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चेतावनी

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गुगल बाबा

इंडी ब्लागर

 

खबरदार ! ये इश्क नही है

खबरदार ! ये इश्क नही है वाह-वाही के लिए,
बारूद का एक ढेर है अपनी तबाही के लिए ,

मुफलिस-ऐ-मोह्हबत के तारीख-ऐ-निशां नही होते,
ये शगल तो है सिर्फ़ जिल्ले इलाही के लिए,

मै तडफता रहा वहां जाम-ऐ-महफ़िल सजती रही,
नए बुत तराशे जाते रहे तख्त-ऐ-शाही के लिए

मेरी मुमताज़ ताजमहल मै भी बनवा सकता था
कैसे किसे पेश करूँ अब तेरी गवाही के लिए,

इश्क के आगाज़ पर अंजाम न सोचा था "ललित"
वरना क्योंकर तैयार होता अपनी तबाही के लिए,

आपका
शिल्पकार,

(फोटो गूगल से साभार)

तेरे छलकते नैनों ने भरम तोड़ दिया

तेरा आना
एक निष्प्राण में
नए जीवन का
संचरण था
बुझते दीपक में
एक नई उर्जा का
अवतरण था
बरसों से जंग लगी
स्वझरनी की नींद खुली
वह कहने लगी
पहले से मुखर होकर
प्रखर होकर
कुछ अपने पन का
पारदर्शी अहसास
परिष्कृत कर गया मुझे
जनम गई इसके गर्भ से
कुछ कालजयी कृतियाँ
तेरे आने से
प्रेरणा की अदृश्य तरंगों ने
चेतना को झकझोर दिया
तेरे सामीप्य ने आकाश में
वासंती रंग भर दिए
वातावरण रात रानी की
महक से सराबोर था
काली नगीन मस्त होकर
झूम रही थी / सहसा
तेरे छलकते नैनों ने
भरम तोड़ दिया
देने से पहले
लेने वाले
तुम भी निकले


आपका
शिल्पकार

(फोटो गूगल से साभार)

जंजीरों से बांधने वाली सभ्यता

मैं जंगली हूँ,
सीधा सा,भोला सा
सबसे डरने वाला
अपनी छोटी सी दुनिया में
बसने वाला,रहने वाला
अपने जंगल को चाहने वाला
एक मृग के पीछे चला आया
रास्ता भटक गया,
पकड़ लिया गया मुझे
शहर में घेरकर


जंजीरों से बंधा गया मुझे
इनमे मेरा अपना कोई नही था
सब पीछे जंगल में छुट गया
मेरी माँ,मेरा कुत्ता,मेरी शान्ति
अब ये मुझे पाल रहे हैं
कुर्बानी के बकरे की तरह
जगह -जगह भीड़ में घुमाते है मुझे
बन्धनों में जकडा छटपटाता हूँ मैं
मुझे मेरे घर की याद आती है
मेरा घर
मेरा जंगल बुलाता है मुझे
मैं उसके पलंग के पाए से बंधा हूँ
पामेरियन कुत्ते की तरह
वे हँसते हैं तो
मुझे बड़ा डर लगता है
उनकी हँसी बड़ी डरावनी है
कैसी विडम्बना है
शहरी जंगल से डरता है
जंगली शहरी से डरता है,
दोनों डरते हैं,
वे मुझे चाहते हैं,
पुचकारते हैं ,दुलारते हैं,
लेकिन मैं जंगली,सिर्फ़ जंगली
जंगल की रट लगाये रहता हूँ



वह भी मुझे दुलारती है
पुचकारती है खिलाती है
अपने आंचल में बाँध लेना चाहती है
मै जंगल में अपना
भविष्य देखता हूँ
इन जंजीरों को तोड़ना है
तोड़ने का प्रयास करूँगा
आजाद होना चाहता हूँ
इस कैद से
यहाँ पर सब अपने हैं लगता है
पर अपना सा कोई नही होता
कुछ समय का अनुबंध है अभिनय का
छुट कर जाना चाहता हूँ
अपने जंगल में
जो सिर्फ़ मेरा है
अपना सा है/सभ्य है
एक बार इस कैद से छुट जाऊँ
फ़िर कही नही आऊंगा
शहर में
जंजीरों से बांधने वाली
सभ्यता में
गूम होने के लिए 

आपका
शिल्पकार

(फोटो गूगल से साभार)

प्रभु जी मन अंधकार हरो, कर दो जगमग अंतर मन को,करुणा दीप धरो


प्रभु जी मन अंधकार हरो 
कर दो जगमग अंतर मन  को,करुणा दीप धरो


मैं  प्राणी   माया   बंधन  में,  बंधा   रहा   हमेशा
मतवालों   की   इस   नगरी  में, दूर करो कलेशा
तेरी   करुणा  का   प्यासा   हूँ,शीश  पे  हाथ धरो

प्रभु जी मन अंधकार हरो 
कर दो जगमग अंतर मन को,करुणा दीप धरो

खूब  सजाया ये तन मैंने,आतम ना  सिंगार किया 
खडा था खजूर ही बन के,छाया का ना प्रसार किया 
ये   जीवन भी  बीता  जाये, कुछ  तो   ध्यान  धरो 


प्रभु जी मन अंधकार हरो 
कर दो जगमग अंतर मन को,करुणा दीप धरो

खूब कमाई धन और दौलत,व्यसनों में ही सना रहा
जब  आई  जाने  की वेला,  सबका सब  ही पड़ा रहा 
कोई  भी  ना  ले  जा पाया कुछ भी,लाख जतन करो

प्रभु जी मन अंधकार हरो 
कर दो जगमग अंतर मन को,करुणा दीप धरो

तेरी शरण में आके प्रभु जी,"ललित"क्या मांगेगा 
सोया  पढ़ा   रहा है  मनवा, झटपट  उठ  जागेगा 
जो चाहोगे सभी मिलेगा,तुम उसकी लगन  लगो


प्रभु जी मन अंधकार हरो 
कर दो जगमग अंतर मन को,करुणा दीप धरो

आपका 
शिल्पकार 

(फोटो गूगल से साभार)






प्रभु जी मन में अमन कर दो, इस जीवन में लगन भर दो


प्रभु जी मन में अमन कर दो 
इस जीवन  में  लगन  भर  दो
 
राह   ऐसी   दिखाओ  प्रभु,  दुखियों  की  सेवा  हो
निर्बल को बल मिल जाये तेरे  प्रेम  की  मेवा  हो 
हम रहें समीप तुम्हारे,तुम  पास  गगन  कर  दो 


प्रभु जी मन में अमन कर दो 
इस जीवन  में  लगन  भर  दो

निर्धन  को  धन मिल जाये, योगी को बन मिल जाये
इस धरती का कर्ज उतारें,हमें ऐसा जनम मिल जाये
जल   जाएँ   सभी   दुर्गुण,  सांसों  में  अगन  भर  दो 


प्रभु जी मन में अमन कर दो 
इस जीवन  में  लगन  भर  दो

प्रेम हिरदय में भर जाये,तुम सबका जीवन हरसाओ
बाधाएं दूर हो  सबकी, तुम  अपनी  करुणा   बरसाओ
जीवन  हो  सरल  सबका, काँटों   को  सुमन   कर  दो

प्रभु जी मन में अमन कर दो 
इस जीवन  में  लगन  भर  दो

आपका 
शिल्पकार

(फोटो गूगल से साभार)


फूलों से हो लो तुम,जीवन में सुंगध भर लो


फूलों  से  हो लो  तुम,जीवन   में  सुंगध   भर  लो
महकाओ तन-मन सारा भावों को विमल कर लो
फूलों से हो लो तुम ........................................

वो मालिक सबका हैं ,जिस माली का हैं ये चमन
वो  रहता  सबमे  हैं  तुम ,कर लो उसी का मनन
हो जाये सुवासित जीवन ऐसा तो जातां कर लो
फूलों से हो लो तुम.......................................


शुभ कर्मों की पौध लगाओ जीवन के उपवन में
देखो प्रभु को सबमे वो रहता हैं कण-कण में
बन जाओ प्रभु के प्यारे ऐसा तो करम कर लो
फूलों से हो लो तुम......................................


मै कोन?कहाँ से आया ? कर लो इसका चिंतन
जग में रह कर के ,उस दाता से लगा लो लगन
रह   कर  के  कीचड़  में  खुद को कमल कर लो
फूलों से हो लो तुम.......................................


वो   दाता   सबका  हैं,  दुरजन   हो   या   सूजन
वो  पिता   सबका  हैं,  धनवान   हो  या निरधन
ललित उसमे लगा करके जीवन को सफल कर लो
फूलों से हो लो तुम ........................................


आपका 
शिल्पकार 

(फोटो गूगल से साभार)

कुछ मुक्तक मेरे,तुम्हारे लिए


देख  कुछ गुलाब लाया हूँ  तेरे लिए 
तोहफे  बेहिसाब लाया  हूँ  तेरे लिए
चश्मेबद्दूर नज़र ना लगे  तुझे कभी
इसलिए नकाब भी लाया हूँ तेरे लिए


अभी तो आई अभी ही चली गयी 
जिन्दगी कैसे  छलती  चली गयी
घूँघट उठाया जैसे ही दुल्हन  का
बड़ी बेवफा थी बिजली चली  गई



मेरे शहर में कई इज्ज़त वाले  रहते हैं
लेकिन वो  इज्ज़त  देते  नहीं हैं ,लेते हैं
दो रोटियों का खुशनुमा अहसास देकर 
हमारे  तन  के  कपडे  भी  उतार लेते हैं


शाम  से  सोचता   रहा  माज़रा  क्या हैं
चाँद हैं   अगर तो  निकलता क्यूँ नहीं  हैं 
कब तक रहेगा यूँ ही इंतजार का आलम 
क्या नया चाँद कारखाने में ढलता नहीं हैं


तपती  धुप   में  छाँव  को तरसती हैं जिंदगी
भागते शहर में गांव को तरसती हैं  जिन्दगी 
शहर जला था जब से दंगे की आग में लोगो 
उस बूढे बरगद की छावं को तरसती हैं जिंदगी


ललित शर्मा 




कभी कभी रंगों से भी खेलने का मन करता हैं


आज सुबह सोचा की एक कविता या गीत फिर लगाता हूं,लेकिन तभी मेरे सामने मेरी बनाई हुई एक पेंटिंग आ गई, सोचा की आज नयी शुरुआत करूँ और इसे ही पोस्ट पर लगा दूँ,काफी कलम घसीटी हो गई जरा इसे विश्राम दे कर ब्रश से भी काम लेना चाहिए, नहीं तो वह आलसी हो जायेगी ज्यादा आराम करने के कारण,सो प्रस्तुत हैं एक चित्र, इसे मैंने एक्रेलिक कलर से बनाया हैं, लेकिन इसे बनाने में ब्रश का उपयोग नहीं किया,इसे बनाने में ब्रस के जगह सेविंग ब्लेड का इस्तेमाल किया हैं, कभी कभी रंगों से भी खेलने का मन करता हैं,रंग मुझे अपनी ओर खींचते हैं और अपने आप को रोक नहीं पाता.इसका ही परिणाम हैं की कुछ नया सृजन हो जाता हैं,  

आपका 
शिल्पकार,

हे माँ


हे माँ 
तू कितनी भोली हैं
तू कितनी चिंता करती हैं मेरी
मैं तुझे रोज कितना छलता हूँ
तुझसे कितना झूठा सच बोलता हूँ
सिर्फ कोरा झूठा सच
मैं सोचता हूँ
जो बातें तेरे से छिपाता हूँ
वह तू नहीं जानती
लेकिन माँ /तू तो माँ हैं
तू  सब कुछ जानती हैं
तू जननी हैं
तू मेरी झूठ में भी
मेरा भला चाहती हैं
माँ तू कितनी करुणामयी हैं
एक दम जगदम्बा की तरह
लेकिन माँ
तुझे दुःख ना हो इसलिए 
तेरे से मैं बातें छिपाता हूँ
अगर बता दूँ तो 
तू दिन भर व्याकुल रहती  हैं
सोचती रहती हैं 
मेरा बेटा मुसीबत में हैं 
उस दिन तुझसे  खाना भी नही खाया जाता
माँ तेरे जगाने से ही मैं उठता हूँ
तुझसे ही मैंने जाना दिन कैसे निकलता हैं
तू ही मेरा सूरज हैं
तेरी ममता के प्रकाश में 
मैं नित नए सोपानों पर चढ़ता हूं
भीषण अंधकार झंझावातों में 
तेरी ममता का प्रकाश ही मुझे राह दिखाता हैं
माँ तू सत्य हैं,
सूरज,चाँद,पृथ्वी,हवा पानी,प्रकृति की तरह
तेरा सामीप्य पाकर 
हृदय निर्मल हो जाता हैं,
तेरे ममतामयी आँचल की छाया में
मै सदा सुरक्षित हूँ
तू मेरा भगवान हैं,
तू ही मेरी सब कुछ हैं
मै तेरा पुत्र हूं
तेरी करुणा  ही मेरा संबल हैं
तेरा स्नेह ही मेरा जीवन हैं
तेरे बिना मै व्याकुल रहता हूँ माँ
तू ये मत सोचना की मै तुझसे दूर हूँ
तू हमेशा मेरी आँखों के सामने हैं माँ
मेरी माँ 
माँ 


आपका
पुत्र
चित्र ललित शर्मा

ये चाय समोसा गरम,उधार खाते रहे हरदम


हमारे गांव में एक होटल हैं बस स्टेंड में उसके मालिक बहुत ही सज्जन हैं,एक अघोषित वैराग उन पर हमेशा
चढा रहता हैं ,जब भी जाओ तो वे अपने ध्यान में ही मगन रहते हैं,उनको सुबह उनके घर के लोग याद दिलाते
हैं के"चलो सुबह हो गयी हैं अब जाकर ढाबा खोलना हैं,तब वो ढाबा पहुचते हैं,रात को जब घर के लोग उनको
बुला कर ले जाते हैं,तब ढाबा बंद होता हैं,खाके कोई पैसा दिया तो ठीक नहीं दिया तो ठीक,वैसे भी अधिकतर
उधारी वाले ही उनके ढाबे में आते हैं,थोडी तारीफ किये उनके ज्ञान की भक्ति की,और नास्ता किये चाय पिए
अपना खाए पिए और चल दिए,बहुत दिन से मैं देख रहा था,एक दिन मेरे दिल से उनके लिए कुछ पंक्तियाँ निकल
पड़ी वो आज विशेष रूप से आप लोगों के साथ बाँटना चाहता हूँ,कृपया मेरे साथ भी आप ढाबा चलकर आनंद लें

ये चाय समोसा गरम
उधार खाते रहे हरदम
आप पैसे ना दें 
यहाँ से ना टलें
ताकि फूटे हमारे करम
ये चाय समोसा गरम ....


वो जलेबी तला जा रहा 
वो हंस-हंस के हलवा खा रहा
खोवे का हैं ये माल
फूल गये हैं वे गाल
उसपे गुस्सा बड़ा आ रहा
खा रहा हैं कचौरी गरम
कहाँ बेच डाली हैं शरम
आप पैसे ना दे 
यहाँ से ना टलें 
ताकि फूटे हमारे करम
ये चाय समोसा गरम......


तुमने जब से समझा हैं 
अपना हैं माल
तब से बिगाडा हैं अपना ये हाल
आते जाते रहे 
रोज खाते रहे
उधार खा के किया हैं कंगाल
कहाँ गिरवी रखी हैं शरम
उधार खाते रहे हरदम 
आप पैसे ना दें 
यहाँ से न टलें
ताकि फूटे हमारे करम
ये चाय समोसा गरम..........


आपका
शिल्पकार

(फोटो गूगल से साभार)

प्रियतम की नाव लगी हैं, कयूं डूबे मझधार

जाग मुसाफिर नाव लगी हैं तुझे जाना हैं उस पार

अरे छोड़ मोह कांकर पाथर का झटपट होले सवार
रे बन्दे जाना भवपार

इस नाव का नहीं किराया,सबका दाता हैं करतार
जाते ही तुझको गले लगाए, वो ऐसा हैं भरतार
रे बन्दे जाना हैं भवपार

जिस पर तुझको बड़ा गरब हैं ,वो नरतन हैं बेकार
जिस दिन छोड़ जाएगा पंछी, वो पड़ा रहेगा बेकार
रे बन्दे जाना हैं भवपार

अब तक बैठा नाव पाथर की, तू डूबन को तैयार
जब प्रियतम की नाव लगी हैं, कयूं डूबे मझधार
रे बन्दे जाना हैं भवपार

आपका
शिल्पकार

(फोटो गूगल से साभार)

हंसा चल रे अपने देश

हंसा चल रे अपने देश
ऊँची उडान भर नील गगन की रहे न कुछ भी शेष
हंसा चल रे अपने देश

यहाँ नहीं हैं कोई अपना सारा जग बीराना
सारे हैं सब झूठे नाते नहीं हैं कोई ठिकाना
बहरुपीयों की नगरी में धर ले असली भेष
हंसा चल रे अपने देश

कैसे उडेगा कागा मन का भिष्ठा में बैठा हैं
करके अपनी मोती चमड़ी कीचड़ में लेटा हैं
उसकी पाती आके अब तो मेटे सारे क्लेश
हंसा चल रे अपने देश

सुना ठाठ पड़ा रहा जाये हंसा छोड़ चले जब काया
सारा ठाठ दारा रहा जाये ऐसी हैं सब उसकी माया
जहाज का पंछी मूड के आये रखे न किसी का द्वेष
हंसा चल रे अपने देश

ऊँची उडान भर नील गगन की रहे न कुछ भी शेष
हंसा चल रे अपने देश


आपका
शिल्पकार

तेरे माथा ऊँचा होगा बाबुल ऐसा काम करूंगी

बाबुल मोरी डोली सजाओ
सारी सहेलियां ब्याह गयी हैं,मुझको भी परणाओ
बाबुल मोरी डोली सजाओ

हाथ पीले कर दो मेरे अब तुम ना ये भार रखो
मैं भी पहनू लाल चुनरिया नौ लखा तुम हार करो
नाक में नथली पग में पायल मुझको भी पहनाओ
बाबुल मोरी डोली सजाओ

मेरे फेरों के मंगल मंडप में सुन्दर फूल सजेंगे
मेरी मांग में भी रंग-रंग के चाँद सितारे जडेंगे
मेरा घर भी हो नंदनवन साजन से मिलवाओ
बाबुल मोरी डोली सजाओ

साजन से मिलेगी सजनी तब नंदनवन महकेगा
चन्दन की खुश्बू से सारा तब उपवन महकेगा
मैं भी होऊं सदासुहागन अब मेरी बरात बुलाओ
बाबुल मोरी डोली सजाओ

होके बिदा मैं तेरे घर से सबकी लाज रखूंगी
तेरे माथा ऊँचा होगा बाबुल ऐसा काम करूंगी
शुभ घडी बिदा की आई अब डोली कहार उठाओ
बाबुल मोरी डोली सजाओ

आपका
शिल्पकार

(फोटो गूगल से साभार)


जयति जय विश्वकर्मा विधाता



जयति जय विश्वकर्मा विधाता
सकल सृष्टि के तुम निर्माता

तुमने जल थल पवन बनाए
अन्तरिक्ष में गगन समाए
उसमे सूरज चाँद लगाए
आकाश में तारे चमकाए

सब मंगल सुखों के हो प्रदाता

जयति जय विश्वकर्मा विधाता


रंग बिरंगे फूल खिलाए
नर-नारी और जीव बनाए
पतझड़ वर्षा बसंत सजाए
रथ,पुष्पक विमान चलाए

सज्जन दुर्जन सबका दाता
जयति जय विश्वकर्मा विधाता

यज्ञ योग विज्ञान रचाए
वेद ऋचाओं में हैं समाए
गिरि कन्दरा महल बनाए
धरती पर अन्ना उपजाए

सकल कष्टों के तुम हो त्राता
जयति जय विश्वकर्मा विधाता

अग्नि में ज्योति प्रगटाए
जन हित में आयुध बनाए
मेघों से पानी बरसाए
सकल विश्व का हित कराए

ललित ज्ञान हैं तुमसे पाता
सकल सृष्टि के तुम निर्माता

जयति जय विश्वकर्मा विधाता



बंजारन की बेटी हूँ मैं तो ये चली

हवा है मेरा नाम मैं बादल की सहेली
आकाश पे छ जाती हूँ मैं बनके पहेली

आँधियों ने आके मेरा घर बसाया
आकाश के तारों ने उसे खूब सजाया
चली जब गंगा की ठंडी पुरवैया
धुप के आंगन में खिली बनके चमेली

चुपके आके कान में बादल ने ये कहा
भर के लाया हूँ पानी तू धरती पे बरसा
प्यास मिटेगी सबकी फैलेगी हरियाली
धरती भी झूमेगी बनके दुल्हन नवेली

जादे के मौसम की मैं सर्द हवा हूँ
पहाडों में भी बहती रही मैं सर्द हवा हूँ
फागुनी रुत में सिंदूरी हुआ पलाश
पतझड़ आया तो फिरि मैं बनके अकेली

सदियों से मैं तो यूँ ही चलती रही हूँ
चलते-चलते मैं कभी थकती नही हूँ
बहना ही मेरा जीवन चलना ही नियति है
बंजारन की बेटी हूँ मैं तो ये चली


हवा है मेरा नाम मैं बादल की सहेली
आकाश पे छा जाती हूँ मैं बनके पहेली।


आपका
शिल्पकार

(फोटो गूगल से साभार)

जो दिल पर हाथों की मेहँदी सी रचती थी

सुबह तुम्हारे संदेश ने जगा डाला
मेरे अरमानों को खूब हिला डाला
मेने तो तुम्हे सिर्फ़ कुछ फूलभेजे
तुमने तो पूरा गुलदस्ता बना डाला

दुनिया में क्या-क्या नही सहा है हमने
सबकी नफरत का मोल दिया है हमने
लोगों ने जितने भी पत्थर फेंके थे मुझ पर
उतना हिस्से का प्यार तोल दिया है हमने

न गीत लिखा न गजल लिख सका
सिर्फ़ तुम्हारी यादों में ही डूब गया था
तुम हो गई हो मेरी आंखों से ओझल
जब हाथों से आँचल तेरा छुट गया था

मुसाफिर हूँ मैं चार दिन चलने आया हूँ
नित सूरज सा हर शाम ढलने आया हूँ
दो दिन ढल गए तुम्हे ढूंढने में ही
दो दिन प्यार की छाँव में पलने आया हूँ

खनकती हंसीं तेरी जलतरंग सी बजती थी
आंचल की सुनहरी किरणों से सुबह सजती थी
उस सुबह को बरसों से जैसे तरस ही गये हम
जो दिल पर हाथों की मेहँदी सी रचती थी

आपका

शिल्पकार

(फोटो गूगल से साभार)

हिन्दी दिवस पर अर्पित हैं चंद फूलों की कलियाँ


हिन्दी दिवस पर अर्पित हैं चंद फूलों की कलियाँ
कुछ गांव का अल्हड़पन कुछ गांव की गलियां
कुछ हिमालयी पीर दुष्यन्ति कुछ फूल जयशंकरी
कुछ लहरें मन उमंग की कुछ फूलों की डलियाँ
फूल बहुत थे जो बाग़ में खिलने आए थे
कुछ और भी थे जो धुप में जलने आए थे
कुछ सर चढ़े कुछ गलहार भी बनाये गये
कुछ ऐसे भी थे जो धूल में मिलने आए थे
जब सुबह-सुबह तुम्हारी बात होती है
मुझ पर नेमतों की बरसात होती है
दिन ढल जाता है तेरी यादों के सहारे
पर हर रात क़यामत की रात होती है
शाम थी जो सारी रात रोती रही
निशा से मिलने तरसती रही
ओस की बूदें सेज पर टपकती थी
आँखें सावन सी सतत बरसती रही
नित मैं एक बंजारे सा भटकता हूँ
नित पावस के पपीहे सा तडफता हूँ
ये आरजू रख कर तुम्हारे दीदार की
नित यूँ ही चन्द्रकला सा घटता हूँ
आज सावन की पहली बरसात हुयी
तन-मन भीगा स्नेह की बरसात हुयी
क्यूँ ना छलका तुम्हारे प्रीत का साग़र
चारों और देखो झमाझम बरसात हुयी
आपका
शिल्पकार
(फोटो गूगल से साभार)

संसार पर विजय पाने वालों की अन्तिम यात्रा


साँझ हो रही थी
दिवस का समापन था
गगन रक्तिम हो रहा था
स्वच्छ शीतल वायु
प्रवाह पर थी
तरुवर रक्तिम कणों
से भरे हुए
धरनी पर सर्वत्र
रक्त का अहसास
रवि की रक्तिम किरने
दहला रही थी हृदय
साँझ का निशा से मिलन
स्वागत में उल्लुओं की कर्कश चीखें
चमगादडों की फडफड़ाहट
खंडहरों में नीरवता
सहसा पवन का रुक जाना
मौत का सन्नाटा
पत्ता तक नही हिलता था
उस शमशान में बैठा
मैं निहार रहा था
उन चंद चिताओं को
उनकी गगनचुम्बी जवालायें
इस संसार पर
अपनी विजय का
उद्घोष कर रही थी
शमशान से मैं गया नही
दीवानापन था मेरा
देख रहा था
संसार पर विजय पाने वालों की
अन्तिम यात्रा
जीते तो वे थे
मैं जीते जी हार गया
नभ में शशि की
बादलों से अठखेलियाँ
रंगरेलियां
यह उसका मुझ बेबस पर
मंदहास था।
आपका
शिल्पकार
(फोटो गूगल से साभार)

वह माँ के आंचल की छाया !!!!!!!

ओ!!! मेरे प्रियतम सजना
लौट के आ घर दूर नही
बात जोह रही राह है तेरी
आ जा अब तू जरुर यहीं
बालकपन का भोला बचपन
रह-रह याद दिलाता है
गांव पार का बुढा बरगद
तुझको रोज बुलाता है
खेलकूद कर जिस पर तुने
यौवन पाया जरुर यहीं
ओ!!!!मेरे परदेशी सजना......
पनघट की जिस राह चला तू
उसकी याद सताएगी
चंदा की पायल की छम-छम
प्रीत के गीत सुनाएगी
पंख फैलाये नाचेंगे तेरे
चारों ओर मोर वही
ओ!!!मेरे परदेशी सजना.........
आए बसंत तो सुमन खिलेंगे
पवन झकोरे खूब चलेंगे
महकाए जो तुझे हमेशा
मधुर सुवासित समीर बहेंगे
खेतों की विकल क्यारी की
तुझे याद आएगी जरुर कहीं
ओ!!!! मेरे परदेशी सजना.........
वह माँ के अंचल की छाया
जिसमे छिपकर सो जाता था
वही पुराना टुटा छप्पर
जहाँ सपनों में खो जाता था
मधुर सुरीली माँ की लोरी
तुझे तडफाएगी जरुर कहीं
ओ!!!!मेरे परदेशी सजना
लौट के आ घर दूर नही
आपका
शिल्पकार

(फोटो गूगल से साभार)

प्रणय की पराकाष्ठा की


मै
एक छोटी सी
लहर हूँ
समन्दर की
मैं चाहने लगी हूँ
उस चाँद को
उसका आकर्षण
मुझे प्रेरित करता है
आकर्षित करता है
उसका सलोना बांकपन
मुझे मोह लेता है
मै डूबना चाहती हूँ
आनंद में
अनुभूति करना चाहती हूँ
प्रणय की पराकाष्ठा की
मै भी
अस्तितत्व बनाना चाहती हूँ
उन उतुंग पहाडों सा
जो कभी लहरें थे
मेरी तरह
मिलन के आनंद ने
स्थिर कर दिया
उन्हें इस संयोग ने
योगी बना दिया
एक स्पर्श ने
वुजूद दे दिया
योगी बना दिया
आपका
शिल्पकार
(फोटो गूगल से साभार)

जब से तुम मेरे मीत हो गए

जब से तुम मेरे मीत हो गए
मेरी सरगम के संगीत हो गए
बजते रहते हैं मेरे कानों में नित
तुम्हारे बोल जैसे गीत हो गए


सितारा टूटता है जमीं को पाने के लिए
जमीं तरसती है उसे बसाने के लिए
जान देकर ही सितारा जमीं पर आता है
प्रियतम की बाँहों में मर जाने के लिए

आरजू लिए फिरते रहे उनको पाने की
हवा का रुख देखते रहे ज़माने की
सारी तमन्नाएँ धरी की धरी रह गयी
जब घडी आ ही गयी जनाजा उठाने की

पलकों के किनारों से आंसू झरते हैं
इनकी छाँव में प्यार के सपने पलते हैं
तुम लड़ जाना भीषण तूफानों से भी
जहाँ चाह हो वहीँ रास्ते भी निकलते हैं

आपका
शिल्पकार

(फोटो गूगल से साभार)

लौट आए हैं गांव में भेडिये एक बार फ़िर


लौट आए हैं गांव में भेडिये एक बार फ़िर
आदमी से भेडिया बन गया है इन्सान फ़िर
स्याह रातों में पहचानना है बड़ा मुस्किल
सफेदपोश बन गया है एक बार शैतान फ़िर
वो नोच-नोच कर लहुलुहान कर गया मुझे
वो लौट कर आ गया है एक बार हैवान फ़िर
कल तक दम उखड रहा था जिस साँप का
गलियों में घूम रहा है एक बार जवान फ़िर
जिसके हाथ में सौंपी थी मैंने हवेली की चाबी
आज आँखे दिखा रहा है एक बार बेईमान फ़िर
आपका
शिल्पकार
(फोटो गूगल से साभार)

कल कातिल की तलाश में आए थे सिपाही

रवि कुमार की सृजनशीलता को अर्पित

हर तरफ भेड़ियों का राज हो गया है
शेर क्यों शिकार करके सो गया है
सब ढूंढ़ते हैं कोई तो बचायेगा हमें
जो थे रहनुमा उनका पता खो गया है
कब्र से लाशें गायब होती रही रात भर
अब सड़कों से आदमी गायब हो गया है
रहते थे कभी चैन से अमन से हम लोग
खून की फसलें कौन सड़कों पे बो गया है
कल कातिल की तलाश में आए थे सिपाही
पता नही कौन सड़क से धब्बे धो गया है।
आपका
शिल्पकार
(फोटो गूगल से साभार)

चाहे वो माटी की ही क्यों ना हो !!!!!

ईंट
के भट्ठे पर
वह चितकबरे
पेबंद में लिपटी
ढो रही थी
इंटों का बोझा
खा रही थी
इंटों का लाल रंग
मिटटी से सनी रोटियां
कंकरों के साग के साथ
जब से ब्याही थी
चिमनी के धुंए के साथ
उसकी दुनिया सिमट गई थी
धूल से सनी वो
किसी फिलम एक्टोरनी सी लगती थी
जैसे किसी मजदूरों की
दर्द भरी कहानी पर
सच्चा अभिनय कर रही हो
लेकिन ये हकीकत से कोसों दूर था
ये तो मै सोच रहा था
वो तो फंस चुकी थी
माया के जाल मै
खनकते सिक्के की चाल में
रोटी की खातिर
चाहे वो माटी की ही क्यों ना हो
आख़िर रोटी ही थी
आपका
शिल्पकार
(फोटो गूगल से साभार)

तुमने देखा चौराहे पर

तुमने देखा चौराहे पर जो सर-ऐ-आम हुआ
मेरे शहर का एक शख्श आज नीलाम हुआ

तारामती के आंसू और हरिश्चंद्र की मजबूरी का
गैरतमंद खरीददारों में ऊँचे से उंचा दाम हुआ

रोटी के बदले में बड़ी बोली तन की लगी थी
अमीर-ऐ-शहर ने ख़रीदा उसका बड़ा नाम हुआ

आंसू भी बिक गए आज कौडियों के दाम
मेरे तन के पैरहन का भी आज नीलम हुआ

सुबह से शाम तक नंगा खड़ा रहा चौराहे पर मै
किसी ने ना पूछा की तेरा क्या दाम हुआ

भीष्म की प्रतिज्ञा ,युधिष्ठिर का सत्य वचन भी
सब कुछ बिक गया कैसा भयानक काम हुआ


आपका
शिल्पकार

(फोटो गूगल से साभार)

बता तू अकल बड़ी के भैंस

मास्टर जी ने सवाल लगाया के बतावे सुरेश
भैंस में तै पाड़ी घटाई झोट्टा रह गया शेष
बता तू अकल बड़ी के भैंस

जाडा भोत पड़े था भाई खूब लगाई रेस
पहले तो कम्बल ओड्या उस पे डाला खेस
बता तू अकल बड़ी के भैंस

कुत्ते के पिल्लै पकड़े उसके मुंडे केश
बिना उस्तरे नाइ मुंडा ताऊ पे चल्या केश
बता तू अकल बड़ी के भैंस

बिना चक्के की गाड्डी चाली रेल उडी परदेश
गार्ड बेचारा खड़ा रह गया देखे बाट नरेश
बता तू अकल बड़ी के भैंस

एक पेड़ पे चालीस चिडिया तभी घटना घटी विशेष
शिकारी की एक गोली चाली बच गई कितनी शेष
बता तू अकल बड़ी के भैंस

आपका
शिल्पकार

(फोटो गूगल से साभार)

बूँद को सागर में ही रहने दो


क्या प्रलय
एवं स्थिति में
मात्र
एक बूँद का
फासला है
कांप जाता हूँ
किसी अनिष्ट की
आशंका से
जब डबडबाती है
तेरी आँखें
ब्रह्माण्ड में घूमता हुआ
"हैल्बाप"
भीतर तक डरा जाता है,
यदि टपक जाए
तो धरती
रसातल में चली जायेगी
संतुलन बिगड़ जाएगा
सभी आकर्षण में बंधे हैं
बंधे हैं ,जाने अनजाने बन्धनों में
सूर्य का आकर्षण बाँध लेता है सबको
सभी छोटे बड़ों को
जीवन एवं मृत्यु का
यह निकट का फासला है
बूँद
जीवन/मृत्यु है
मर्यादा के बंधन से
इसे निकलने ना देना
वरना
इस महाप्रलय की
महाविनाश का बोझ लेकर
तुम भी जी न सकोगे
बूँद को सागर में ही रहने दो
आपका
शिल्पकार
(फोटो गूगल से साभार)

राजनीती के तवे पर कोरे झूठ की रोटियां

चले जा रहे हैं वाहन
सड़क का सीना रौंदते हुए
चीरते हुए /निर्दयी होकर
ठीक राजनीती के तवे पर
कोरे झूठ की रोटियां
सेकने वाले नेता की तरह
निर्भय होकर,
कड़कती धुप में खड़ा है
सर छुपाने की चाह लिए
युग निर्माता मजदूर
जो गढ़ता है
आलिशान इमारतें
लेकिन
उसे सर छुपाने तक की जगह
नसीब नही
सिसकियाँ लेता हुआ
समाजवाद
ये पेट आश्वासन का भूखा नही
ये दो हाथ
किस्मत गढ़ते हैं देश की
सियासत के दलाल
खा जाते हैं "रोटियां"
हम गरीबों की
छोड़ जाते हैं
कोरा आश्वासन
हमारी भूख मिटाने के लिए
सबको अपना हक़
अपना अधिकार दिलाने की हसरत लिए
दम तोड़ रहा है
प्रजातंत्र
इन निष्ठुर हाथों में
आपका
शिल्पकार

 

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