हूँ और उनकी रचना प्रस्तुत करता हूँ. पूरी कविता पढ़ने के लिए यहाँ पर आयें.


लोकतंत्र शर्मिंदा है. यहाँ अफसरी ज़िंदा है.
लोकतंत्र शर्मिंदा है. यहाँ अफसरी ज़िंदा है.

वर्दी में शैतान छिपे है, कुर्सी पर मक्कार बहुत.
जनता को ये रौंद रहे है, देखो बरमबार बहुत.
कहीं पे डंडा चलता है तो कही पे थप्पड़ भारी.
लोकतंत्र की छाती पर अब ये कुर्सी हत्यारी.
नीच हो गयी नीक व्यवस्था, घायल श्वेत परिंदा है.
लोकतंत्र शर्मिंदा है. यहाँ अफसरी ज़िंदा है.

खुले आम अब लोग पिट रहे, कैसा है जनतंत्र
जनता ही मारी जाती है, रोज़ नया षड्यंत्र .
अफसर जालिम बन बैठे है, अंगरेजी संतानें.
इनको हम ही पाल रहे , कोई माने या ना माने.
जनता का हर इन्कलाब भी इनको लगता निंदा है.
लोकतंत्र शर्मिंदा है. यहाँ अफसरी ज़िंदा है.

उठो-उठो ओ सारे मुर्दों, अब थोड़ा चिल्लाओ तुम.
जहाँ पराजित लोकतंत्र हो, बिलकुल शोर मचाओ तुम.
देश में अफसर नही, देश की जनता का ही शासन है.
हाय अभी तक यहाँ हंस रहा, दुर्योधन-दुशासन है.
लोकतंत्र का हर हत्यारा, अफसर नहीं दरिंदा है.
लोकतंत्र शर्मिंदा है. यहाँ अफसरी ज़िंदा है...


आपका

शिल्पकार


इंसानो जैसे दुसरों पर नहीं हंसते बंदर!!

अखबारी कविता-रद्दी पेप्योर से उठाए गए शीर्षक-आशीर्वाद चाहुंगा 

आक्रामक तेवर
नही चलाने देगें टैक्सी
सरकार का कोई
लेना देना नही
सबसे बड़ी गिरावट
इस साल की
एक और
टैक्सी चालक पर हमला
धुमिल होती छवि
एक्सरसाईज से
पाएं चेहरे मे रौनक
ये काले दाग
हटेंगे कैसे?
इंसानो जैसे दुसरों पर
नहीं हंसते बंदर


 आपका
शिल्पकार

अब बोझा उतार दो एटलस!!

बसंतागमन
जुझ रही हैं कोहरे से 
सुर्यकुमारियाँ 
किसी मजदुर की तरह 
एक जुन की रोटी के लिए 
बोझा ढोता एटलस
पृथ्वी का भार
कांधे  पर लादे
चलता है अनवरत
भुख मिटाने के लिए
पर्चे बांटे जा रहे हैं
बाजार मे
भुख मिटाने वाला
सल्युशन बनकर है
तैयार
अब बोझा उतार दो
एटलस


आपका
शिल्पकार

कब तक युवा रहेगा बसंत?

सुरसा मुख सी
बढती मंहगाई
कोल्हु के बैल कंधों पर
गृहस्थी का जुड़ा डाले
प्राण वायु मे घुलता जहर
रसायन से मौत उगलते खेत
बोझ से झुकी कमर
दीमक लगी उमर
जो नित चाट रही
जीवन रेखा
घुटने साथ नही देते
लेकिन
वो कहते हैं
बसंत बुढा नही होता
कोई उनसे पूछे
मोतियाबिंद से
अंधी हुई आंखे लेकर
मधुमेह ग्रसित
देह लेकर
धृतराष्ट्री व्यवस्था में
कब तक युवा रहेगा
बसंत


आपका
शिल्पकार

आएगा ॠतुराज बसंत मेरे द्वार!!

ज बसंत पंचमी है और प्रकृति का सबसे सुहाना मौसम प्रारंभ हो रहा है। कवियों इस मौसम का गुणगान करते हुए ना जाने कितने ग्रथ रच दिए। इस मौसम का आनंद ही कुछ और है। बस कुछ दिन बाद पलास के फ़ुल खिलेंगे एक हरितिमा मिश्रित लालिमा से धरती का श्रृंगार होगा। महुआ के फ़ुल झरेंगे जिसकी खुशबु से वातावरण मतवाला हो जाएगा। प्रकृति मदमस्त हो जाएगी। इस समय मैने यह कविता 14जनवरी 1987 को लिखी थी। आपका आशीर्वाद चाहुंगा।


आज यादों के सुमन खिले हैं
फ़िर खुला सपनों का आगार
क्युं मेरा मन विकल हुआ है
आएगा ॠतुराज बसंत मेरे द्वार

आज बसंत का जन्म दिवस है
क्युं टीसें उठ रही है इस दिल में
तुम्हारी खोयी हुई यादो की पुन:
ज्युं कली खिली हो इस दिल मे

बसंत आया फ़िर क्युं वीरान है
इन जागी उम्मीदों का चमन
क्युं राज छिपा के इस दिल मे
आनंदित नही है कोई सुमन

लिए बैठा हुँ इक आस चमन मे
चुपके से कहीं कोई फ़िर आएगा
भर कर झोली मे बासंती रंग
अपने दोनो हाथों से खुब लुटायेगा

मेरा स्वप्न कभी साकार न हुआ
ना ही  कहीं बसंत फ़िर आएगा
वही कांटों की सेज और तनहाई
वह ललित बसंत फ़िर नही आएगा


आपका
शिल्पकार

जीत लिया युद्ध!




कोहरे का कहर
टिक ना सका
धरती पर
छोटी-छोटी
किरणो ने
एक होकर
जीत लिया युद्ध
अंधेरे से
सुर्योदय हुआ




आपका 
शिल्पकार

पनघट मैं जाऊं कैसे?



पनघट मैं जाऊं कैसे, छेड़े मोहे कान्हा 
पानी    नहीं  है,  जरुरी  है  लाना


बहुत   हुआ  मुस्किल, घरों  से  निकलना 
पानी  भरी  गगरी को,सर पे रख के चलना
फोडे  ना  गगरी, बचाना  ओ  बचाना 


पनघट  मैं  जाऊं कैसे,छेड़े मोहे कान्हा 
पानी   नहीं  है, जरुरी  है लाना


गगरी    तो   फोडी   कलाई   भी  ना  छोड़ी
खूब   जोर  से  खींची  और  कसके  मरोड़ी 
छोडो  जी  कलाई,  यूँ सताना  ना   सताना


पनघट मैं जाऊं कैसे,छेड़े मोहे कान्हा 
पानी   नहीं  है, जरुरी है लाना 


मुंह    नहीं    खोले    बोले    उसके    नयना 
ऐसी   मधुर   छवि  है  खोये  मन का चयना
कान्हा   तू   मुरली    बजाना   ओ   बजाना


पनघट मैं जाऊं कैसे,छेड़े मोहे कान्हा 
पानी   नहीं  है, जरुरी  है  लाना 


आपका 
शिल्पकार


फोटो गूगल से साभा

3043 के बाद सस्ती होगी शक्कर (कविता)

ज सुबह का अखबार उठाया और पढने लगा, उसके शीर्षकों पर ध्यान दिया तो थोड़ी मेहनत से कुछ क्षणिकाओं का जन्म हुआ, बस यूँ ही बन गई. आपसे आशीर्वाद चाहूँगा.


(१)
इस बार का 
बजट चुनौती पूर्ण 
अर्थ शास्त्री ने 
दिये अर्थ मंत्र 
नि:शुल्क 
प्लास्टिक सर्जरी कराएँ
छवि सुधारें


 (२)
फैसला आज सम्भव
रानी जल्द बनेगी दुल्हन
सुनहले पल
कोरिया के राष्ट्रपति
होंगे चीफ गेस्ट

(३)

तोहफों की बौछार
जनकल्याण कारी दिवस पर
मनमोहन से महंगाई नहीं संभली
सरकार में बगावत
शेयर बाजार में गिरावट
क़यामत की घडी 

(४)

शादी करने को
तैयार है शाहिद
इडियट्स को पाठ
बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़

(५)
अद्भुत
सूर्य ग्रहण
3043 के बाद
कम्पनियों से
गिफ्ट नहीं ले सकेंगे
सस्ती होगी शक्कर




आपका 
शिल्पकार

मुआवजे का नमक!!

आज एक कविता फिर पुरानी डायरी से लिख रहा हूँ. इस पर डॉ. के.डी.सारस्वत ने अपनी कलम चलाई थी. आज से ६ वर्ष पूर्व उनकी हत्या स्नातक महाविद्यालय के प्राचार्य पद पर रहते हुए कर दी गई थी. अब उनकी यादें ही शेष है.

श्मशान 
सिर्फ श्मशान
जहाँ एक भयावह चुप्पी 
और नीरवता रहती है
घनघोर अँधेरे से 
अपनी बात कहती है
श्मशान की चार दीवारी से
लगा बहता है एक नाला
नाला नहीं 
दुखो और आंसुओं का सैलाब
देखी है उसने चिताए खुशियों की  
जहाँ दफन हैं गुलाब
एक बेशरम का झुण्ड
उसके साथ कुछ नरमुंड
जाता रहे थे सहानुभूति
साथ लाये थे 
मुआवजे का नमक
रिसते जख्मो पर मलने के लिए
तड़फते सिसकते लोगों, 
परिजनों के बीच 
बेशर्मी से खड़े हैं.
वोटों की राजनीति ने
इन्हें आदमी से 
हैवान बना डाला
मैं सोच रहा था.
इनको कभी श्मशान बैराग
क्यों नहीं व्यापता?
बस एक प्रश्न करता हूँ
कितनी हुयी विधवाएं?
कितने हुए अनाथ?
क्यों आये शमशान में?
एक प्रश्न चिन्ह है साथ.


(बेशरम= हमारे यहाँ उगने वाली एक तरह की झाड़ी है. जो काट कर फेंक देने से कहीं पर भी अपनी जड़ें जमा लेती है.)


आपका
शिल्पकार, 
  

एक जून की रोटी को तरसा!!

दुनिया बनाई देखो उसने कितना वह भी मजबूर था
एक जून की रोटी को तरसा मेरे देश का मजदूर था


चंहु ओर हरियाली की  देखो एक चादर सी फैली है 
यही देखने खातिर उसने भूख धूप भी झेली है 
अपने लहू से सींचा धरा को वह भी बड़ा मगरूर था
एक जून की रोटी को तरसा मेरे देश का मजदूर था


महल किले गढ़े हैं उसने, बहुत ही बात निराली है
पसीने का मोल मिला ना पर खाई उसने गाली है 
सर छुपाने को छत नहीं है ये कैसा दस्तूर था
एक जून की रोटी को तरसा मेरे देश का मजदूर था


पैदा किया अनाज उसने, पूरी जवानी गंवाई थी
मरकर कफ़न नसीब न हुआ ये कैसी कमाई थी
अपना सब कुछ दे डाला था  दानी बड़ा जरूर था 
एक जून की रोटी को तरसा मेरे देश का मजदूर था

आपका
शिल्पकार

टुटा भरम!!!( एक पुरानी कविता)

तेरा आना
निष्प्राण में
नए जीवन का
संचरण था
बुझते दीपक में
 नई उर्जा का
अवतरण था
जंग लगी
स्वझरणी जागी
कहने लगी
मुखर होकर
प्रखर होकर
अपने पन का
पारदर्शी अहसास
परिष्कृत कर गया
जनमी गर्भ से
कालजयी कृतियाँ
तुम्हारी
प्रेरणा की अदृश्य तरंगों ने
झखझोर दी चेतना
सामीप्य ने भरे 
आकाश में वासंती रंग
रात रानी महकी
नागीन मस्ती में झूमी
 सहसा
छलकते नैनों
टुटा भरम
देकर
लेने वाले
तुम निकले


आपका
शिल्पकार

बस! अब और नहीं!!!!

उन दिनों पंजाब में आतंकवाद चरम सीमा पर था. रोज हत्याओं का दौर चल रहा था. रेडियों बम दिल्ली सहित कई जगह फुट रहे थे. मैं 10 वीं में पढ़ रहा था. एक दिन समाचार सुना की एक हवाई जहाज में बम रख कर आतंकवादियों ने उड़ा दिया. उसमे से एक भी यात्री नहीं बचा. सभी मारे गए. मेरे मन से एक कविता फुट पड़ी.यह बात 1983-84 की हो सकती है. जिसे मैं अपनी डायरी में लिख दिया मेरी पुरानी डायरी कहीं खो गई. कवितायेँ भी उसके साथ चली गई. लेकिन कल एक फाईल में रखे कुछ पन्ने मिल गए. उसमे से ये एक कविता आपके सामने ज्यों की त्यों प्रस्तुत कर रहा हूँ. आशीर्वाद चाहूँगा. 


बस!
अब और नहीं!
मौत का तांडव
देखने वाले 
एक जिन्दा आदमी 
की आवाज  
निर्दोष लोगों को
निगल गया 
मौत का वह बेरहम साज 
जिसने भी देखा 
उसके नैन हुयें रुन्वसे
छोटी सी गुडिया छीन गई
उस मासूम हाथ से
मौन निगल गई उसे 
मध्य आकाश से
जिधर देखो उधर
लाशों के चीथड़े हैं
कई प्रियजन 
एक दुसरे से बिछड़े हैं
अब हम अपने दिल का दर्द
किस्से कहें
साँप तो डस गया
बस! लकीर पीटते रहें 


आपका 
शिल्पकार 

दो कवितायेँ 




(१)
वह 
भूख से
मर गया 
तलाशी में
उसके थैले से  
चावल निकला


(२)
उसने 
उड़ने के लिए
जोर लगाया 
उड़ ना सका
 पंख
गिरवी थे 


आपका 
शिल्पकार






ये राजनितिक संकट की घडी है !!!

शासकीय अधिकारों का विकेन्द्री करण हमेश ऐसी समय खड़ी करता है कि एक छोटा सा काम भी होना कितना कठिन हो जाता है. एक आम आदमी तो थक कर घर में ही बैठ जाता है. एक कविता है आपसे आशीर्वाद चाहूँगा.




राजा की जान
तोते में 
तोते की जान
मैना में 
मैना की जान 
कौवे मे 
कौवे की जान 
घोंसले में 
घोंसले में सांप है 
सबकी जान 
अटकी पड़ी है  
ये राजनितिक 
संकट की घडी है 


आपका 
शिल्पकार, 

हाथ सेक रहे हैं चिताओं पर !!!

देश की हालत दिनों दिन ख़राब होती जा रही है. सियासत में सब अपना स्वार्थ देख रहे हैं महंगाई आसमान छु रही है. विकास की बातें बेमानी हो रही हैं. अब तो एक समय का खाना भी जुटाना मुश्किल हो गया है. पर कब चेतेगी सरकार.

(1)


देश
की प्रगति
और विकास
सायकिल से
मंगल पर
जाने का प्रयास


(2)


मचा
सियासी दंगल
सर्दी में
गर्मी का मजा
हाथ सेक रहे हैं
चिताओं पर

आपका
शिल्पकार,

हर तरफ भेड़ियों का राज हो गया है!!!

आज एक गजलनुमा रिठेल कर रहा हूँ. कृपया आपका आशीर्वाद चाहूँगा 


हर तरफ भेड़ियों का राज हो गया है
मासूम आदमी ही शिकार हो गया है



 ढूंढ़ते   हैं कोई   तो बचायेगा उन्हें 
रहनुमा थे उनका पता खो गया है



कब्र  से  लाशें  गायब  होती रही 
तुम्हारा जमीर कहाँ  सो  गया है



रहते थे कभी चैन से अमन से लोग
खुनी फसलें कौन राह में बो गया है



कातिल की तलाश में आए सिपाही
 कौन सड़क से खुनी धब्बे धो गया है।

आपका
शिल्पकार

(फोटो गूगल से साभार)

काठ का चाँद!!!

(१)
खुली  
खिड़की
उतरी उषा 
किरणों के साथ
तुम सोते रहे


(२)
काठ का चाँद
क्या रौशन करेगा?
आकाश
तुम्हारे लिए  
है अमावश  


(३)
छटती  धुंध

टूटता तिलस्म
स्तब्ध यामिनी 
स्तब्ध गगन 
कोई साक्षी है




आपका
शिल्पकार,    

बड़ी हवेली ढहने लगी है अब !!

आज ढाई पंक्ति की ही कविता कहने का दिल है. ढाई पंक्ति में ही पूरी बात कहने की कोशिश करता हूँ. आपका आशीर्वाद चाहूँगा.




(१) .

बड़ी हवेली 
ढहने लगी है अब 
किसी ने पलीता लगा दिया



(2 )


बर्फ का हिमालय
आज पसीने से नहा गया 
ज्वाला मुखी जो फुट रहा है


आपका 
शिल्पकार, 

जरा ये कविता भी पढ़ कर देखें!!!

सब लोग बड़ी बड़ी  कविता लिखते हैं और छोटी से छोटी भी. एक दिन शरद भाई बोले यार मेरी कविता 57 पेज की है. मैं सोचने लगा कविता है कि खंड काव्य है. लेकिन उन्होंने पढवाई नही. फिर कभी पढवायेंगे. आज मैंने सोचा कि सब छोटी बड़ी लिखते हैं कविता. मै भी लिख कर देखता हूँ. तो मैंने भी आज ढाई लाईन की कविता लिखी है. आपका आशीर्वाद चाहूँगा. 






उसके जाते ही 
मेरे बंद हुए किवाड़
वो डूबता हुआ सूरज था




आपका 
शिल्पकार

जब डबडबाती है तेरी आँखें!!!!


क्या प्रलय
एवं स्थिति में
मात्र
एक बूँद का
फासला है?
कांप जाता हूँ
किसी अनिष्ट की
आशंका से
जब डबडबाती है
तेरी आँखें
ब्रह्माण्ड में घूमता हुआ
"हैल्बाप"
भीतर तक डरा जाता है,
यदि टपक जाए
तो धरती
रसातल में चली जायेगी
संतुलन बिगड़ जाएगा
सभी आकर्षण में बंधे हैं
बंधे हैं ,जाने अनजाने बन्धनों में
सूर्य का आकर्षण बाँध लेता है सबको
सभी छोटे बड़ों को
जीवन एवं मृत्यु का
यह निकट का फासला है
बूँद
जीवन/मृत्यु है
मर्यादा के बंधन से
इसे निकलने ना देना
वरना
इस महाप्रलय की
महाविनाश का बोझ लेकर
तुम भी जी न सकोगे
बूँद को सागर में ही रहने दो

आपका
शिल्पकार,

(फोटो गूगल से साभार)

 

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